अजनबी पड़ोसन कविता की चु@@ई—>समीर शहर के एक पॉश इलाके में बने अपार्टमेंट में अकेला रहता था। वह एक सॉफ्टवेयर इंजीनियर था और उसकी जिंदगी दफ्तर के काम और घर के अकेलेपन के बीच सिमटी हुई थी। समीर के पड़ोस वाले फ्लैट नंबर 403 में हाल ही में एक नया परिवार रहने आया था। उस घर की मालकिन का नाम कविता था, जो अपनी उम्र के तीसरे पड़ाव यानी पैंतीस साल की दहलीज पर खड़ी थी। कविता के पति एक बड़ी कंपनी में सेल्स मैनेजर थे, जिसके कारण वे अक्सर महीनों तक शहर से बाहर टूर पर रहते थे। कविता अक्सर अकेली ही रहती थी और उसकी यह तन्हाई उसकी आँखों में साफ झलकती थी। समीर ने जब पहली बार कविता को बालकनी में खड़ा देखा था, तभी से उसके मन के किसी कोने में एक अजीब सी हलचल पैदा हो गई थी।
कविता के शरीर की बनावट ऐसी थी कि कोई भी उसे देखकर मदहोश हो जाए। उसकी उम्र करीब पैंतीस साल थी, लेकिन उसका यौवन अभी भी अपने पूरे शबाब पर था। उसके रेशमी बालों के नीचे उसका गोरा चेहरा दमकता रहता था और उसकी गहरी आँखें हमेशा कुछ अनकही बातें कहती नजर आती थीं। कविता की छाती पर लगे दो बड़े और रसीले तरबूज उसकी साड़ी के पतले कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब लगते थे, जिनके बीच की गहरी घाटी किसी को भी अपना दीवाना बना सकती थी। जब वह चलती थी, तो उसका भारी और गोल पिछवाड़ा लयबद्ध तरीके से हिलता था, जिसे देखकर समीर के मन में हलचल मच जाती थी। उसके शरीर के हर उतार-चढ़ाव में एक अजीब सी कशिश थी जो समीर जैसे कुंवारे लड़के को अपनी ओर खींचती थी और उसे रात भर सोने नहीं देती थी।
समीर और कविता के बीच बातचीत की शुरुआत बहुत ही साधारण तरीके से हुई थी। कभी लिफ्ट में मिलते समय मुस्कुरा देना, तो कभी बालकनी से एक-दूसरे को देख लेना। समीर को धीरे-धीरे यह अहसास होने लगा था कि कविता भी उसे पसंद करने लगी है। एक दोपहर जब चिलचिलाती गर्मी अपने चरम पर थी और पूरे अपार्टमेंट में बिजली गुल हो गई थी, तभी समीर के दरवाजे पर दस्तक हुई। उसने दरवाजा खोला तो सामने कविता खड़ी थी, उसके माथे पर पसीने की छोटी-छोटी बूंदें चमक रही थीं और उसकी साड़ी का पल्लू थोड़ा खिसका हुआ था। उसने समीर से बहुत ही विनम्र आवाज में पूछा कि क्या उसके घर का इन्वर्टर काम कर रहा है क्योंकि उसके घर में कुछ खराबी आ गई थी।
समीर ने उसे अंदर आने का न्यौता दिया और कविता झिझकते हुए समीर के लिविंग रूम में आकर बैठ गई। कमरे में सन्नाटा था और बाहर की गर्मी का असर अंदर भी महसूस हो रहा था। कविता ने पसीना पोंछने के लिए अपनी साड़ी के पल्लू का इस्तेमाल किया, जिससे उसके विशाल तरबूज और भी उभर कर सामने आ गए। समीर की नजरें चाहकर भी उन रसीले फलों से नहीं हट पा रही थीं। उसने देखा कि कविता के उन तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर ठंडक न होने की वजह से और भी सख्त हो रहे थे। समीर ने धीरे से कहा, ‘भाभी, यहाँ बहुत गर्मी है, रुकिए मैं खिड़कियाँ खोल देता हूँ।’ कविता ने उसकी ओर देखा और एक फीकी मुस्कान के साथ कहा, ‘हाँ समीर, गर्मी तो बहुत है, पर अंदर की तपन इस हवा से शांत नहीं होगी।’
