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भाभी की रसभरी चु@@ई


भाभी की रसभरी चु@@ई—>

गर्मियों की वह दोपहर आज भी आर्यन के जेहन में किसी गहरे और मीठे घाव की तरह ताज़ा थी जब पूरा घर सन्नाटे की चादर ओढ़े हुए गहरी नींद में सोया हुआ था और बाहर लू के थपेड़े खिड़कियों से टकरा रहे थे। आर्यन अपने बड़े भाई के घर छुट्टियों में आया हुआ था जहाँ उसकी प्यारी और बेहद खूबसूरत भाभी सुनीता अपनी गृहस्थी संभालती थी लेकिन उस दिन की तपिश कुछ अलग ही तरह की बेचैनी आर्यन के मन में पैदा कर रही थी जिसे वह चाहकर भी नज़रअंदाज़ नहीं कर पा रहा था। सुनीता भाभी की उम्र करीब तीस साल रही होगी लेकिन उनका यौवन जैसे किसी ढलती शाम का नहीं बल्कि खिलते हुए सूरज का सा अहसास कराता था जिसमें एक अजीब सी कशिश और खिंचाव भरा हुआ था जो आर्यन को अपनी ओर खींच रहा था।

सुनीता भाभी की देह किसी तराशे हुए संगमरमर की मूरत जैसी थी जिसमें उनके सीने पर लदे दो बड़े और रसीले तरबूज किसी भी पुरुष का मन डोलाने के लिए काफी थे जो उनकी सूती साड़ी के महीन कपड़े से अक्सर बाहर निकलने को बेताब दिखते थे। उनके तरबूजों के बीच की वह गहरी घाटी और उन पर उभरते छोटे-छोटे मटर के दानों जैसे उभार जब कभी उनकी गीली साड़ी से चिपक जाते तो आर्यन की धड़कनें बेकाबू हो जाती थीं और उसका गला सूखने लगता था। भाभी का निचला हिस्सा यानी उनका भारी और मांसल पिछवाड़ा जब चलते समय धीरे-धीरे हिलता था तो ऐसा लगता था मानो प्रकृति ने उन्हें फुर्सत में बैठकर बनाया हो और उनकी चौड़ी कमर का घुमाव किसी गहरी खाई की ओर ले जाने वाला रास्ता लगता था।

आर्यन और सुनीता के बीच एक ऐसा भावनात्मक रिश्ता था जो केवल देवर और भाभी तक सीमित नहीं था बल्कि वे दोनों घंटों बैठकर अपने दिल की बातें साझा करते थे जिसमें अक्सर गहरी और दबी हुई भावनाओं का आदान-प्रदान होता रहता था। सुनीता अक्सर अपने अकेलेपन और भाई साहब के काम के प्रति अत्यधिक व्यस्तता का ज़िक्र करते समय आर्यन की आँखों में झांकती थी जहाँ उसे एक ऐसी सांत्वना और प्यास दिखती थी जो शायद उसे अपने पति से कभी नहीं मिल पाती थी। उस दिन की दोपहर में जब आर्यन रसोई में पानी पीने गया तो उसने देखा कि भाभी पसीने से तर-बतर होकर सिंक के पास खड़ी थीं और उनकी साड़ी का पल्लू कंधे से ढलकर उनके भारी तरबूजों को लगभग आधा खुला छोड़ चुका था।

आर्यन की निगाहें उन गोरे और चमकदार तरबूजों पर टिक गईं जिन पर पसीने की बूंदें फिसलकर नीचे की गहरी खाई की ओर जा रही थीं और भाभी ने जब उसकी ओर मुड़कर देखा तो उनकी आँखों में कोई गुस्सा नहीं बल्कि एक गहरी हसरत और मौन स्वीकृति साफ़ झलक रही थी। वह पल ऐसा था जहाँ समय जैसे रुक गया था और आर्यन के मन में चल रहा झिझक और संस्कारों का संघर्ष अचानक उस दहकती हुई इच्छा के सामने घुटने टेकने लगा था जो सालों से उसके सीने में दबी हुई थी। सुनीता ने अपनी नज़रें नहीं हटाईं बल्कि एक हल्की सी मुस्कान के साथ आर्यन के करीब आकर खड़ी हो गई जिससे उसके बदन की भीनी सी खुशबू और पसीने की महक ने आर्यन के होश फाख्ता कर दिए।

