समीर लगभग दस साल बाद अपने पुराने शहर लौटा था, जहाँ की गलियों में उसकी किशोरावस्था की यादें आज भी ताज़ा थीं। जैसे ही वह अपनी पुरानी ट्यूशन टीचर कविता मैडम के घर के सामने पहुँचा, उसके दिल की धड़कनें तेज हो गईं। कविता मैडम ने उसे गणित सिखाया था, लेकिन समीर ने हमेशा उन्हें एक अलग ही नजरिए से देखा था। जैसे ही दरवाजा खुला, सामने कविता खड़ी थी, जिसकी खूबसूरती समय के साथ और भी निखर गई थी। वह अब और भी ज्यादा परिपक्व और आकर्षक लग रही थी, जिसे देखकर समीर के मन में पुरानी दबी हुई इच्छाएं फिर से जाग उठीं।
कविता की उम्र अब पैंतीस के पार थी, लेकिन उसका शरीर आज भी किसी मखमली मूरत की तरह था। उसने एक तंग बैंगनी रंग की साड़ी पहन रखी थी, जिसमें से उसके शरीर के उतार-चढ़ाव साफ झलक रहे थे। उसकी साड़ी के ब्लाउज से झाँकते हुए वे दो बड़े और गोल तरबूज किसी को भी पागल करने के लिए काफी थे। जब वह मुड़कर अंदर जाने लगी, तो समीर की नजरें उसके भारी और मांसल पिछवाड़े पर जाकर टिक गईं, जो हर कदम के साथ एक मदहोश कर देने वाली लय में हिल रहा था। उसके शरीर की बनावट में एक ऐसी परिपक्वता थी जो केवल अनुभव के साथ आती है, और समीर उसे बस निहारता ही रह गया।
ड्राइंग रूम में बैठते ही दोनों के बीच पुरानी यादों का सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन बातों-बातों में कविता के चेहरे पर एक उदासी साफ झलक रही थी। उसने बताया कि उसके पति काम के सिलसिले में अक्सर बाहर रहते हैं और वह इस बड़े से घर में खुद को बहुत अकेला महसूस करती है। समीर ने गौर किया कि कविता की आँखों में एक गहरी प्यास थी, एक ऐसी चाहत जिसे लंबे समय से दबाकर रखा गया था। समीर ने धीरे से अपना हाथ कविता के हाथ पर रखा, तो उसने हाथ हटाया नहीं, बल्कि उसकी उंगलियों को धीरे से सहलाने लगी। इस छोटे से स्पर्श ने दोनों के बीच के उस भावनात्मक बांध को तोड़ दिया जो बरसों से बना हुआ था।
बाहर अचानक से मौसम बदल गया और तेज बारिश होने लगी, जिसकी वजह से बिजली भी चली गई। कमरे में फैली धुंधली रोशनी और बारिश की गड़गड़ाहट ने माहौल को और भी ज्यादा कामुक बना दिया। समीर ने हिम्मत जुटाकर कविता को अपने करीब खींचा, तो वह उसकी बाहों में सिमट गई। उसकी सांसें तेज चलने लगी थीं और उसके शरीर से उठने वाली महक समीर के दिमाग पर हावी होने लगी। कविता ने दबी आवाज में कहा, ‘समीर, यह गलत है,’ लेकिन उसके हाथों की पकड़ समीर की पीठ पर और भी मजबूत हो गई थी, जो यह बता रही थी कि उसका मन कुछ और ही चाह रहा है।
समीर ने धीरे से कविता के ब्लाउज के हुक खोलने शुरू किए, जिससे उसके गोरे और चमकदार तरबूज आहिस्ता-आहिस्ता बाहर आने लगे। जैसे ही वे पूरी तरह आजाद हुए, समीर ने देखा कि उन तरबूजों के बीच के गुलाबी मटर ठंड और उत्तेजना की वजह से सख्त हो चुके थे। समीर ने अपनी जीभ से उन मटरों को सहलाना शुरू किया, तो कविता के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकली। वह अपना सिर पीछे की ओर झुकाकर समीर के बालों में अपनी उंगलियां फँसा चुकी थी। समीर अब उन तरबूजों को अपने हाथों में भरकर उन्हें धीरे-धीरे दबाने लगा, जिससे कविता का पूरा बदन थरथराने लगा था।
कविता की सिसकियाँ अब तेज होने लगी थीं, और वह समीर के चेहरे को अपने हाथों में लेकर उसके होठों को पागलों की तरह चूसने लगी। समीर का हाथ धीरे-धीरे नीचे की ओर सरका और उसने कविता की साड़ी के पल्ले को हटाकर उसकी रेशमी त्वचा को महसूस किया। जैसे ही उसका हाथ कविता की जाँघों के बीच उस रहस्यमयी खाई तक पहुँचा, उसे महसूस हुआ कि वह जगह पूरी तरह से गीली हो चुकी थी। वहाँ मौजूद घने और काले बाल समीर की उंगलियों में उलझ रहे थे, जिससे कविता की कामुकता और भी ज्यादा बढ़ गई थी। समीर ने अपनी उंगलियों से उस खाई को टटोलना शुरू किया, तो कविता ने अपनी आँखें बंद कर लीं और जोर-जोर से कराहने लगी।
