अजनबी संग चु@@ई—>रात के करीब ग्यारह बज रहे थे और राजधानी एक्सप्रेस अपनी पूरी रफ़्तार से पटरियों पर दौड़ रही थी। माया अपनी खिड़की वाली सीट पर बैठी बाहर के घुप अंधेरे को निहार रही थी, जहाँ कभी-कभी दूर जलती कोई रोशनी उसकी आँखों में चमक पैदा कर देती थी। माया के बदन पर एक गहरी नीली रेशमी साड़ी थी, जो उसके उभारों को इस कदर जकड़े हुए थी कि उसकी साँसें भी गूँजती हुई महसूस हो रही थीं। वह बत्तीस साल की एक जवान और बेहद आकर्षक महिला थी, जिसकी काया किसी तराशी हुई मूरत की तरह थी। उसके भारी तरबूज साड़ी के ब्लाउज को फाड़कर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे और उसकी पतली कमर पर साड़ी की सिलवटें एक अजीब सी उत्तेजना पैदा कर रही थीं। उसके चेहरे पर एक किस्म की उदासी थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अनकही प्यास छिपी हुई थी, जो किसी ऐसे साथी की तलाश में थी जो उसकी रूह और बदन की तपन को शांत कर सके।
तभी केबिन का दरवाजा धीरे से खुला और आर्यन अंदर दाखिल हुआ, जिसकी उम्र करीब अट्ठाइस साल रही होगी। आर्यन एक लंबा, गठीले बदन वाला और बेहद प्रभावशाली व्यक्तित्व का मालिक था, जिसकी चौड़ी छाती और मजबूत बाजू उसकी मर्दानगी का सबूत दे रहे थे। जैसे ही उसने केबिन में कदम रखा, माया की खुशबू ने उसे अपनी गिरफ्त में ले लिया और उसने एक गहरी साँस ली। केबिन में सिर्फ दो ही लोग थे, क्योंकि बाकी की दो सीटें खाली थीं, जिससे माहौल में एक अजीब सी खामोशी और तनाव पैदा हो गया था। आर्यन ने अपनी बैग ऊपर रखा और माया के सामने वाली सीट पर बैठ गया, उसकी निगाहें अनायास ही माया के उन भारी तरबूज पर जाकर टिक गईं, जो ट्रेन के हल्के झटकों के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। माया ने उसकी नजरों को महसूस किया और अपनी साड़ी के पल्लू को थोड़ा ठीक करने की कोशिश की, लेकिन इससे उसकी कमर का गोरा हिस्सा और भी ज्यादा नुमाया हो गया।
ट्रेन की पटरियों से आने वाली आवाज़ और केबिन की हल्की नीली रोशनी ने एक मादक समां बांध दिया था। दोनों के बीच शुरू में कुछ औपचारिक बातें हुईं, जैसे कहाँ जाना है और क्या करते हैं, लेकिन जल्द ही बातें गहरी होने लगीं। माया ने बताया कि वह अपने अकेलेपन से लड़ रही है और आर्यन ने अपनी बातों से उसे यह अहसास दिलाया कि वह उसे समझ सकता है। बातों-बातों में आर्यन की नजरें बार-बार माया के चेहरे से उतरकर उसके होंठों और फिर उन मटर जैसे निप्पलों पर जा रही थीं, जो अब ठंड और उत्तेजना के कारण साड़ी के कपड़े के नीचे से साफ उभर आए थे। माया भी आर्यन के उस मर्दाना खिंचाव से बच नहीं पा रही थी, उसे अपने शरीर के निचले हिस्से में, अपनी खाई के पास एक अजीब सी गीलापन और सनसनी महसूस होने लगी थी, जिसे उसने सालों से महसूस नहीं किया था।
धीरे-धीरे केबिन का तापमान बढ़ने लगा और झिझक की दीवारें टूटने लगीं। आर्यन अपनी सीट से उठा और माया के पास आकर बैठ गया, जिससे माया की धड़कनें तेज हो गईं। उसने धीरे से अपना हाथ माया के हाथ पर रखा, जो पसीने से हल्का नम था। माया ने अपना हाथ पीछे नहीं खींचा, बल्कि उसकी उँगलियों को अपनी उँगलियों में फंसा लिया। आर्यन ने हौसले के साथ अपना दूसरा हाथ माया के गालों पर फेरा और फिर धीरे से उसके होंठों के पास ले गया। माया की आँखें बंद हो गईं और उसकी साँसें भारी हो गईं, वह अपनी गर्दन को पीछे की ओर झुकाकर आर्यन के स्पर्श का आनंद लेने लगी। आर्यन ने झुककर उसके कानों के पास फुसफुसाते हुए कुछ कहा, जिससे माया के पूरे बदन में एक बिजली सी दौड़ गई और उसने अनजाने में ही आर्यन की कमीज को अपनी मुट्ठी में भींच लिया।