पहला स्पर्श तब हुआ जब आर्यन ने कांपते हुए हाथों से भाभी की कमर पर हाथ रखा और सुनीता ने अपनी आँखें बंद करते हुए एक लंबी और गर्म आह भरी जो सीधे आर्यन के कानों में पिघले हुए शीशे की तरह उतर गई। उसने धीरे से अपना हाथ ऊपर की ओर सरकाया और उन भारी तरबूजों को अपने हाथों की गिरफ्त में लिया तो भाभी के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली कराह निकली और उनके शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई जो स्पर्श की भूख को और बढ़ा रही थी। भाभी के मटर अब कड़े होकर आर्यन की हथेलियों को चुभने लगे थे और आर्यन ने बिना कुछ सोचे अपने होंठ उनके गर्दन के पास ले जाकर उस नम त्वचा का स्वाद लेना शुरू कर दिया जिससे माहौल और भी उत्तेजक हो गया।

धीरे-धीरे यह स्पर्श और भी गहरा होता गया और आर्यन ने भाभी की साड़ी के पल्लू को पूरी तरह हटाकर उनके उन रसीले तरबूजों को आज़ाद कर दिया जो अब उसके सामने अपनी पूरी भव्यता के साथ नाच रहे थे और वह उन्हें बारी-बारी से अपने मुँह में भरकर चूसने लगा। सुनीता ने आर्यन के बालों में अपनी उंगलियाँ फंसा दीं और उसे और भी जोर से अपने सीने से सटा लिया मानो वह इस अहसास को अपने भीतर सोख लेना चाहती हो और उसकी साँसों की तेज़ी अब एक तूफ़ान का रूप ले रही थी। आर्यन का खीरा अब उसकी पेंट के भीतर पूरी तरह से उफन रहा था और वह भाभी की जांघों के बीच की उस रेशमी खाई को महसूस करने के लिए बेताब हो रहा था जहाँ से अब रस की महक आने लगी थी।

आर्यन ने भाभी को रसोई के स्लैब पर बैठा दिया और उनके पैरों को फैलाकर उनकी उस नम और गहरी खाई के दर्शन किए जो काले घने बालों के बीच छिपी हुई एक जन्नत की तरह लग रही थी और जहाँ से हल्का-हल्का रस रिसकर बाहर आ रहा था। उसने झुककर अपनी जुबान से उस खाई को चाटना शुरू किया तो भाभी का शरीर कमान की तरह मुड़ गया और वह आर्यन का सिर अपनी खाई में और गहराई से धकेलने लगीं क्योंकि उन्हें वह अहसास पागल कर रहा था। सुनीता के मुँह से निकलने वाली आवाज़ें अब और भी बुलंद हो गई थीं और वह बार-बार आर्यन का नाम पुकारते हुए अपने पिछवाड़े को ऊपर-नीचे कर रही थीं ताकि आर्यन की जुबान हर उस कोने तक पहुँच सके जहाँ खुजली मची हुई थी।

अब सब्र का बांध टूट चुका था और आर्यन ने अपनी पेंट उतारकर अपना कड़ा और लंबा खीरा बाहर निकाला जिसे देखते ही सुनीता की आँखें फटी की फटी रह गईं क्योंकि वह खीरा अपनी पूरी ताकत और लंबाई के साथ भाभी की खाई में उतरने को तैयार खड़ा था। सुनीता ने कांपते हुए हाथों से उस खीरे को थामा और उसे अपने मुँह में लेकर धीरे-धीरे चूसना शुरू किया जिससे आर्यन के पूरे शरीर में बिजली की लहर दौड़ गई और उसे लगा कि उसका रस अभी निकल जाएगा लेकिन उसने खुद पर काबू पाया। भाभी ने आर्यन के खीरे को पूरा गले तक उतार लिया और उसे वह सुख दिया जिसकी उसने कभी कल्पना भी नहीं की थी और अब समय था उस अंतिम और महा-संग्राम का जिसे खुदाई कहा जाता है।