समीर ने अब अपना पायजामा नीचे किया, जिससे उसका लंबा और सख्त खीरा पूरी तरह से बाहर आ गया। कविता ने जब उस खीरे को देखा, तो उसकी आँखों में एक चमक सी आ गई। उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और उस खीरे को अपनी मुट्ठी में लेकर सहलाने लगी। उसकी गर्मी और मोटाई को महसूस करते ही कविता ने उसे अपने मुँह के करीब लाया और धीरे-धीरे उस खीरे को चूसना शुरू कर दिया। समीर को ऐसा महसूस हो रहा था जैसे वह स्वर्ग के द्वार पर खड़ा हो। कविता की जीभ और उसके मुँह की गर्मी उस खीरे को और भी ज्यादा सख्त और बेकाबू बना रही थी।
अब समीर से और इंतजार नहीं हो रहा था, उसने कविता को सोफे पर लेटा दिया और उसकी टांगों को फैलाकर उसके बीच में बैठ गया। उसने अपने खीरे की नोक को कविता की गीली खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से एक धक्का दिया। कविता के मुँह से एक चीख निकली, ‘ओह समीर, धीरे… बहुत समय बाद कोई इसे खोल रहा है।’ जैसे-जैसे खीरा उस तंग खाई के अंदर जा रहा था, समीर को एक अद्भुत कसाव का अनुभव हो रहा था। उसने धीरे-धीरे सामने से खोदना शुरू किया, और हर धक्के के साथ कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे। पूरे कमरे में उनके शरीरों के टकराने की आवाजें गूँजने लगी थीं।
खुदाई की गति अब धीरे-धीरे बढ़ने लगी थी, और कविता भी अपनी कमर को ऊपर उठाकर समीर का पूरा साथ दे रही थी। समीर ने कविता के दोनों हाथों को ऊपर पकड़ लिया और पूरी ताकत से खुदाई करने लगा। ‘हाँ समीर, और तेज… और गहराई तक खोदो मुझे,’ कविता चिल्ला रही थी। उसकी आवाज़ में एक ऐसी तड़प थी जो समीर को और भी ज्यादा उत्तेजित कर रही थी। उसने अब कविता को घुमाया और उसे पिछवाड़े की तरफ से खोदना शुरू किया। डौगी स्टाइल में कविता का वह भारी पिछवाड़ा समीर के सामने था, और वह हर धक्के के साथ उस पर थप्पड़ भी मार रहा था।
कविता की हालत अब बेकाबू हो रही थी, उसकी खाई से बहुत ज्यादा पानी निकल रहा था जो समीर के खीरे को और भी ज्यादा चिकना बना चुका था। समीर ने उसे फिर से सीधा किया और उसकी टांगों को अपने कंधों पर रख लिया ताकि वह और भी गहराई तक खुदाई कर सके। कविता का चेहरा पसीने से भीग चुका था और उसकी आँखें चढ़ गई थीं। अंत में, समीर को महसूस हुआ कि उसका रस अब छूटने वाला है, और ठीक उसी समय कविता का बदन भी जोर-जोर से झटके लेने लगा। दोनों ने एक-दूसरे को कसकर पकड़ लिया और समीर का सारा गरम रस कविता की गहराईयों में समा गया, जबकि कविता का रस भी चारों तरफ फैल गया।
पूरी खुदाई के बाद दोनों एक-दूसरे की बाहों में ढीले पड़ गए। कमरे में केवल उनकी भारी सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी। कविता के चेहरे पर एक संतुष्टि भरी मुस्कान थी, जो सालों की प्यास बुझने के बाद आती है। समीर ने उसके माथे को चूमा और उसे सीने से लगा लिया। कविता ने धीरे से फुसफुसाते हुए कहा, ‘आज तुमने मुझे फिर से जिंदा कर दिया है।’ उस रात की वह खुदाई उनके दिलों के बीच एक ऐसा रिश्ता बना गई थी जिसे वे कभी नहीं भूल सकते थे। पसीने से लथपथ उनके जिस्म अब एक-दूसरे की गर्मी में सुकून तलाश रहे थे, और बारिश की बूंदें खिड़की पर अब भी संगीत की तरह बज रही थीं।