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संगीता मैम की चु@@ई

बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और आसमान में बिजली की कड़कड़ाहट के बीच संगीता मैम के घर का शांत माहौल मेरे दिल की धड़कनों को और तेज कर रहा था। संगीता मैम मेरी पुरानी ट्यूशन टीचर थीं, जिनसे मैंने सालों पहले पढ़ाई की थी, लेकिन आज भी उनके प्रति मेरा आकर्षण वैसा ही था जैसा पहले हुआ करता था। वह एक गहरी नीली रंग की साड़ी पहने हुई थीं, जिसका ब्लाउज पीछे से काफी गहरा था और उनकी पीठ का गोरापन मद्धम रोशनी में चमक रहा था। उनके शरीर की बनावट हमेशा से ही मुझे बेचैन कर देती थी, उनके भरे हुए बदन और उन भारी तरबूजों की गोलाई साड़ी के कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब लग रही थी। उनके चलने पर उनके तरबूज जिस तरह हिलते थे, उसे देख कर मेरा मन बार-बार उनके मटरों को सहलाने के लिए मचलता रहता था।

संगीता मैम की देह किसी तराशी हुई मूरत जैसी थी, उनका रंग दूधिया सफेद था और उनकी कमर की ढलान किसी गहरी घाटी की शुरुआत जैसी लगती थी। जब वह झुककर मेज से किताब उठातीं, तो उनके तरबूजों का ऊपरी हिस्सा साफ नजर आता था, जो किसी प्यासे को तृप्त करने के लिए काफी था। उनके चेहरे पर हमेशा एक सौम्य मुस्कान रहती थी, लेकिन उनकी आंखों में एक अजीब सी गहराई थी जो मुझे अपनी ओर खींचती थी। उनके शरीर से आने वाली मोगरे की खुशबू मेरे दिमाग को सुन्न कर रही थी और मैं चाहकर भी अपनी नजरें उनके चेहरे से नीचे खिसकते हुए उनके उभरे हुए अंगों से नहीं हटा पा रहा था। मुझे महसूस हो रहा था कि मेरे पाजामे के भीतर मेरा खीरा धीरे-धीरे अपनी लंबाई बढ़ा रहा है और अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहा है।

हमारे बीच की बातचीत धीरे-धीरे पुरानी यादों से हटकर वर्तमान की भावनाओं पर आने लगी थी। संगीता मैम ने बताया कि उनके पति अक्सर बाहर रहते हैं और वह इस बड़े घर में बहुत अकेलापन महसूस करती हैं। उनकी आवाज में एक थरथराहट थी, जो शायद उनके भीतर दबी हुई इच्छाओं का संकेत दे रही थी। मैंने हिम्मत जुटाकर उनका हाथ थाम लिया, उनके हाथ की कोमलता ने मेरे पूरे शरीर में एक बिजली सी दौड़ा दी। उन्होंने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा, बल्कि उनकी उंगलियां मेरे हाथ को और मजबूती से भींचने लगीं। हमारी नजरें मिलीं और उस पल में सब कुछ साफ हो गया, शब्दों की जरूरत खत्म हो गई थी और केवल शरीरों की भाषा बची थी। मेरे मन का संघर्ष अब खत्म हो चुका था और केवल उस गहरी आकर्षण की आग जल रही थी।

मैंने धीरे से अपना हाथ उनके कंधे पर रखा और उन्हें अपनी ओर खींचा, वह बिना किसी विरोध के मेरी बाहों में सिमट गईं। उनकी सांसें तेज चलने लगी थीं और उनके तरबूज मेरी छाती से सट गए थे, जिससे मुझे उनकी गर्मी और मटरों की कठोरता का अहसास हो रहा था। मैंने अपना चेहरा उनके गले के पास ले जाकर सूंघा, वह पसीने और इत्र की एक मादक महक थी। उनके गले पर चुंबन करते हुए मैंने महसूस किया कि वह कांप रही हैं। उन्होंने धीरे से फुसफुसाकर कहा, ‘आर्यन, यह गलत है,’ लेकिन उनके हाथों ने मेरे खीरे वाले हिस्से को सहलाकर कुछ और ही इशारा कर दिया था। उस स्पर्श ने मेरे खीरे को लोहे जैसा सख्त बना दिया था और अब उसे उस रेशमी खाई की तलाश थी।

जैसे ही मेरा हाथ उनकी साड़ी के पल्लू को हटाकर उनके तरबूजों तक पहुँचा, उनकी एक दबी हुई आह निकली। मैंने अपने हाथों में उन भारी तरबूजों को भर लिया और उन्हें धीरे-धीरे दबाने लगा। उनके मटर साड़ी के महीन कपड़े के ऊपर से ही कड़े हो चुके थे, जिन्हें मैंने अपनी उंगलियों के बीच लेकर मसला। संगीता मैम की आँखें बंद हो गई थीं और उनका सिर पीछे की ओर झुक गया था। मैंने उनके ब्लाउज के हुक खोले और उन सफेद विशाल तरबूजों को आजाद कर दिया। वह दृश्य इतना कामुक था कि मैं खुद को रोक नहीं पाया और अपने मुँह में एक तरबूज भरकर उसके मटर को चूसने लगा। वह पूरी तरह से मेरे वश में थीं और उनके हाथ मेरे बालों को कसकर पकड़ रहे थे।

