अजनबी की गरम चु@@ई—>
जयपुर की उस सुनहरी शाम में राज अपने होटल के कमरे की खिड़की से बाहर देख रहा था, जहाँ शहर की रोशनी धीरे-धीरे जाग रही थी। वह यहाँ एक बिजनेस कॉन्फ्रेंस के लिए आया था, लेकिन उसका मन काम में कम और अकेलेपन की गहराई में अधिक डूबा हुआ था। तभी उसे बगल वाले कमरे के दरवाजे के खुलने की आवाज सुनाई दी और उसने देखा कि एक बेहद खूबसूरत महिला अपने भारी सामान के साथ जूझ रही थी, जिसके चेहरे पर थकान और एक अजीब सी उदासी साफ़ झलक रही थी। राज ने अपनी झिझक को दरकिनार किया और मदद के लिए हाथ बढ़ाया, और इसी तरह दोनों के बीच पहली मुलाकात की नींव पड़ी जिसने आने वाली रात को यादगार बना दिया।
उस महिला का नाम नेहा था, जिसकी उम्र लगभग ३५ वर्ष रही होगी और उसका शरीर किसी तराशी हुई मूर्ति की तरह सुडौल, भरा हुआ और बेहद कामुक था। उसने एक तंग काले रंग की शिफॉन की साड़ी पहनी हुई थी, जिसमें से उसके शरीर के भारी उतार-चढ़ाव साफ नजर आ रहे थे, विशेषकर उसके रसीले तरबूज जो ब्लाउज की तंग सीमाओं को चीरकर बाहर आने को बेताब लग रहे थे। जैसे ही वह मुड़ी, राज की नजरें उसके भारी पिछवाड़े पर जाकर टिक गईं, जो साड़ी के महीन कपड़े में भी अपनी गोलाई और उभार का अहसास बखूबी करा रहे थे, जिसे देखकर राज के भीतर एक अजीब सी हलचल पैदा होने लगी।
बातों का सिलसिला होटल के रेस्टोरेंट में डिनर के दौरान और भी गहरा होता चला गया, जहाँ नेहा ने बताया कि वह एक टूटे हुए रिश्ते के दर्द को भुलाने यहाँ आई है। उसकी आवाज में एक अजीब सी खनक और आँखों में प्यास थी, जो राज को बार-बार अपनी ओर खींच रही थी। जैसे-जैसे रात चढ़ती गई, उनके बीच का भावनात्मक जुड़ाव बढ़ता गया और शब्दों की जगह आँखों की गुस्ताखियों ने ले ली। राज ने महसूस किया कि नेहा के मन में भी वही तड़प है जो उसके अपने भीतर सुलग रही थी, और वह चाहकर भी अपनी नजरें उसके उन मटर जैसे उभरे निप्पलों से नहीं हटा पा रहा था जो ठंड की वजह से साड़ी के ऊपर से ही झलक रहे थे।
डिनर के बाद जब वे अपने कमरों की ओर बढ़े, तो गलियारे की मद्धम रोशनी में सन्नाटा पसरा हुआ था जो उनकी बढ़ती धड़कनों को और भी तेज कर रहा था। नेहा के कमरे के पास पहुँचकर राज रुका, तो नेहा ने उसकी आँखों में झांकते हुए एक निमंत्रण दिया जिसने राज के दिल में चल रहे द्वंद्व को खत्म कर दिया। वह नेहा के कमरे के भीतर था, जहाँ परफ्यूम की हल्की खुशबू और मद्धम लैंप की रोशनी ने एक नशीला माहौल बना दिया था। दोनों के बीच की दूरी अब सिमटने लगी थी और राज ने धीरे से नेहा के कंधे पर अपना हाथ रखा, जिससे वह सिहर उठी और उसकी साँसें तेज हो गईं।
राज ने अपने हाथ नीचे ले जाते हुए नेहा की कमर को छुआ, जहाँ रेशमी साड़ी और उसकी मखमली त्वचा का मिलन हो रहा था, और नेहा ने अपनी आँखें मूंद लीं। उसने नेहा को अपनी ओर खींचा और उसके उन भारी तरबूजों को अपने सीने से सटा लिया, जिससे नेहा के मुँह से एक हल्की आह निकल पड़ी। राज ने उसकी गर्दन पर अपने होठों का स्पर्श किया, जिससे नेहा के पूरे शरीर में एक कंपकंपी दौड़ गई और उसने राज के बालों को मजबूती से पकड़ लिया। माहौल में अब सिर्फ उनकी गरम साँसों की आवाज थी और बढ़ती हुई बेकरारी थी जो अब किसी भी सीमा को तोड़ने के लिए पूरी तरह से तैयार थी।
