बारह मंजिला इमारत में लिफ्ट हमेशा थोड़ी सी खटखटाती थी। हर बार दरवाजा बंद होने पर एक हल्की सी झटका लगता, जैसे कोई पुराना इंजन कह रहा हो—“अभी तो बस शुरुआत है।” उस शाम भी वही हुआ।
सातवीं मंजिल पर लिफ्ट रुकी। दरवाजा खुला। अंदर पहले से एक आदमी खड़ा था—काला कोट, सफेद शर्ट का कॉलर थोड़ा खुला, हाथ में एक पुराना लेदर बैग, चेहरा थका लेकिन आँखें तेज। नाम था अर्जुन। वो ३८ का था, लेकिन दिखता ३२ का। काम से लौट रहा था, लेकिन मन कहीं और था।
दरवाजा बंद होने ही वाला था कि एक और हाथ ने रोक लिया। एक औरत अंदर घुसी। लंबी, पतली, काली जींस, सफेद क्रॉप टॉप, बाल खुले, गीले—बारिश में भीगकर आई थी। होंठों पर हल्की लाल लिपस्टिक, लेकिन वो धुलकर फैल गई थी। नाम था नैना। २९ साल। वो भी थकी हुई लग रही थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी—जैसे कोई राज अभी-अभी खुला हो और वो उसे छुपा नहीं पा रही हो।
लिफ्ट ऊपर चढ़ने लगी। दोनों ने एक-दूसरे को देखा। नजर मिली। फिर दोनों ने नजरें हटा लीं। लेकिन वो पल काफी था।
आठवीं मंजिल पर लिफ्ट रुकी। दरवाजा खुला। कोई नहीं था। दरवाजा बंद हुआ। अब सिर्फ दो लोग, एक छोटी सी जगह, और लिफ्ट की वो हल्की सी गूँज।
नैना ने अचानक कहा, “ये लिफ्ट कभी-कभी रुक जाती है।”
अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ। मैंने सुना है।”
फिर चुप्पी।
नौवीं मंजिल। फिर रुकी। कोई नहीं।
दसवीं मंजिल पर लिफ्ट अचानक झटका लेकर रुक गई। लाइट्स फ्लिकर कीं। फिर अंधेरा। सिर्फ इमरजेंसी लाइट की हल्की लाल रोशनी।
नैना हँसी। “देखा? मैंने कहा था ना।”
अर्जुन ने बैग नीचे रखा। “अब क्या? इंतजार?”
नैना ने दीवार से टेक लगाई। “इंतजार करने का मन नहीं है।”
अर्जुन ने उसकी तरफ देखा। “तो?”
नैना ने एक कदम आगे बढ़ाया। अब दोनों इतने करीब कि साँसें महसूस हो रही थीं। नैना ने अपना हाथ अर्जुन के कॉलर पर रख दिया। “तुम्हारी शर्ट गीली हो गई है।”
अर्जुन ने कहा, “तुम्हारे बाल भी।”
फिर कोई बात नहीं हुई। नैना ने अर्जुन के होंठ पकड़ लिए। पहले हल्का, फिर गहरा। अर्जुन ने उसे दीवार से सटा दिया। हाथ उसकी कमर पर, फिर पीठ पर, फिर क्रॉप टॉप के नीचे। नैना की साँसें तेज। उसने अर्जुन का कोट उतारा। शर्ट के बटन खोले। छाती पर हाथ फेरा।
लिफ्ट अभी भी रुकी हुई थी। लेकिन अब समय रुक गया था।
