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जंगल की वो रात

माया उस घने जंगल के किनारे बने छोटे से झोपड़े में अकेली बैठी थी। रात इतनी गहरी और घनी थी कि बाहर सिर्फ पत्तियों की फुसफुसाहट, हवा की सिसकारी और दूर-दूर उल्लू की उदास, लंबी पुकार सुनाई दे रही थी। शहर की चकाचौंध से भागकर वह यहां आई थी – जहां न कोई सवाल करता था, न कोई जवाब मांगता था। उसकी सफेद सूती ड्रेस झोपड़े की पुरानी, छेद वाली छत से टपकती बूंदों से पूरी तरह भीग चुकी थी। कपड़ा अब उसके शरीर से दूसरी त्वचा की तरह चिपक गया था। हर सांस के साथ उसके तरबूज इतने नरम और भारी होकर उठ-गिर रहे थे कि उनकी गोलाई, उनकी मुलायमियत आग की मद्धिम, सुनहरी रोशनी में और भी उत्तेजक लग रही थी। माया की सांसें पहले से ही अनियमित थीं – छाती तेजी से ऊपर-नीचे हो रही थी, जैसे कोई अनजानी, दबी हुई आग अंदर से धीरे-धीरे भड़क रही हो। उसकी खाई में पहले से ही एक गर्म, चिपचिपी नमी फैल चुकी थी, जैसे कोई गुप्त झरना जाग उठा हो।

तभी दरवाजे पर हल्की, लेकिन मजबूत दस्तक पड़ी। माया का दिल एक झटके से धड़क उठा। इतनी रात में कौन? उसने कांपते हाथों से दरवाजा खोला। सामने अक्षय खड़ा था – दिन भर का जंगल गाइड, जिसकी आँखों में जंगल की ही तरह अंधेरी, गहरी, खतरनाक चमक थी। उसके बाल हवा और ठंड से बिखरे हुए, चेहरा ठंड से लाल, और गीले कपड़े उसके मजबूत शरीर से चिपके हुए थे – हर मांसपेशी साफ उभर रही थी। “माया… बाहर अब बहुत ठंड हो गई है। मेरी झोपड़ी बहुत दूर है। क्या… मैं यहां थोड़ी देर…?” उसकी आवाज कांप रही थी, लेकिन उसमें एक कच्ची, बेकाबू गर्माहट थी। माया कुछ नहीं बोली। बस दरवाजा और चौड़ा किया। उसका मन चीख रहा था – यह गलत है, रुक जाओ – लेकिन उसका शरीर पहले ही उसकी तरफ खिंच चुका था, जैसे कोई चुंबक।

दोनों छोटी सी आग के पास बैठ गए। लकड़ियां चटक रही थीं, लेकिन उनकी सांसों की गर्मी उस आग से भी ज्यादा तेज थी। बातें शुरू हुईं – जंगल की पुरानी, डरावनी कहानियां, माया की अकेली, सिसकती रातें, अक्षय का जंगल से गहरा, लगभग शारीरिक रिश्ता। लेकिन शब्द धीरे-धीरे कम होते गए। नजरें ज्यादा बोलने लगीं – गहरी, भूखी, लालची। अक्षय ने धीरे से कहा, “तुम्हारी आँखों में वो उदासी नहीं… वो आग है, जो छुपाने की कोशिश कर रही है।” माया ने कुछ नहीं कहा। बस नजरें झुका लीं। अक्षय का हाथ धीरे से बढ़ा। उसकी उंगलियां माया की उंगलियों से टकराईं। उस स्पर्श में जंगल की सारी कच्ची गर्मी थी – जंगली, अनियंत्रित, भूखी। माया की सांस एकदम रुक गई। उसकी खाई में अब नमी नहीं, बल्कि एक गर्म, चिपचिपा रस महसूस हो रहा था – जैसे कोई नदी उफान पर हो।

