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अर्जुन पिछले कई सालों से अपने बड़े भाई और भाभी, प्रीति के साथ रह रहा था। उसका भाई, रवि, अक्सर काम के सिलसिले में महीनों घर से बाहर रहता था, और इस दौरान अर्जुन और प्रीति भाभी ही घर में एक-दूसरे का सहारा होते थे। प्रीति भाभी उम्र में अर्जुन से आठ साल बड़ी थीं, लेकिन उनकी खूबसूरती और जवानी ऐसी थी कि अर्जुन की आँखें अक्सर उन पर टिक जाती थीं। वह एक घरेलू महिला थीं, शांत स्वभाव की लेकिन उनकी हर अदा में एक गहरा आकर्षण था, जो अर्जुन को भीतर से छू जाता था।
प्रीति भाभी का शरीर बेहद मनमोहक था, मानो किसी कुशल मूर्तिकार ने उन्हें बड़े प्यार से तराशा हो। उनके तरबूज बिल्कुल सधे हुए और गोल-मटोल थे, जो साड़ी या सूट में भी अपनी उपस्थिति दर्ज कराते थे। उनकी कमर इतनी पतली थी कि देखने वाले का मन करता था कि वह उसे अपनी बाहों में भर ले, और उनके पिछवाड़े का उभार ऐसा था कि जब वह चलती थीं, तो हर कदम पर एक धीमी लहर सी उठती थी, जो अर्जुन के दिल की धड़कनों को बढ़ा देती थी। उनकी त्वचा इतनी चिकनी थी कि छूने का मन करता था।
रवि भैया के बाहर रहने के कारण अर्जुन और प्रीति भाभी के बीच एक अजीब सी निकटता आ गई थी। वे घंटों बातें करते, एक-दूसरे का हाल-चाल पूछते, और अक्सर हंसी-मजाक में दिन गुजर जाता। प्रीति भाभी अर्जुन का बहुत ख्याल रखती थीं, उसके खाने-पीने से लेकर पढ़ाई तक का ध्यान रखती थीं। इस भावनात्मक जुड़ाव ने धीरे-धीरे उनके बीच एक अनकहा पुल बना दिया था, एक ऐसा पुल जिस पर भावनाएँ बिना किसी रोक-टोक के बहने लगी थीं, जो दोनों के लिए ही नया और उत्तेजक था।
समय के साथ, अर्जुन के मन में प्रीति भाभी के लिए सिर्फ सम्मान और प्यार ही नहीं, बल्कि एक गहरी शारीरिक लालसा भी पनपने लगी थी। वह अक्सर रात में अपने बिस्तर पर लेटा हुआ भाभी के ख्यालों में खो जाता। उनके तरबूज, उनकी पतली कमर, और उनका हर चाल-ढाल उसे बेचैन कर देता था। वह कल्पना करता कि भाभी उसे प्यार से छू रही हैं, और यह सोचकर उसके खीरे में अकड़न आ जाती। प्रीति भाभी भी अर्जुन की युवा ऊर्जा और उसकी गहरी आँखों की चमक को महसूस करती थीं, और कभी-कभी उनकी नज़रें मिलतीं तो एक अजीब सी बिजली दौड़ जाती।
अर्जुन अपने मन के इस द्वंद्व से जूझ रहा था। एक तरफ वह अपनी भाभी का सम्मान करता था, और दूसरी तरफ उसके युवा शरीर की इच्छाएँ उसे अंदर ही अंदर मथ रही थीं। प्रीति भाभी भी अर्जुन के बदलते व्यवहार को भांप रही थीं। जब भी उनकी नज़रें मिलतीं, एक अजीब सी झिझक दोनों के चेहरों पर तैर जाती थी। उन्हें भी अर्जुन की आँखों में एक ऐसी चाहत दिखती थी, जो सिर्फ एक छोटे देवर की नहीं थी। उनका मन भी मानता था कि कहीं न कहीं उनके भीतर भी अर्जुन के लिए एक अलिखित आकर्षण पैदा हो रहा था, जिसे वे स्वीकारने से डर रही थीं।