धीरे-धीरे राज ने नेहा की साड़ी के पल्लू को खिसकाया, जिससे उसके वे विशाल तरबूज अब सिर्फ एक पतले से ब्लाउज की कैद में रह गए थे। राज ने अपनी उंगलियों से उन मटर जैसे सख्त हिस्सों को सहलाना शुरू किया, जिससे नेहा का शरीर धनुष की तरह तन गया और वह राज के और करीब आ गई। उसने राज के कानों में फुसफुसाते हुए कहा, ‘राज, मुझे आज अपनी सारी तन्हाई भुला देनी है, मुझे बस अपनी बाहों में भर लो।’ राज ने बिना देर किए उसके ब्लाउज के हुक खोले और उन गोरे और भारी तरबूजों को आज़ाद कर दिया, जो आज़ाद होते ही राज के सामने पूरी शान से तन गए थे।
राज ने अपने होठों को उन मटर के दानों पर टिका दिया और उन्हें धीरे-धीरे चूसना शुरू किया, जिससे नेहा के मुँह से सिसकियाँ निकलने लगीं। उसका पूरा शरीर कामुकता की अग्नि में तप रहा था और वह राज के सिर को अपने सीने पर और जोर से दबा रही थी। राज के हाथ अब नीचे की ओर बढ़ रहे थे, जहाँ नेहा की रेशमी त्वचा और भी गरम और नम महसूस हो रही थी। उसने नेहा के पेटीकोट के नाड़े को ढीला किया और उसके पैर के पास से कपड़ा नीचे गिरते ही नेहा पूरी तरह से निर्वस्त्र होकर राज के सामने खड़ी थी, जिसकी सुंदरता को देखकर राज की साँसें जैसे कुछ पल के लिए थम सी गई थीं।
नेहा की वह गहरी और नम खाई अब राज की उंगलियों के स्पर्श के लिए बेताब थी, और जैसे ही राज ने अपनी उंगलियां वहां रखीं, उसे अहसास हुआ कि नेहा पहले से ही कितनी तैयार और गीली थी। राज ने अपनी उंगली से खाई के भीतर खुदाई शुरू की, जिससे नेहा के घुटने कमजोर पड़ने लगे और वह बिस्तर पर गिर पड़ी। राज ने भी अपने कपड़े उतार फेंके और उसका विशाल और कड़क खीरा अब पूरी तरह से बाहर था, जो अपनी मंजिल की तलाश में तड़प रहा था। नेहा की नजरें जब राज के उस मजबूत खीरे पर पड़ीं, तो उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक और चाहत उभर आई जो खुदाई की चरम सीमा तक पहुँचने की गवाह थी।
राज ने नेहा के पैरों को फैलाया और अपनी जीभ से उसकी खाई को चखना शुरू किया, जिससे नेहा बिस्तर की चादरों को अपनी मुट्ठियों में जकड़ने लगी। वह बार-बार राज का नाम पुकार रही थी और उसका पिछवाड़ा हवा में हिल रहा था, मानो वह राज को अपने भीतर समाने के लिए बुला रही हो। राज ने नेहा के दोनों पैरों को अपने कंधों पर रखा और अपने खीरे के अगले हिस्से को उसकी खाई के मुहाने पर टिका दिया। जैसे ही उसने हल्का सा दबाव डाला, नेहा के मुँह से एक तीखी कराह निकली और राज का आधा खीरा उस तंग और गरम खाई के भीतर समा गया, जिससे दोनों को एक अलौकिक सुख का अनुभव हुआ।
राज ने धीरे-धीरे अपनी रफ्तार बढ़ाई और पूरी ताकत से खुदाई करने लगा, हर धक्के के साथ नेहा का शरीर उछल रहा था और उसके तरबूज पागलों की तरह ऊपर-नीचे हो रहे थे। कमरे में उनके शरीरों के टकराने की आवाज गूंज रही थी और नेहा के मुँह से निकलने वाली सिसकियाँ राज को और भी उत्तेजित कर रही थीं। उसने नेहा को पलट दिया और अब वह पिछवाड़े से खोदने की मुद्रा में आ गया, जहाँ से नेहा का भारी पिछवाड़ा और भी आकर्षक लग रहा था। राज ने पीछे से अपना खीरा फिर से उसकी खाई में उतारा और तेज झटकों के साथ खुदाई को एक नए स्तर पर ले गया, जिससे नेहा का रोम-रोम कांप उठा।