नैना ने जींस का बटन खोला। अर्जुन ने उसकी कमर पकड़ी, घुमाया। अब नैना की पीठ उसकी तरफ। उसने क्रॉप टॉप ऊपर किया। ब्रा नहीं थी। पीठ नंगी, चिकनी। अर्जुन ने पीठ पर होंठ रख दिए। नैना ने सिर पीछे किया, आँखें बंद।
अर्जुन ने अपनी पैंट उतारी। नैना ने हाथ पीछे करके उसे छुआ। सख्त, गर्म। उसने धीरे से कहा, “अंदर… अभी।”
अर्जुन ने उसे फिर से घुमाया। नैना ने एक पैर ऊपर उठाया, दीवार पर टिका दिया। अर्जुन ने धीरे से घुसाया। नैना ने दाँत भींच लिए। “आह…” धीमा, लेकिन गहरा। लिफ्ट की दीवारें काँप रही थीं—या शायद उनका बदन।
हर धक्के के साथ नैना की सिसकारी बढ़ती गई। अर्जुन की साँसें तेज। दोनों एक-दूसरे में खो गए। समय नहीं था। सिर्फ वो पल। वो गहराई। वो गर्माहट।
अंत में दोनों एक साथ थरथराए। नैना की जाँघें काँप रही थीं। अर्जुन ने उसे थाम लिया। दोनों की साँसें मिलीं।
तभी लिफ्ट में झटका लगा। लाइट्स जल गईं। दरवाजा खुलने लगा।
नैना ने जल्दी से क्रॉप टॉप नीचे किया। अर्जुन ने शर्ट के बटन लगाए। दोनों ने एक-दूसरे को देखा। मुस्कुराए।
दरवाजा खुला। बारहवीं मंजिल।
नैना बाहर निकली। मुड़ी। “अगली बार लिफ्ट में मिलें?”
अर्जुन ने कहा, “अगली बार… शायद बिना रुकावट के।”
नैना हँसी। दरवाजा बंद हुआ।
अर्जुन अकेला रह गया। बैग उठाया। मुस्कुराया। लिफ्ट नीचे उतरने लगी।
लेकिन वो जानता था—अगली शाम फिर वही लिफ्ट, वही समय, वही रोशनी। और शायद फिर वही रुकावट।
क्योंकि कुछ मुलाकातें लिफ्ट में ही पूरी होती हैं।
अगली शाम ठीक वही समय, वही इमारत, वही लिफ्ट। अर्जुन पहले से अंदर खड़ा था। आज उसने नीली शर्ट पहनी थी, कॉलर थोड़ा खुला, हाथ में वही पुराना बैग, लेकिन आँखों में एक अलग सी चमक। वो जानता था कि नैना आएगी। दिल की धड़कनें तेज थीं, जैसे कोई पुरानी याद फिर से जाग रही हो।
लिफ्ट सातवीं मंजिल पर रुकी। दरवाजा खुला। नैना अंदर घुसी। आज वो काली टाइट जींस में थी, सफेद ऑफ-शोल्डर टॉप, बाल खुले, लेकिन सूखे। होंठों पर वही लाल लिपस्टिक, आज ज्यादा गहरी। वो मुस्कुराई, जैसे कल का राज आज भी उनके बीच छुपा हो।
दरवाजा बंद हुआ। लिफ्ट ऊपर चढ़ने लगी। दोनों ने एक-दूसरे को देखा। इस बार नजरें नहीं हटाईं। नैना ने धीरे से कहा, “कल… बहुत जल्दी खत्म हो गया।”
अर्जुन ने मुस्कुराकर जवाब दिया, “हाँ… लेकिन आज लिफ्ट रुकेगी, मैंने चेक कर लिया।”
नैना हँसी। “तुमने?”