एक रात, बारिश के बाद मौसम में एक अजीब सी नमी और ठंडक थी। अर्जुन को हल्का बुखार महसूस हुआ। प्रीति भाभी ने उसे अपने कमरे में बुलाया और उसके माथे पर हाथ रखकर देखा। उनका हाथ जैसे ही अर्जुन के माथे से छूटा, एक कंपकंपी दोनों के शरीरों में दौड़ गई। यह पहला सीधा स्पर्श था, जो सिर्फ बीमारी के नाम पर हुआ था। प्रीति भाभी का नरम हाथ, उसकी त्वचा पर उसकी गर्माहट, और उस स्पर्श से उभरी अजब सी सिहरन, अर्जुन ने अपनी पलकें बंद कर लीं और उस पल को अपने भीतर महसूस करने लगा। भाभी भी थोड़ी सकपका गईं, लेकिन फिर उन्होंने खुद को संभाला।
अगले कुछ दिन, यह छोटा सा स्पर्श दोनों के दिमाग में घूमता रहा। वे अब एक-दूसरे से नज़रें मिलाने में और भी झिझकने लगे थे, लेकिन उनके भीतर की आग धीरे-धीरे और भड़क रही थी। एक शाम, वे साथ बैठकर टीवी देख रहे थे। अचानक प्रीति भाभी की साड़ी का पल्लू सरक गया और उनके तरबूज का ऊपरी हिस्सा थोड़ा सा दिख गया। अर्जुन की नज़रें वहीं टिक गईं। भाभी ने पलटा और अर्जुन को अपनी ओर घूरते देखा। इस बार, उन्होंने पल्लू ठीक करने की बजाय, एक हल्की सी मुस्कान दी और जानबूझकर थोड़ा और खिसक गईं, जिससे अर्जुन को उनके तरबूज की गहरी खाई और भी स्पष्ट रूप से दिखाई दे।
अर्जुन का दिल तेजी से धड़कने लगा। उसने हिम्मत जुटाई और धीरे से अपना हाथ भाभी की जांघ पर रख दिया, जो साड़ी के ऊपर से ही थी। भाभी ने एक गहरी सांस ली, लेकिन अपना हाथ नहीं हटाया। अर्जुन ने धीरे-धीरे अपना हाथ ऊपर की ओर सरकाया, उनकी पतली कमर की ओर। भाभी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक धीमी आह भरते हुए अपना सिर पीछे सोफे पर टिका दिया। अर्जुन ने महसूस किया कि यह सहमति है, एक मौन आमंत्रण। उसने अपने हाथ को उनके पेट पर फेरा, फिर उनके तरबूज के किनारे पर रखा।
अब दोनों के बीच की दूरी खत्म हो चुकी थी। अर्जुन ने धीरे से भाभी के कंधे पर हाथ रखा और उन्हें अपनी ओर खींच लिया। भाभी ने बिना किसी विरोध के खुद को अर्जुन के हवाले कर दिया। अर्जुन ने अपने होंठों को भाभी के नरम होंठों से मिलाया। यह एक धीमा और गहरा मिलन था। भाभी ने भी अपनी आँखें बंद करके अर्जुन के होंठों का रस पीना शुरू किया। उनके होंठ एक-दूसरे में ऐसे समा गए थे जैसे सदियों से बिछड़े प्रेमी मिले हों। अर्जुन ने अपने हाथों को भाभी के तरबूज पर रखा और उन्हें सहलाने लगा। भाभी के मुंह से एक धीमी सी सिसकी निकली, जो उनकी इच्छा को बयां कर रही थी।