अक्षय और करीब आया। उनकी सांसें अब पूरी तरह एक हो चुकी थीं। पहले संतरा चूसना धीमा था, लेकिन इतना गहरा और लंबा कि जैसे सालों की प्यास एक साथ बुझ रही हो। अक्षय के होंठ माया के होंठों को ऐसे चूस रहे थे जैसे कोई पका, रसीला फल पहली बार चखा जा रहा हो – धीरे-धीरे, हर स्वाद को सोखते हुए, जीभ अंदर तक घुसकर खेल रही थी, नच रही थी। माया की आँखें बंद हो गईं। उसके शरीर में मीठी, तेज कंपकंपी दौड़ गई – पैरों से सिर तक। अक्षय का हाथ उसकी पीठ पर फिसला, कमर को कसकर पकड़ा। उसने ड्रेस के पतले पट्टों को धीरे से नीचे सरकाया। ड्रेस कंधों से फिसलकर गिर गई। माया के तरबूज आग की रोशनी में पूरी तरह नंगे, चमकते हुए थे। मटर इतने सख्त और उभरे हुए थे कि हल्की सी सांस से भी कांप रहे थे। अक्षय ने दोनों हाथों से एक तरबूज को थामा – हल्के से दबाया, फिर जोर से मसला, निचोड़ा। माया के मुंह से एक गहरी, लंबी, दबी हुई कराह निकली – “आआह्ह्ह… अक्षय…”। अक्षय ने मटर को मुंह में लिया, जीभ से गोल-गोल घुमाया, धीरे-धीरे, लंबे समय तक चूसा – जैसे कभी छोड़ना ही न चाहता हो। माया ने अक्षय के बालों में उंगलियां फंसाईं, उसे इतनी जोर से खींचा कि उसकी सांस रुक गई। उसकी सांसें अब तेज, गर्म, बेकाबू हो चुकी थीं।

अक्षय ने माया को चटाई पर धीरे से लिटा दिया। जंगल की ठंडी हवा झोपड़े में घुस रही थी, लेकिन दोनों के शरीरों से निकलती गर्मी ने ठंड को कहीं दूर भगा दिया। अक्षय ने अपनी शर्ट उतारी। उसका खीरा जंगली, पूरी तरह तना हुआ, लाल-गर्म, नसों से फूला हुआ था – जैसे कोई जंगली जानवर भूखा खड़ा हो। माया ने उसे देखा। शर्म से आँखें बंद कीं, लेकिन कुछ सेकंड बाद फिर खोलकर घूरती रही – उत्सुकता, लालसा, डर, सब मिलकर एक नई आग जला रहे थे। अक्षय ने माया की ड्रेस पूरी तरह उतार दी। अब माया सिर्फ जंगल की रोशनी, ठंडी हवा और अक्षय की भूखी नजरों के सामने थी। उसने माया की जांघों को सहलाया – धीरे-धीरे, अंदरूनी तरफ बढ़ते हुए। खाई पर बाल गीले, चिपके हुए, गर्माहट से लथपथ थे। अक्षय ने पहले उंगली से छुआ, फिर दो उंगलियां धीरे से अंदर डालीं – गहराई तक। माया की कमर इतनी जोर से उठी कि चटाई सरक गई। “अक्षय… और… और गहराई से… प्लीज…” उसकी आवाज अब फुसफुसाहट नहीं, बल्कि एक गहरी, जरूरत भरी पुकार थी। अक्षय ने खाई चाटना शुरू किया – जीभ धीरे-धीरे अंदर जाती, बाहर आती, हर कोने को, हर सिलवट को चाटती, सोखती। माया का पूरा शरीर लहरा रहा था, कांप रहा था। खुजली इतनी गहरी, इतनी मीठी, इतनी असहनीय थी कि वह चीखने को तैयार थी, लेकिन सिर्फ कराह पा रही थी।