अब समय था उस गहराई तक पहुँचने का जहाँ जाने के लिए हम दोनों तड़प रहे थे। मैंने उनकी साड़ी और पेटीकोट को धीरे से नीचे सरका दिया, जिससे उनकी रेशमी और मखमली खाई मेरे सामने आ गई। वहाँ के बाल सफाई से कटे हुए थे और उनकी खाई से निकलता हुआ प्राकृतिक रस चमक रहा था। मैंने अपनी उंगलियों से उस खाई को टटोला, तो वह पूरी तरह से गीली और चिपचिपी हो चुकी थी। मेरी उंगली जैसे ही खाई के भीतर गई, संगीता मैम ने अपनी कमर ऊपर उठा दी और जोर से कराह उठीं। मैं अपनी जीभ से उनकी खाई को चाटने लगा, उस रस का स्वाद किसी अमृत जैसा था जो मेरे भीतर की उत्तेजना को चरम पर ले जा रहा था।

जब उनकी कामोत्तेजना चरम पर पहुँचने लगी, तो उन्होंने मुझे खींचकर अपने ऊपर गिरा लिया। मैंने अपना कड़क खीरा निकाला और उनकी खाई के मुहाने पर टिका दिया। वह गर्मी और गीलापन महसूस करते ही संगीता मैम की सासों की गति और तेज हो गई। मैंने धीरे से अपने खीरे को उनकी खाई के भीतर धकेलना शुरू किया। वह रास्ता बहुत तंग था, लेकिन रस की वजह से खीरा धीरे-धीरे समाने लगा। जब पूरा खीरा उनकी खाई के भीतर समा गया, तो हम दोनों के मुँह से एक साथ एक संतुष्ट कराह निकली। मैंने धीरे-धीरे खुदाई शुरू की, हर धक्के के साथ मेरा खीरा उनकी खाई की गहराई को नाप रहा था। वह अपने पैरों से मेरी कमर को जकड़ चुकी थीं और हर धक्के का स्वागत अपनी कमर उचकाकर कर रही थीं।

खुदाई की गति अब बढ़ती जा रही थी, कमरे में केवल हमारे जिस्मों के टकराने की आवाज और भारी सांसें गूंज रही थीं। ‘ओह आर्यन, और जोर से खोदो, मुझे पूरा भर दो,’ संगीता मैम के ये शब्द आग में घी का काम कर रहे थे। मैंने उन्हें घुमाकर पिछवाड़े से खोदने वाली मुद्रा में ला दिया। पीछे से देखने पर उनका पिछवाड़ा किसी पहाड़ जैसा लग रहा था। मैंने दोबारा अपना खीरा उनकी खाई में पीछे से उतारा और पागलों की तरह खोदना शुरू किया। उनके तरबूज नीचे लटककर झूल रहे थे, जिन्हें मैं अपने हाथों से पकड़कर खींच रहा था। खुदाई इतनी दमदार थी कि मैम की चीखें निकलने लगी थीं, लेकिन वह चीखें दर्द की नहीं बल्कि बेइंतहा आनंद की थीं।

अचानक मुझे महसूस हुआ कि मेरा रस अब बाहर आने को बेताब है और ठीक उसी समय संगीता मैम का शरीर भी बुरी तरह थरथराने लगा। उन्होंने पीछे मुड़कर मुझे देखा और कहा, ‘छोड़ दो आर्यन, सब कुछ मेरे अंदर ही निकाल दो।’ मैंने अंतिम कुछ शक्तिशाली धक्के लगाए और मेरा गर्म रस उनकी खाई की गहराइयों में ज्वालामुखी की तरह फूट पड़ा। उसी पल संगीता मैम का भी रस निकल गया और वह ढीली होकर बिस्तर पर गिर पड़ीं। हम दोनों पसीने से लथपथ थे और हमारी धड़कनें एक-दूसरे की छाती में सुनाई दे रही थीं। वह चरम आनंद का अनुभव इतना गहरा था कि कुछ देर तक हम दोनों के पास शब्द ही नहीं थे।

उस खुदाई के बाद की फीलिंग बहुत ही रूहानी थी। संगीता मैम मेरी बाहों में लेटी हुई थीं और मैं उनके तरबूजों को धीरे-धीरे सहला रहा था। उनकी आँखों में अब शर्म नहीं बल्कि एक गहरा संतोष था। वह धीरे से मुस्कुराईं और मेरे माथे को चूम लिया। कमरे की खिड़की से बारिश की बूंदों की आवाज अभी भी आ रही थी, लेकिन हमारे भीतर की प्यास अब शांत हो चुकी थी। उनकी देह की कोमलता और उस खुदाई की याद अब हमेशा के लिए मेरे दिल में बस गई थी। हमने तय किया कि यह हमारा एक खूबसूरत राज रहेगा, जो वक्त आने पर फिर से इसी तरह की खुदाई की दास्तान लिखेगा।

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