आर्यन के हाथ अब माया की साड़ी के पल्लू को हटाकर सीधे उसके रेशमी बदन को छू रहे थे। जैसे ही उसके हाथ माया के उन विशाल तरबूज पर पहुंचे, माया के मुँह से एक हल्की सी कराह निकल गई। आर्यन ने अपनी उंगलियों से उन तरबूज को सहलाना शुरू किया और फिर धीरे से उन मटर को अपनी उंगलियों के बीच दबाया। माया की कमर कमान की तरह मुड़ गई और वह आर्यन के करीब और भी ज्यादा खिंच आई। आर्यन ने अब अपनी जुबान का इस्तेमाल करना शुरू किया और माया के गले से लेकर उसके सीने के उतार-चढ़ाव तक को चूमना शुरू किया। माया के हाथ आर्यन के बालों में फंस गए थे और वह उसे अपने और भी करीब खींच रही थी, मानो वह उस रात के हर लम्हे को अपने अंदर जज्ब कर लेना चाहती हो।
अब समय आ गया था कि कपड़ों की बाधा को दूर किया जाए। आर्यन ने बड़ी नजाकत से माया की साड़ी को खोला और उसे एक तरफ फेंक दिया। अब माया सिर्फ अपने अंतःवस्त्रों में थी, जहाँ उसके पिछवाड़े की गोलाई और उसकी खाई के आसपास की बनावट आर्यन को पागल कर रही थी। आर्यन ने भी अपने कपड़े उतार दिए और अपना विशाल और सख्त खीरा माया के सामने पेश किया। माया की आँखें उस खीरे को देखकर फटी की फटी रह गईं, वह इतना लंबा और मोटा था कि माया की राल टपकने लगी। उसने धीरे से अपना हाथ आगे बढ़ाया और उस खीरे को अपनी मुट्ठी में पकड़ लिया, उसकी गर्मी और सख्ती ने माया को अंदर तक हिला दिया। उसने बिना देर किए उस खीरा चूसना शुरू कर दिया, मानो वह कोई स्वादिष्ट फल हो जिसे वह पूरा निगल जाना चाहती थी।
आर्यन के मुँह से आनंद की आहें निकल रही थीं जब माया उसके खीरे को अपने मुँह की गहराई तक ले जा रही थी। कुछ देर तक यह सिलसिला चलने के बाद आर्यन ने माया को लेटा दिया और उसकी टांगों को फैलाकर उसके बीच की खाई का मुआयना करने लगा। वहाँ के बाल साफ थे और खाई पूरी तरह से गीली होकर चमक रही थी। आर्यन ने अपनी जुबान से उस खाई को चाटना शुरू किया, जिससे माया बिस्तर पर मछली की तरह तड़पने लगी। वह बार-बार आर्यन का सिर अपनी खाई की ओर दबा रही थी, उसकी उंगलियां चादर को बुरी तरह नोच रही थीं। जब माया अपनी चरम सीमा के करीब पहुँचने लगी, तो उसने आर्यन को ऊपर खींच लिया और उसे अपने अंदर समाने का इशारा किया।
आर्यन ने धीरे से अपने खीरे की नोक को माया की खाई के मुहाने पर रखा और एक जोरदार धक्का दिया। माया की एक चीख आर्यन के मुँह में ही दब गई क्योंकि उसने उसके होंठों को चूमना शुरू कर दिया था। सामने से खोदना शुरू करते ही केबिन में मांस के टकराने की आवाजें गूँजने लगीं। आर्यन हर धक्का गहराई तक दे रहा था, जिससे उसका खीरा माया की खाई की गहराई को नाप रहा था। माया के पैर आर्यन की पीठ पर कस गए थे और वह हर धक्के के साथ अपनी कमर ऊपर उठा रही थी। खुदाई की यह प्रक्रिया इतनी तीव्र और लयबद्ध थी कि ट्रेन की आवाज भी उसके सामने फीकी लग रही थी। आर्यन ने अब माया को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, जिससे माया को एक अलग ही किस्म का सुख मिल रहा था।
माया के भारी तरबूज नीचे की ओर लटक रहे थे और आर्यन उन्हें अपनी मुट्ठी में भरकर झटक रहा था। वह जितनी तेजी से खुदाई कर रहा था, माया उतनी ही जोर से कराह रही थी। ‘ओह आर्यन, और तेज… मुझे पूरी तरह से भर दो,’ माया के ये शब्द आर्यन की उत्तेजना को और बढ़ा रहे थे। अंत में, जब दोनों का सब्र जवाब दे गया, तो आर्यन ने अपने धक्कों की रफ़्तार को चरम पर पहुँचा दिया। एक आखिरी गहरे धक्के के साथ आर्यन के खीरे से गरम रस निकलना शुरू हुआ और ठीक उसी समय माया की खाई ने भी अपना रस छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे में लिपटे हुए हाँफ रहे थे, उनके शरीर पसीने से लथपथ थे और दिल की धड़कनें एक-दूसरे से मुकाबला कर रही थीं। उस रात उस छोटे से केबिन में दो अजनबियों ने एक-दूसरे की रूह और बदन को पूरी तरह से खोदकर रख दिया था, और जब सुबह हुई, तो उनके चेहरे पर एक ऐसी तृप्ति थी जो शब्दों में बयान नहीं की जा सकती थी।