अर्जुन ने भाभी को अपनी बाहों में उठाया और उन्हें अपने कमरे की ओर ले गया। रास्ते भर उनके होंठ एक-दूसरे से जुडे़ रहे। जैसे ही वे बिस्तर पर पहुँचे, अर्जुन ने भाभी को धीरे से लिटाया। उनके तरबूज अर्जुन के हाथों में थे, और वह उन्हें धीरे-धीरे मसल रहा था। भाभी की सांसें तेज हो चुकी थीं। उन्होंने अर्जुन की कमीज के बटन खोले और उसे उतार दिया। अर्जुन के मजबूत युवा शरीर को देखकर भाभी की आँखों में एक चमक आ गई। अब कमरे में सिर्फ उनकी तेज सांसों और धड़कनों की आवाजें गूँज रही थीं।
अर्जुन ने भाभी की साड़ी को धीरे-धीरे सरकाया। उनकी गुलाबी पेटीकोट और ब्लाउज में ढके तरबूज और भी आकर्षक लग रहे थे। भाभी ने शर्माते हुए अपनी आँखें बंद कर लीं। अर्जुन ने उनके ब्लाउज के हुक खोले, और जैसे ही ब्लाउज हटा, भाभी के दोनों तरबूज आज़ाद हो गए। वे इतने पूर्ण और सुडौल थे कि अर्जुन उन्हें बस देखता ही रह गया। उनके मटर बिल्कुल सख्त और गुलाबी थे। अर्जुन ने अपने होंठों को एक तरबूज पर रखा और उसे चूसने लगा, जबकि दूसरे तरबूज को अपने हाथ में लेकर सहला रहा था। भाभी के शरीर में एक तेज़ कंपकंपी दौड़ गई, और उन्होंने अर्जुन के बालों को अपनी मुट्ठी में कस लिया।
अर्जुन धीरे-धीरे नीचे आया, भाभी के पेट पर खीरा चाटते हुए। भाभी का शरीर एक आग की भट्ठी जैसा गरम हो चुका था। उसने उनकी पेटीकोट को भी हटा दिया, और अब भाभी पूरी तरह से नग्न थीं, उनके बाल एक गहरी खाई के ऊपर फैले हुए थे। अर्जुन ने अपनी उंगली से उन बालों को हटाकर खाई के द्वार को देखा। वह गुलाबी और हल्की नम थी, मानो उसे छूने के लिए इंतजार कर रही हो। भाभी ने अपनी टाँगें थोड़ी सी फैला दीं, एक मौन निमंत्रण। अर्जुन ने धीरे से अपनी उंगली खाई में डाली, और भाभी के मुंह से एक लंबी, सुखद आह निकली। “उम्म… अर्जुन… और गहरा…” उन्होंने फुसफुसाया।
अर्जुन ने अपनी उंगली को खाई में आगे-पीछे करना शुरू किया, और भाभी का शरीर खुशी से झूम उठा। वह अपने कूल्हों को हिलाने लगीं, और उनकी साँसें और भी तेज़ हो गईं। “ओह… अर्जुन… यह कितना अच्छा लग रहा है… मुझे और चाहिए…” उन्होंने अपने बालों में अर्जुन का सिर दबाते हुए कहा। अर्जुन ने अपनी दूसरी उंगली भी खाई में डाली और दोनों उंगलियों से उसे खोदने लगा। भाभी की चीखें अब धीमी कराहों में बदल चुकी थीं, जो पूरे कमरे में गूँज रही थीं। “हाँ… मेरे शेर… ऐसे ही… मुझे पूरा भर दो…” उन्होंने कहा।
अर्जुन ने अब अपनी पैंट उतारी, और उसका खीरा पूरी तरह से अकड़ा हुआ, सीधा खड़ा था। भाभी ने अपनी आँखें खोलीं और अर्जुन के बड़े खीरे को देखा। उनके चेहरे पर एक हल्की सी शर्म और गहरी लालसा थी। “अर्जुन… यह तो बहुत बड़ा है…” उन्होंने धीरे से कहा, लेकिन उनकी आँखों में एक चमक थी। अर्जुन ने धीरे से अपना खीरा भाभी की खाई के द्वार पर रखा। भाभी ने अपने कूल्हों को थोड़ा सा ऊपर उठाया, जैसे उसे अंदर लेने के लिए तैयार हों। अर्जुन ने एक गहरा धक्का दिया, और खीरा धीरे-धीरे खाई में समाने लगा।
