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होटल में अजनबी चु@@ई


होटल में अजनबी चु@@ई—>

शहर की शोर-शराबे वाली गलियों से दूर, उस आलीशान होटल के कमरा नंबर ४०५ में सन्नाटा पसरा हुआ था, लेकिन उस सन्नाटे में एक अजीब सी गर्माहट और बेचैनी घुली हुई थी। समीर और अंजलि एक-दूसरे के लिए बिल्कुल अजनबी थे, लेकिन किस्मत ने उन्हें एक ही फ्लाइट कैंसिल होने के कारण इस कमरे में साथ रहने पर मजबूर कर दिया था। अंजलि ने नीले रंग की सिल्क की साड़ी पहनी हुई थी, जो उसके गोरे बदन पर बिजली की तरह चमक रही थी। उसका शरीर किसी तराशी हुई मूरत की तरह था, जिसमें उसकी कमर की पतली ढलान और उसके भारी-भरकम गोल तरबूज किसी को भी मदहोश करने के लिए काफी थे। साड़ी के ब्लाउज से उसके आधे तरबूज बाहर झांक रहे थे, जो समीर की धड़कनों को अनियंत्रित कर रहे थे।

समीर ने खिड़की के पास खड़े होकर बाहर की रोशनी को देखा और फिर धीरे से अंजलि की ओर मुड़ा, जो सोफे पर बैठकर अपनी सैंडल उतार रही थी। उसकी नजरें अंजलि के खुले हुए पैरों और उसके चौड़े पिछवाड़े की गोलाई पर टिक गईं, जो साड़ी में दबकर और भी आकर्षक लग रही थी। समीर के मन में एक अजीब सी कशमकश चल रही थी; वह अंजलि की सुंदरता की प्रशंसा करना चाहता था, लेकिन झिझक उसे रोक रही थी। अंजलि ने महसूस किया कि समीर उसे देख रहा है, और उसने एक हल्की सी मुस्कान के साथ अपनी नजरें ऊपर उठाईं। उस पल कमरे का तापमान जैसे अचानक बढ़ गया और हवा में कामुकता का एहसास गहराने लगा।

बातों का सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन शब्द सिर्फ एक जरिया थे उस खिंचाव को छिपाने का जो दोनों के बीच पनप रहा था। समीर धीरे-धीरे अंजलि के करीब आया और उसके पास सोफे पर बैठ गया। अंजलि की सांसों की खुशबू और उसके शरीर से आने वाली धीमी इत्र की महक समीर के दिमाग पर चढ़ने लगी थी। समीर ने अपना हाथ धीरे से अंजलि के हाथ पर रखा, जो रेशम जैसा नरम था। अंजलि ने अपना हाथ हटाया नहीं, बल्कि उसकी उंगलियों को समीर की उंगलियों में फंसा लिया। इस पहले स्पर्श ने जैसे दोनों के बीच की झिझक की दीवार को गिरा दिया था। समीर ने देखा कि अंजलि की सांसें तेज हो गई थीं और उसके तरबूज ऊपर-नीचे हो रहे थे, जिससे उनके ऊपर मौजूद छोटे-छोटे मटर साफ उभर आए थे।

समीर ने बड़ी कोमलता से अंजलि के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके होंठों की नरमी का रसपान करने लगा। यह चुंबन नहीं, बल्कि दो प्यासी रूहों का मिलन था। अंजलि ने सिसकारी भरी और समीर के बालों में अपनी उंगलियां घुमा दीं। समीर का हाथ धीरे से नीचे की ओर सरका और उसने अंजलि के एक भारी तरबूज को अपनी हथेली में भर लिया। वह तरबूज इतना नरम और रसीला था कि समीर उसे बस दबाते रहना चाहता था। अंजलि के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकली जब समीर ने अपने अंगूठे से उसके मटर को सहलाया। साड़ी का पल्लू अब कंधे से नीचे गिर चुका था, जिससे अंजलि की सुराहीदार गर्दन और उसके यौवन का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह उजागर हो गया था।

समीर ने धीरे-धीरे अंजलि की साड़ी की गांठों को खोलना शुरू किया। हर परत के हटने के साथ अंजलि की खूबसूरती और भी निखर कर सामने आ रही थी। जब साड़ी और ब्लाउज जमीन पर गिर गए, तो समीर के सामने अंजलि का नग्न और कामुक शरीर था। उसके भारी तरबूज अपनी पूरी शान के साथ तनकर खड़े थे, और उनके बीच की गहरी घाटी समीर को आमंत्रित कर रही थी। समीर की नजरें और नीचे गईं, जहां अंजलि की रेशमी जांघों के बीच उसकी मखमली और गीली खाई छिपी हुई थी। उस खाई के आसपास हल्के-हल्के बाल थे, जो उसकी कामुकता को और बढ़ा रहे थे। समीर ने अपनी पैंट उतारी और उसका कड़क और लंबा खीरा बाहर निकल आया, जो अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ अंजलि के स्वागत के लिए तैयार था।