“हाँ… थोड़ा सा इंतजार तो बनता है।”
आठवीं मंजिल। कोई नहीं। दरवाजा बंद।
नैना ने एक कदम आगे बढ़ाया। अब दोनों इतने करीब कि उनकी साँसें एक हो रही थीं। नैना ने अर्जुन के कॉलर को छुआ, उँगलियाँ धीरे-धीरे नीचे सरकाईं। “तुम्हारी शर्ट… आज भी बहुत अच्छी लग रही है।”
अर्जुन ने उसकी कमर पकड़ी। “तुम्हारा टॉप… बहुत खतरनाक है।”
नैना ने आँखें बंद कीं। “तो खतरा उठाओ ना।”
अर्जुन ने उसे दीवार से सटा दिया। होंठ मिले—इस बार गहरा, धीमा, जैसे सालों से इंतजार कर रहे हों। नैना ने अर्जुन की शर्ट के बटन खोले। उसकी छाती पर हाथ फेरा। अर्जुन ने नैना का टॉप ऊपर किया। ब्रा नहीं थी। उसके आम सामने थे—रसीले, गोल, मुलायम। अर्जुन ने उन्हें दोनों हाथों से पकड़ा, हल्के से दबाया। नैना सिसकारी, “आह… अर्जुन… और जोर से…”
अर्जुन ने एक आम को मुँह में लिया। अंगूर चूसा। नैना की साँसें तेज। उसने अर्जुन की पैंट का बटन खोला। उसका केला बाहर आया—लंबा, मोटा, सख्त। नैना ने उसे पकड़ा, सहलाया। “कल से ज्यादा सख्त… क्यों?”
अर्जुन ने कहा, “क्योंकि कल से तुम्हारी याद में था।”
नैना ने जींस नीचे की। उसकी खाई सामने थी—गहरी, रसीली, पहले से गीली। वो बोली, “अर्जुन… अब इंतजार नहीं… घुसाओ…”
अर्जुन ने उसे घुमाया। नैना की पीठ उसकी तरफ। उसने एक पैर ऊपर उठाया, दीवार पर टिका दिया। अर्जुन ने अपना केला खाई के मुंह पर रखा। धीरे से रगड़ा। नैना काँपी। “धीरे… लेकिन पूरा…”
अर्जुन ने धकेला। केला अंदर चला गया। नैना ने दीवार पकड़ी, सिसकारी, “आह… गहरा… और गहरा…” हर धक्के के साथ नैना की सिसकारियाँ बढ़ती गईं। अर्जुन ने उसके आम दबाए, अंगूर चूसे। नैना बोली, “अर्जुन… मुझे ऊपर आने दो…”
अर्जुन लेट गया। नैना उसके ऊपर चढ़ी। अपना बगीचा केला पर रखा। धीरे-धीरे नीचे बैठ गई। पूरा केला अंदर। वो ऊपर-नीचे होने लगी—धीमी, फिर तेज। हर बार जब नीचे बैठती, उसकी कद्दू अर्जुन के पेट से टकराती। थप-थप की आवाज। नैना बोली, “अर्जुन… तुम्हारा केला… मुझे पागल कर रहा है… घुसाओ… और घुसाओ…”
अर्जुन ने उसकी कमर पकड़ी, उसे और जोर से नीचे दबाया। नैना की सिसकारियाँ अब चीख बन गईं। “आह… मैं… मंजिल पर…”
उसकी खाई सिकुड़ गई। रस बहा—गर्म, चिपचिपा। उसी पल अर्जुन का केला फड़का। उसने रस छोड़ा—गहराई में, भरपूर। दोनों थरथराए। नैना अर्जुन पर गिर पड़ी। दोनों की साँसें मिलीं।
कुछ देर चुप्पी। फिर नैना ने कहा, “अर्जुन… ये लिफ्ट… हमारी है।”
अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा, “हाँ… रोज रुकेगी।”
तभी लिफ्ट में झटका। लाइट्स जल गईं। दरवाजा खुलने लगा।
नैना ने जल्दी से कपड़े ठीक किए। अर्जुन ने भी। दोनों ने एक-दूसरे को देखा। मुस्कुराए।
दरवाजा खुला। बारहवीं मंजिल।
नैना बाहर निकली। मुड़ी। “कल… फिर?”
अर्जुन ने कहा, “कल… और गहराई से।”
नैना हँसी। दरवाजा बंद हुआ।
अर्जुन अकेला रह गया। लेकिन अब वो अकेला नहीं था। लिफ्ट नीचे उतर रही थी, लेकिन उसका दिल ऊपर ही था।
अगली शाम फिर वही लिफ्ट। फिर वही रुकावट। फिर वही गहराई।
क्योंकि कुछ कहानियाँ लिफ्ट में शुरू होती हैं, और कभी खत्म नहीं होतीं।