पड़ोसन के साथ चु@@ई—>बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और समीर अपने कमरे की खिड़की से बगल वाले घर की बालकनी को देख रहा था जहाँ कविता भाभी कपड़े सुखा रही थीं। कविता का शरीर किसी तराशे हुए पत्थर की तरह था, उनके पीछे का हिस्सा यानी पिछवाड़ा इतना उभरा हुआ था कि समीर की नज़रें वहीं टिक जाती थीं। आज बारिश की बूंदों ने उनके कपड़ों को गीला कर दिया था, जिससे उनके बड़े-बड़े तरबूज साफ झलक रहे थे और उनके ऊपर छोटे-छोटे मटर की आकृति साफ़ दिखाई दे रही थी। समीर के मन में एक अजीब सी हलचल मच गई और उसका खीरा उसकी पैंट के अंदर ही अंगड़ाई लेने लगा था। वह बस कल्पना कर रहा था कि कब उसे उस गहरी खाई में उतरने का मौका मिलेगा जिसे देखने के लिए वह हफ्तों से तड़प रहा था।
कविता भाभी का व्यक्तित्व बहुत ही शांत था लेकिन उनकी आँखों में एक अनकही प्यास हमेशा रहती थी जो समीर को अपनी ओर खींचती थी। उनके शरीर की बनावट किसी कामुक अप्सरा जैसी थी, खासकर जब वह अपनी साड़ी का पल्लू गिराती थीं तो उनके गोरे तरबूज समीर के होश उड़ा देते थे। समीर ने कई बार सपने में उनके साथ खुदाई करने के दृश्य देखे थे और हर बार उसका रस बिस्तर पर ही निकल जाता था। वह अक्सर बहाने ढूंढता था कि किसी तरह उनके घर जा सके और उस रेशमी त्वचा को छू सके जो किसी मखमली फल की तरह मुलायम लगती थी। आज जब बिजली कड़की और कविता भाभी डर कर पीछे मुड़ीं, तो समीर ने हिम्मत जुटाई और उनके घर की ओर बढ़ गया।
जब समीर ने दरवाजा खटखटाया तो कविता ने उसे अंदर बुलाया, वह पूरी तरह भीग चुकी थीं और उनकी साड़ी उनके बदन से ऐसे चिपकी थी जैसे कोई बेल पेड़ से लिपटी हो। समीर की नज़रें बार-बार उनके सीने पर उठ रहे उन गोल तरबूजों पर जा रही थीं जिनके मटर ठंड और उत्तेजना के कारण अकड़ गए थे। कमरे में एक सोंधी सी महक फैली हुई थी जो समीर की कामुकता को और भी भड़का रही थी, वह कविता के इतने करीब था कि उनकी सांसों की गरमाहट महसूस कर सकता था। दोनों के बीच एक गहरा और भावनात्मक खिंचाव था जो शब्दों से परे था, बस एक स्पर्श की देरी थी जो सब कुछ बदल देने वाला था। समीर ने धीरे से अपना हाथ कविता के कंधे पर रखा, तो वह कांप उठीं लेकिन उन्होंने उसका हाथ हटाया नहीं, बल्कि अपनी आँखें मूंद लीं।
समीर ने जब उनके भीगे बालों को कान के पीछे किया, तो कविता के चेहरे पर एक गुलाबी चमक आ गई जो उनकी गहरी इच्छा को साफ़ बयां कर रही थी। समीर ने महसूस किया कि कविता का पूरा शरीर थरथरा रहा था और वह धीरे-धीरे उसकी ओर झुक रही थीं, जैसे कोई प्यासा कुआं पानी की तलाश में हो। उसने अपने हाथों को नीचे खिसकाते हुए उनकी कमर को कसकर पकड़ा और उन्हें अपनी ओर खींच लिया, जिससे उसके खीरे का स्पर्श उनकी जांघों पर महसूस होने लगा। कविता ने एक आह भरी और समीर के गले लग गईं, उनके तरबूज समीर के सीने पर दब रहे थे जिससे उसे एक असीम सुख का अनुभव हो रहा था। अब झिझक पूरी तरह खत्म हो चुकी थी और मन का संघर्ष एक ज्वालामुखी की तरह फटने को तैयार था, जहाँ सिर्फ प्यास और जुनून बचा था।