समीर को लगा कि कविता के उन शब्दों में एक गहरा इशारा छिपा था। उसने पास जाकर कविता के कंधे पर हाथ रखा, जो पसीने से हल्का नम था। समीर का स्पर्श पाते ही कविता के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई, लेकिन उसने अपना हाथ हटाया नहीं। समीर ने महसूस किया कि कविता की सांसें तेज हो रही थीं। वह धीरे से उसके और करीब आया और उसके कान के पास झुककर फुसफुसाया, ‘भाभी, क्या आपकी प्यास मैं बुझा सकता हूँ?’ कविता ने आँखें बंद कर लीं और एक गहरी आह भरते हुए अपना सिर समीर के कंधे पर टिका दिया। उस पल दोनों के बीच की सारी झिझक और मर्यादा की दीवारें ढहने लगी थीं।
समीर के हाथों ने धीरे-धीरे कविता की कमर को सहलाना शुरू किया। कविता का पिछवाड़ा समीर की जाँघों से सटा हुआ था, जिससे समीर का सोया हुआ खीरा भी अब धीरे-धीरे अपनी जड़ें छोड़कर जागने लगा था। समीर ने अपनी उंगलियों को कविता के चेहरे पर फेरा और फिर धीरे से उसके गुलाबी होंठों को अपने होंठों में भर लिया। उन दोनों का यह पहला स्पर्श इतना कामुक और गहरा था कि दोनों के शरीरों से पसीना छूटने लगा। कविता ने भी पूरे उत्साह के साथ समीर का साथ दिया और उसके बालों में अपनी उंगलियाँ फंसा दीं। समीर की जीभ कविता के मुँह के हर कोने को तलाश रही थी, जैसे कोई प्यासा बरसों बाद पानी पा गया हो।
चुंबन की इस गहराई के बाद समीर का हाथ कविता के साड़ी के ब्लाउज तक पहुँच गया। उसने एक-एक करके बटन खोले और कविता के उन भारी और सफेद तरबूजों को आजाद कर दिया। जैसे ही वे तरबूज समीर की आँखों के सामने आए, उसकी धड़कनें रुक सी गईं। उन तरबूजों के बीच का गहरा रंग और उनके ऊपर जड़े हुए लाल मटर देखकर समीर पागल हो उठा। उसने अपनी जीभ से एक मटर को चारों ओर से सहलाना शुरू किया, जिससे कविता के मुँह से सिसकारी निकल पड़ी। कविता ने समीर का सिर अपने तरबूजों पर और जोर से भींच लिया और कहने लगी, ‘समीर, इन्हें और जोर से मसलो, मैं बरसों से इस एहसास के लिए तड़प रही थी।’
समीर ने बारी-बारी से दोनों तरबूजों को अपने हाथों में लेकर दबाया और फिर अपनी उंगलियों से कविता की साड़ी के नीचे बनी उस गहरी खाई की ओर रुख किया। जैसे ही समीर का हाथ उस नम और रेशमी खाई तक पहुँचा, उसे महसूस हुआ कि वहाँ से पहले ही काफी रस निकल रहा था। कविता की खाई पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वह अपनी जाँघों को आपस में रगड़ रही थी। समीर ने अपनी एक उंगली से खाई में उंगली करना शुरू किया, जिससे कविता के बदन में बिजली सी दौड़ गई। उसने अपनी कमर को ऊपर उठाया और समीर की उंगलियों को अपनी खाई के और अंदर समाने की कोशिश करने लगी।