नेहा ने अपने हाथ पीछे ले जाकर राज के जांघों को पकड़ लिया और खुद भी पीछे की ओर धक्के देने लगी ताकि खुदाई का आनंद और गहरा हो सके। राज ने उसके दोनों मटरों को अपनी उंगलियों से मसलना जारी रखा और पूरी शिद्दत से उसके भीतर अपने खीरे को उतारता रहा। जैसे-जैसे वे चरम सीमा की ओर बढ़ रहे थे, उनकी साँसें उखड़ने लगी थीं और पसीने की बूंदें उनके शरीरों पर चमक रही थीं। राज ने महसूस किया कि नेहा की खाई की दीवारें अब उसके खीरे को कसकर जकड़ रही हैं, जो इस बात का संकेत था कि वह अब रस छोड़ने के बेहद करीब है और उसकी खुदाई सफल होने वाली है।
अचानक नेहा का शरीर जोर-जोर से थरथराने लगा और उसके मुँह से एक लंबी आह निकली, ‘राज… मैं जा रही हूँ… आह… बहुत सुखद है ये!’ और उसी पल उसकी खाई से गरम रस निकलने लगा जिसने राज के खीरे को पूरी तरह से भिगो दिया। नेहा के रस छूटते ही राज ने भी अपनी रफ्तार और तेज कर दी और कुछ आखिरी दमदार धक्के लगाने के बाद अपना सारा गरम रस नेहा की गहराईयों में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े, जहाँ सिर्फ उनकी तेज धड़कनें और भारी साँसें सुनाई दे रही थीं, जो एक तृप्त मन और शांत शरीर की गवाही दे रही थीं।
काफी देर तक वे उसी मुद्रा में लेटे रहे, जैसे वक्त ठहर गया हो और दुनिया की सारी चिंताएं उस कमरे की दीवारों के बाहर ही रह गई हों। राज ने नेहा के माथे को चूमा और उसे अपनी बाहों में और कस लिया, जिससे नेहा को एक सुरक्षा और अपनेपन का अहसास हुआ। नेहा ने धीरे से राज की छाती पर अपना सिर रखा और मुस्कुराते हुए कहा, ‘आज तुमने मुझे फिर से जीवित कर दिया है, राज।’ उस रात की वह खुदाई सिर्फ शारीरिक भूख नहीं थी, बल्कि दो अकेले रूहों का एक-दूसरे में समा जाने का एक खूबसूरत जरिया थी, जिसने उन दोनों के जीवन में एक नई उमंग भर दी थी।
सुबह की पहली किरण जब कमरे की खिड़की से भीतर आई, तो राज और नेहा एक-दूसरे की बाहों में चैन की नींद सो रहे थे, उनके चेहरों पर एक अजीब सा सुकून और संतुष्टि थी। होटल के उस कमरे में शुरू हुई यह अजनबी मुलाकात अब एक गहरे अहसास में बदल चुकी थी, जिसे वे कभी भूल नहीं पाएंगे। राज जानता था कि यह सफर यहाँ खत्म नहीं हुआ है, बल्कि यह तो एक नई शुरुआत है जिसमें खुदाई की यादें और एक-दूसरे का साथ हमेशा के लिए उनके दिलों में बस गया था। उन्होंने उठकर एक-दूसरे को फिर से प्यार किया और आने वाले समय में फिर से मिलने का वादा किया, उस गरम रात की यादों को अपने साथ समेटते हुए।
अन्त में, जब राज अपने शहर वापस जाने के लिए निकला, तो उसने मुड़कर एक बार फिर उस होटल की खिड़की की तरफ देखा जहाँ उसने अपनी जिंदगी की सबसे हसीन रात बिताई थी। नेहा का वह खूबसूरत चेहरा, उसके भारी तरबूज, वह नम खाई और वह लाजवाब खुदाई उसके जहन में किसी फिल्म की तरह चल रही थी। उसने महसूस किया कि कभी-कभी अजनबी लोग भी हमें वह सुख और शांति दे जाते हैं जिसकी हमें सबसे ज्यादा जरूरत होती है। राज के चेहरे पर एक मुस्कान थी क्योंकि उसे पता था कि उसका खीरा अब फिर से उस खाई की गहराईयों को नापने के लिए जल्द ही वापस लौटेगा।