समीर ने कविता के होंठों को चूमना शुरू किया, यह चुंबन इतना गहरा था कि दोनों की सांसे एक-दूसरे में विलीन हो रही थीं, जैसे दो नदियां एक समुद्र में मिल रही हों। उसने धीरे-धीरे उनके ब्लाउज के हुक खोले और जैसे ही वह कपड़ा हटा, दो बड़े और रसीले तरबूज बाहर निकल आए जिनके मटर लाल और सख्त हो चुके थे। समीर ने अपना मुँह एक तरबूज पर रखा और उसे धीरे-धीरे चूसने लगा, जिससे कविता के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली कराह निकली जो पूरे कमरे में गूँज गई। वह अपने हाथों से समीर के बालों को सहला रही थीं और उसका सिर अपने सीने में और गहराई से दबा रही थीं, जैसे वह चाहती हों कि वह सारा रस अभी पी जाए। समीर ने महसूस किया कि उसकी उत्तेजना अब चरम पर थी और उसका खीरा अब पैंट की कैद से बाहर निकलने के लिए बेताब हो रहा था।
कविता ने समीर की पैंट की ज़िप खोली और जैसे ही उसका गर्म और सख्त खीरा बाहर निकला, उनकी आँखें फटी की फटी रह गई और उन्होंने उसे अपने कोमल हाथों में थाम लिया। समीर ने देखा कि कविता की खाई अब पूरी तरह गीली हो चुकी थी और वहां से एक चिपचिपा रस बह रहा था जो इस खुदाई की शुरुआत का संकेत था। समीर ने उन्हें बिस्तर पर लिटाया और उनके पैरों को फैलाकर उस गहरी और रेशमी खाई का मुआयना करने लगा जहाँ काले-काले बाल एक जंगल की तरह फैले हुए थे। उसने अपना चेहरा नीचे झुकाया और उनकी खाई को अपनी जीभ से चाटना शुरू किया, जिससे कविता का शरीर बिजली के झटके की तरह उछलने लगा और वह बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींचने लगीं। वह बार-बार समीर का नाम लेकर उसे पुकार रही थीं और कह रही थीं कि उसे अब और इंतज़ार नहीं होता।
समीर ने अब अपनी उंगली से उस खाई की गहराई को मापना शुरू किया, वह अपनी उंगली को अंदर-बाहर कर रहा था जिससे कविता की कामुकता और भी बढ़ती जा रही थी। खाई के अंदर की गर्मी और चिकनाहट समीर को पागल बना रही थी, उसने अपनी दो उंगलियां अंदर डालीं और तेज़ी से खुदाई करने लगा जिससे वहाँ से ‘चप-चप’ की आवाज़ आने लगी। कविता अपने कूल्हों को हवा में उठा रही थीं ताकि समीर का स्पर्श और गहराई तक पहुँच सके, उनकी साँसें तेज़ हो गई थीं और उनका शरीर पसीने से तरबतर हो गया था। समीर ने अब अपने खीरे को उनके मुँह के पास ले गया और कविता ने बिना किसी झिझक के उसे अपने मुँह में भर लिया और उसे किसी लॉलीपॉप की तरह चूसने लगीं। खीरे पर उनकी जीभ का स्पर्श समीर को स्वर्ग जैसा आनंद दे रहा था और उसे लग रहा था कि उसका रस अभी निकल जाएगा।