अब समीर की बर्दाश्त खत्म हो रही थी। उसने अपनी पैंट उतारी और अपना लंबा और सख्त खीरा कविता के सामने पेश किया। कविता ने जब उस मूसल जैसे खीरे को देखा, तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गई। उसने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और उस खीरे को अपनी मुट्ठी में भर लिया। कविता ने समीर की आँखों में देखते हुए धीरे-धीरे उस खीरे को अपने मुँह में लेना शुरू किया। वह उसे किसी कीमती फल की तरह चूस रही थी, जिससे समीर का पूरा शरीर कांपने लगा। कविता का यह खीरा चूसना इतना प्रभावी था कि समीर को लगा उसका सारा रस अभी निकल जाएगा, लेकिन उसने खुद को संभाला।
समीर ने कविता को बिस्तर पर लिटाया और उसकी जाँघों को चौड़ा किया। उसे सामने से वह गहरी और काली बालों वाली खाई नजर आ रही थी जो पूरी तरह से रस से लथपथ थी। समीर ने बिना देर किए अपने खीरे की नोक को खाई के मुहाने पर रखा और एक जोरदार धक्का दिया। कविता के मुँह से एक जोर की चीख निकली, ‘आह समीर! तुमने तो मुझे फाड़ ही दिया।’ समीर ने धीरे-धीरे सामने से खोदना शुरू किया। हर धक्के के साथ समीर का खीरा कविता की खाई की गहराई को नाप रहा था। कमरे में केवल मांस के टकराने की आवाजें और कविता की कराहें गूँज रही थीं।
जैसे-जैसे खुदाई की गति बढ़ी, कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछलने लगे। समीर ने अपनी पकड़ कविता के पिछवाड़े पर मजबूत कर ली और उसे अपनी ओर खींचते हुए जोर-जोर से खोदने लगा। कविता अपने दोनों हाथों से चादर को कसकर पकड़े हुए थी और अपनी कमर को हर धक्के के साथ ऊपर उछाल रही थी। समीर ने अपनी लय बदली और कविता को घुमाकर उसे पिछवाड़े से खोदने वाली मुद्रा में ला दिया। पीछे से कविता का भारी पिछवाड़ा समीर के सामने था। उसने अपने खीरे को कविता के पिछवाड़े के बीच से गुजारते हुए फिर से खाई के अंदर डाल दिया और पागलों की तरह खुदाई करने लगा।
कविता अब चरम सीमा पर पहुँचने वाली थी। उसकी सांसें फूल रही थीं और वह बेतहाशा चिल्ला रही थी, ‘समीर, और जोर से खोदो! मुझे पूरी तरह से भर दो!’ समीर भी अपनी सारी ऊर्जा उस खुदाई में लगा रहा था। उसे महसूस हो रहा था कि कविता की खाई के अंदर की दीवारें उसके खीरे को कसकर जकड़ रही हैं। अचानक कविता का पूरा शरीर अकड़ गया और उसकी खाई से भारी मात्रा में रस निकलने लगा। कविता के रस छूटने के साथ ही समीर ने भी अपनी अंतिम ताकत लगाई और अपना सारा गर्म रस कविता की गहरी खाई के अंदर उड़ेल दिया।
खुदाई खत्म होने के बाद दोनों पसीने से लथपथ होकर बिस्तर पर गिर पड़े। समीर ने कविता को पीछे से अपनी बाहों में भर लिया और उसके कंधों पर प्यार भरे चुंबन दिए। कविता की सांसें अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं, लेकिन उसके चेहरे पर एक अजीब सा संतोष और सुकून था। उसने समीर का हाथ पकड़कर अपने दिल पर रखा और कहा, ‘आज तुमने मुझे फिर से जिंदा कर दिया समीर। मुझे कभी नहीं पता था कि एक अजनबी पड़ोसी मेरी रूह तक को इस तरह तृप्त कर सकता है।’ समीर ने मुस्कुराते हुए उसे अपने करीब और खींच लिया। उस दोपहर की वह गर्मी अब एक ठंडी और मीठी याद में बदल चुकी थी, जिसने उन दोनों के बीच एक ऐसा रिश्ता बना दिया था जिसकी कल्पना उन्होंने कभी नहीं की थी।