भाभी ने एक तेज़ सिसकी ली, उनकी आँखें बंद हो गईं, और उन्होंने अर्जुन को कसकर पकड़ लिया। “आह… धीरे… अर्जुन… बहुत दर्द हो रहा है…” उन्होंने कहा, लेकिन उनकी आवाज़ में दर्द से ज्यादा खुशी थी। अर्जुन थोड़ी देर रुका, जब भाभी का शरीर उसके खीरे को अपनाने लगा। फिर उसने धीरे-धीरे अपनी कमर हिलाना शुरू किया। हर धक्के के साथ, भाभी का शरीर ऊपर उठता और नीचे आता। “ऐसे ही… मेरे प्यारे… अब तेज़ करो…” उन्होंने अर्जुन के कंधे पर नाखून गड़ाते हुए कहा। अर्जुन ने अपनी गति बढ़ा दी, और उनके शरीर एक-दूसरे से टकराने लगे, एक मधुर ध्वनि उत्पन्न करते हुए।
“मैं… मैं नहीं रोक सकती… अर्जुन…” भाभी ने हाँफते हुए कहा। “तुम्हारी खाई कितनी गरम और टाइट है, भाभी… मैं तुम्हें पूरी तरह से भर दूँगा…” अर्जुन ने गहरी साँस लेते हुए कहा। वे दोनों अब पूरी तरह से इस खुदाई में खो चुके थे। उनके शरीर एक लय में चल रहे थे, पसीना उनकी त्वचा पर चमक रहा था, और उनके होंठ बार-बार एक-दूसरे को छू रहे थे। भाभी के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे, और अर्जुन उन्हें अपने हाथों से सहारा दे रहा था। “तेज़… और तेज़… मुझे रस चाहिए… मुझे रस निकालना है…” भाभी चीखने लगीं।
अर्जुन ने अपनी पूरी ताकत से धक्का लगाना शुरू किया। खाई के अंदर उसका खीरा गहराई तक जा रहा था, और भाभी का शरीर काँप रहा था। अचानक, भाभी ने एक तेज़ चीख मारी और उनका शरीर ढीला पड़ गया। उनका रस निकल चुका था। “आह… अर्जुन… मेरा रस निकल गया…” उन्होंने फुसफुसाते हुए कहा। कुछ ही क्षणों में, अर्जुन को भी लगा कि वह अब और रोक नहीं पाएगा। उसने एक आखिरी, गहरा धक्का दिया, और उसका सारा रस भाभी की गरम खाई में छूट गया। उनके शरीर एक-दूसरे से चिपक गए, और वे दोनों हाँफते हुए एक-दूसरे की बाहों में ढीले पड़ गए।
खुदाई के बाद, अर्जुन और प्रीति भाभी एक-दूसरे की बाहों में लिपटे रहे। उनका शरीर पसीने से भीगा हुआ था, और उनकी साँसें अभी भी तेज थीं, लेकिन उनके चेहरों पर एक गहरी शांति और तृप्ति थी। भाभी ने अपना सिर अर्जुन की छाती पर रखा और उसके दिल की धड़कनों को सुना। अर्जुन ने उनके बालों में अपनी उंगलियाँ फेरीं, और एक गहरी, संतोषजनक साँस ली। “मुझे कभी नहीं पता था कि ऐसा भी कुछ हो सकता है, अर्जुन…” भाभी ने धीमी आवाज़ में कहा। अर्जुन ने उन्हें कसकर गले लगाया और उनके माथे पर खीरा चाटा। उनकी आँखों में एक नया, गहरा प्रेम और जुड़ाव था, जो इस रात की खुदाई ने पैदा किया था। यह सिर्फ एक शारीरिक मिलन नहीं था, बल्कि दो अकेले शरीरों और आत्माओं का एक-दूसरे में पूर्ण समर्पण था, जिसने उन्हें एक अनूठी शांति प्रदान की थी।