अब खुदाई का असली वक्त आ गया था, समीर ने कविता को सीधा लिटाया और अपने भारी खीरे को उनकी खाई के मुहाने पर टिका दिया, जो पूरी तरह गीली और खुली हुई थी। उसने एक ज़ोरदार धक्का लगाया और खीरा आधा उनकी खाई के अंदर समा गया, जिससे कविता के मुँह से एक ज़ोरदार चीख निकली जो दर्द और आनंद का मिश्रण थी। समीर रुका नहीं और उसने दूसरा धक्का मारा जिससे पूरा का पूरा खीरा उनकी गहराई में जा धंसा, और कविता ने अपनी टांगें समीर की कमर के चारों ओर कस लीं। समीर अब धीमी गति से अपने शरीर को आगे-पीछे कर रहा था, हर धक्के के साथ खीरा उनकी खाई की दीवारों को रगड़ता हुआ अंदर जा रहा था जिससे दोनों को एक अलौकिक सुख की प्राप्ति हो रही थी। कमरे में केवल उनके शरीर के टकराने की आवाज़ और भारी साँसों का शोर था जो इस मिलन की गवाही दे रहा था।
समीर ने अब रफ्तार बढ़ाई और पूरी ताकत के साथ कविता को खोदना शुरू किया, हर धक्का इतना गहरा था कि वह उनके गर्भाशय के द्वार को छू रहा था। कविता अब पूरी तरह बेकाबू हो चुकी थीं, वह समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ा रही थीं और उनके मुँह से बस ‘ओह समीर, और तेज़ खोदो’ के शब्द निकल रहे थे। समीर ने उनके पिछवाड़े को ऊपर उठाया और अब पिछवाड़े की तरफ से खुदाई करने की मुद्रा में आ गया, जिससे वह और भी गहराई तक पहुँच सके। इस स्थिति में उनके तरबूज नीचे लटक रहे थे जिन्हें समीर अपने हाथों से मसल रहा था और उनके मटर को अपनी उंगलियों से मरोड़ रहा था। कविता की खाई अब इतनी गीली हो गई थी कि खीरा बिना किसी रुकावट के अंदर-बाहर हो रहा था और हर बार एक मधुर संगीत जैसी आवाज़ पैदा कर रहा था।
जैसे-जैसे खुदाई अपने चरम पर पहुँच रही थी, समीर की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा और उसे लगा कि अब उसका बांध टूटने वाला है। कविता का शरीर भी अब पूरी तरह से कांपने लगा था और उनकी खाई समीर के खीरे को कसकर जकड़ रही थी, जो इस बात का संकेत था कि उनका रस निकलने वाला है। समीर ने आखिरी कुछ ज़ोरदार धक्के मारे और कविता के अंदर अपना सारा गरम रस छोड़ दिया, उसी क्षण कविता ने भी एक लंबी कराह भरी और उनका रस भी बह निकला। दोनों एक-दूसरे की बाहों में ढीले पड़ गए, उनके शरीर पसीने और प्रेम के रसों से सराबोर थे, और कमरे का तापमान अब भी बहुत गर्म महसूस हो रहा था। समीर ने कविता के माथे को चूमा और वह दोनों कुछ देर तक उसी अवस्था में लेटे रहे, जैसे वक्त थम गया हो और इस दुनिया में उन दोनों के सिवा कोई और न हो।
खुदाई के बाद की वह शांति बहुत ही सुकून देने वाली थी, कविता की आँखों में एक संतुष्टि और कृतज्ञता का भाव था जो समीर के दिल को छू गया। समीर ने धीरे से अपना खीरा उनकी खाई से बाहर निकाला जो अब पूरी तरह नरम हो चुका था और रसों से लिपटा हुआ था। कविता ने उसे एक प्यार भरी मुस्कान दी और अपने हाथों से समीर का चेहरा सहलाया, उनके चेहरे पर अब भी उस आनंद की चमक बाकी थी जो उन्हें अभी मिला था। समीर ने महसूस किया कि यह केवल शारीरिक संबंध नहीं था, बल्कि दो आत्माओं का मिलन था जिन्होंने अपनी तन्हाई को एक-दूसरे के शरीर में विसर्जित कर दिया था। उस रात की बारिश ने न केवल बाहर की प्यास बुझाई थी, बल्कि उनके अंदर की उस आग को भी शांत कर दिया था जो बरसों से सुलग रही थी।