समीर ने अंजलि को बिस्तर पर लिटाया और उसके पूरे शरीर को अपने होंठों से सहलाने लगा। वह कभी उसके तरबूज के ऊपर लगे मटर को अपने मुँह में भर लेता, तो कभी उसकी नाभि के पास अपनी जीभ से खेलता। अंजलि बिस्तर की चादर को अपनी मुट्ठियों में भींच रही थी और उसका शरीर रह-रहकर कांप रहा था। समीर ने नीचे झुककर अंजलि की खाई को देखना शुरू किया, जो अब पूरी तरह से गीली और रसीली हो चुकी थी। समीर ने अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू किया। खाई चाटने का यह अहसास अंजलि के लिए इतना तीव्र था कि वह अपनी कमर ऊपर उठाकर समीर के चेहरे को अपनी खाई में और भी जोर से दबाने लगी। उसे महसूस हो रहा था कि उसकी खाई से रस बहने वाला है।

अंजलि ने तड़पते हुए समीर के खीरे को अपने हाथों में पकड़ा। वह खीरा इतना गर्म और सख्त था कि अंजलि उसे महसूस कर सिहर उठी। उसने धीरे से उस खीरे को अपने मुँह में लिया और उसे चूसने लगी। खीरा चूसने की उसकी कला ने समीर के संयम को तोड़ दिया। समीर ने अंजलि को बिस्तर के बीचों-बीच किया और उसके पैरों को ऊपर उठाकर अपने कंधों पर रख लिया। उसने अपने कड़क खीरे की नोक को अंजलि की तंग खाई के मुहाने पर रखा। अंजलि ने अपनी आंखें बंद कर लीं और एक लंबी सांस ली। जैसे ही समीर ने धीरे से दबाव डाला, उसका खीरा अंजलि की तंग और गर्म खाई के अंदर फिसलने लगा। अंजलि के मुँह से एक तीखी कराह निकली, जो दर्द और सुख का अनोखा मिश्रण थी।

सामने से खुदाई शुरू हुई। हर धक्के के साथ समीर का खीरा अंजलि की खाई की गहराइयों को छू रहा था। कमरे में सिर्फ उनके शरीरों के टकराने की आवाज और उनकी भारी सांसें सुनाई दे रही थीं। समीर ने अपनी गति बढ़ाई, और अंजलि उसके साथ ताल मिलाते हुए अपनी कमर को ऊपर-नीचे करने लगी। अंजलि के तरबूज पागलों की तरह उछल रहे थे, और समीर उन्हें अपने हाथों से मसल रहा था। कुछ देर बाद समीर ने अंजलि को घुमाया और उसे घुटनों के बल खड़ा कर दिया। अब पिछवाड़े से खुदाई का समय था। समीर ने पीछे से अंजलि के भारी पिछवाड़े को पकड़ा और अपने खीरे को दोबारा उसकी खाई में उतारा। इस पोजीशन में अंजलि की खाई और भी तंग लग रही थी और समीर का खीरा गहराई तक जा रहा था।

खुदाई की यह प्रक्रिया अब अपने चरम पर पहुंच रही थी। समीर के धक्के अब तेज और शक्तिशाली हो गए थे। अंजलि का शरीर पसीने से तरबतर था और वह जोर-जोर से समीर का नाम पुकार रही थी। समीर को महसूस हुआ कि उसका खीरा अब फटने वाला है। ठीक उसी समय अंजलि का शरीर जोर-जोर से कांपने लगा और उसकी खाई ने समीर के खीरे को जोर से जकड़ लिया। अंजलि का रस छूट गया और उसकी गहरी खाई समीर के खीरे के रस से भर गई। समीर ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी और अपना सारा गरम रस अंजलि की गहराई में उड़ेल दिया। दोनों पसीने से लथपथ एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े, उनकी धड़कनें अब भी एक दौड़ लगा रही थीं।

शांति छा गई थी, लेकिन यह शांति बहुत सुकून भरी थी। समीर ने अंजलि को अपनी बाहों में समेट लिया और उसके माथे पर एक प्यार भरा स्पर्श किया। अंजलि के चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि थी। वह अजनबी, जो कुछ घंटों पहले तक एक-दूसरे का नाम तक नहीं जानते थे, अब रूहानी तौर पर जुड़ चुके थे। उस रात की खुदाई ने उनके बीच एक ऐसा रिश्ता बना दिया था जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल था। कमरे की खिड़की से आती सुबह की पहली किरण ने जब उनके नग्न शरीरों को छुआ, तो उन्हें एहसास हुआ कि यह सिर्फ एक रात का खेल नहीं था, बल्कि एक ऐसी याद थी जो ताउम्र उनके दिलों में दबी रहेगी।

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