आर्यन ने भाभी को सामने से खोदना शुरू करने के लिए सीधा खड़ा किया और अपना भारी खीरा उनकी उस तंग और गीली खाई के मुहाने पर सेट किया जहाँ से गर्मी की लहरें निकल रही थीं और एक ज़ोरदार धक्के के साथ आधा खीरा भीतर उतार दिया। सुनीता के हलक से एक तीखी चीख निकली जो दर्द और आनंद का एक अद्भुत मिश्रण थी लेकिन जैसे ही आर्यन ने पूरा खीरा जड़ तक अंदर धंसाया तो भाभी ने अपनी टाँगें आर्यन की कमर के चारों ओर कस लीं। खुदाई की यह प्रक्रिया अब बहुत तेज़ और दमदार हो गई थी और हर धक्के के साथ ‘चपा-चप’ की आवाज़ें गूँज रही थीं जो उस सन्नाटे को चीरती हुई दोनों के दिलों की धड़कनें बढ़ा रही थीं और भाभी के तरबूज हवा में जोर-जोर से उछल रहे थे।

आर्यन अब भाभी को पिछवाड़े से खोदने के मूड में था इसलिए उसने उन्हें घुमाकर झुकाया और उनके भारी पिछवाड़े के बीच से अपनी गहराई नापते हुए दोबारा उस खाई में प्रवेश किया जो अब पूरी तरह से फैल चुकी थी और खुदाई के लिए बेकरार थी। इस पोजीशन में खुदाई और भी गहरी हो रही थी और आर्यन के धक्के अब भाभी के गर्भाशय तक महसूस हो रहे थे जिससे सुनीता पागलों की तरह अपना सिर बिस्तर पर पटक रही थी और गालियां और प्यार भरे शब्द एक साथ बोल रही थी। भाभी चिल्ला रही थी कि ‘ओह आर्यन, मुझे और ज़ोर से खोदो, आज मेरा पूरा रस निकाल दो, तुम्हारा यह खीरा कितना मज़ेदार है’ और आर्यन भी पूरे जोश में आकर उनके पिछवाड़े पर थप्पड़ मारते हुए अपनी खुदाई की रफ़्तार बढ़ाता जा रहा था।

काफी देर तक चली इस जबरदस्त खुदाई के बाद जब दोनों का शरीर पसीने से नहा गया था और साँसें उखड़ने लगी थीं तब आर्यन को महसूस हुआ कि उसका रस अब छूटने वाला है और ठीक उसी समय सुनीता की खाई ने भी अपना पूरा रस छोड़ दिया जिससे आर्यन का खीरा पूरी तरह गीला हो गया। आर्यन ने अंतिम कुछ ज़ोरदार धक्के लगाए और अपना सारा गर्म रस भाभी की उस गहरी खाई के भीतर उड़ेल दिया जिससे सुनीता का पूरा शरीर झटके लेने लगा और वह बेदम होकर बिस्तर पर गिर पड़ी। दोनों एक-दूसरे की बाहों में लिपटे हुए थे और उनके जिस्म से उठती हुई वह महक और पसीना इस बात की गवाही दे रहा था कि आज एक रूहानी और जिस्मानी प्यास बुझ चुकी थी जिसने उन दोनों को हमेशा के लिए एक गुप्त बंधन में बाँध दिया था।

खुदाई खत्म होने के बाद की वह शांति और भी सुखद थी जहाँ आर्यन सुनीता के गीले बालों को सहला रहा था और भाभी उसके सीने पर अपना सिर रखे हुए धीरे-धीरे अपनी साँसें सामान्य कर रही थीं लेकिन उनकी आँखों की चमक बता रही थी कि उन्हें वह सुकून मिल गया है जिसकी तलाश वे बरसों से कर रही थीं। भाभी ने आर्यन के कान में धीरे से फुसफुसाते हुए कहा कि ‘तुमने आज मुझे सच में एक औरत होने का अहसास कराया है’ और यह सुनकर आर्यन ने उन्हें और भी कसकर अपनी बाहों में भर लिया। वह दोपहर अब ढल चुकी थी और सूरज की रोशनी धीमी पड़ गई थी लेकिन उन दोनों के बीच जो आग लगी थी वह अब एक शांत और ठंडी राख की तरह फैल गई थी जो अगली बार फिर से जलने का इंतज़ार कर रही थी।

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