अक्षय ने अपना खीरा माया की खाई के मुंह पर टिकाया। बहुत धीरे से दबाया। खीरा अंदर सरकता हुआ महसूस हुआ – हर इंच एक नया, गहरा राज खोल रहा था। माया ने दर्द और सुख की मिली-जुली लहर से अंगुलियां अक्षय की पीठ पर इतनी जोर से गाड़ दीं कि निशान पड़ गए। अक्षय रुक-रुक कर अंदर जा रहा था, हर पल को, हर सेंटीमीटर को महसूस करते हुए। जब खीरा पूरी तरह अंदर समा गया, दोनों एक पल के लिए रुक गए – सांसें मिली हुईं, दिल एक ही लय में धड़क रहे, जैसे दोनों एक ही प्राणी बन गए हों। फिर अक्षय ने पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। माया घुटनों के बल थी, अक्षय पीछे से। हर गहरे, जोरदार धक्के के साथ माया के तरबूज इतनी तेजी से लहरा रहे थे कि आग की रोशनी में वे चमकते, नाचते दिख रहे थे। अक्षय एक हाथ से उन्हें मसल रहा था, निचोड़ रहा था, दूसरा हाथ माया की कमर पर इतना कसकर जकड़े हुए था कि नीले निशान पड़ने वाले थे। माया की कराहें अब जंगल की हर आवाज में घुल गई थीं – पत्तियां सरसरातीं, उल्लू पुकारता, हवा सिसकारती – सब उनके सुख में शामिल हो गए थे। पसीना दोनों के शरीर पर मोतियों सा नहीं, बल्कि नदियों सा बह रहा था।

रफ्तार अब पूरी तरह जंगली, बेकाबू हो चुकी थी। माया महसूस कर रही थी कि उसकी खाई खीरे का घर नहीं, बल्कि उसकी कैद बन गई है – उसे इतनी कसकर जकड़े हुए कि हर थ्रस्ट पर और गहरा खींच रही है, और गहरा निचोड़ रही है। अक्षय हर बार पूरी ताकत से, पूरी गहराई से धक्का दे रहा था। अचानक माया का पूरा शरीर एक तेज, अनियंत्रित कंपन में आ गया। रस छूट गया – गर्म, तेज, मीठी, लगातार लहरें खाई से निकलकर खीरे को पूरी तरह भिगो रही थीं, चिपका रही थीं। अक्षय भी कुछ ही सेकंड बाद जोर से, पूरी ताकत से कांप उठा और अपना रस अंदर छोड़ दिया – गहरा, गर्म, भरपूर, जैसे जंगल का कोई पुराना, गहरा रहस्य दोनों के बीच हमेशा के लिए समा गया हो। दोनों थककर, हांफते हुए चटाई पर गिर पड़े। लंबे समय तक एक-दूसरे से चिपके रहे, सांसें धीमी होती रहीं, दिल अभी भी तेज धड़क रहे थे।

बाहर जंगल अब पूरी तरह चुप था। आग की लपटें धीमी पड़ चुकी थीं। माया ने अक्षय की चौड़ी, पसीने से भीगी छाती पर सिर रखा। अक्षय ने उसके लंबे, गीले बालों में उंगलियां फिराईं, धीरे-धीरे, प्यार से सहलाया। माया की आवाज बहुत धीमी, कांपती हुई थी, “कल सुबह… तुम चले जाओगे?” अक्षय ने उसके माथे पर होंठ रखे, लंबे समय तक चूमे और फुसफुसाया, “नहीं माया। इस जंगल में अब सिर्फ हम हैं… और यह रात… यह रात हमेशा, हमेशा हमारी रहेगी।” दोनों ने एक-दूसरे की आँखों में देखा – गहराई से, बिना कुछ कहे। वो रात जंगल की सबसे गहरी, सबसे जंगली, सबसे मीठी, सबसे यादगार रात बन गई।

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