शाम ढल रही थी, गाँव के बाहर फैले हरे-भरे खेतों में धान की रोपाई का काम लगभग खत्म हो चुका था। शकुंतला, जो अब ३६ साल की हो चुकी थी, अपनी गोरी चमकती त्वचा, पतली कमर और भरे-पूरे शरीर के साथ खेत में काम कर रही थी। उसके बड़े-बड़े तरबूज जैसे स्तन ब्लाउज में कसकर दबे हुए थे, और साड़ी की लहराती चाल में उसका पिछवाड़ा हल्का-हल्का हिल रहा था, जैसे कोई पका हुआ अनार अपनी मिठास छिपा नहीं पा रहा हो। उसके पति ने कई साल पहले उसे छोड़ दिया था, एक युवा लड़की के साथ भाग गया था, और तब से शकुंतला अकेली ही खेत-खलिहान संभाल रही थी। उसका बेटा राहुल, अब १९ साल का मजबूत युवक, दिन भर उसके साथ काम करता, पसीने से तर-बतर होकर, उसकी माँ को देखते हुए उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक आ जाती थी, जो वह खुद भी समझ नहीं पाता था।
बारिश के बादल अचानक घिर आए, पहले तो हल्की फुहारें पड़ीं, फिर तेज़ बूँदें। आस-पास के मजदूर सामान समेटकर घर की ओर भागे, लेकिन शकुंतला और राहुल अभी भी खेत के बीच में थे। दूर खेत के किनारे पर बना छोटा सा पंप हाउस ही एकमात्र आश्रय था। दोनों दौड़कर वहाँ पहुँचे, कपड़े पूरी तरह भीग चुके थे। शकुंतला ने आँचल सरका दिया तो उसके तरबूज जैसे स्तन गीले ब्लाउज में पूरी तरह चिपक गए, अंगूर जैसे निप्पल साफ़ उभर आए थे, जैसे कोई मीठा फल बारिश में चमक रहा हो। राहुल की साँसें तेज़ हो गईं, उसकी आँखें माँ के शरीर पर टिक गईं, और उसके मन में एक तूफान सा उठने लगा। वह जानता था कि यह गलत है, लेकिन उसका शरीर उसकी बात नहीं मान रहा था।
पंप हाउस के अंदर हल्का अंधेरा था, बाहर बारिश की आवाज़ तेज़ हो गई थी, बिजली कड़क रही थी। शकुंतला ने दीवार से टेक लगाई, थकान से उसकी साँसें ऊँची-नीची हो रही थीं। राहुल पास आया, उसकी आँखों में एक ऐसी भूख थी जो माँ-बेटे के रिश्ते से परे थी। “माँ, तुम… तुम बहुत सुंदर लग रही हो,” उसने धीमे से कहा, आवाज़ में कंपकंपी थी। शकुंतला ने चौंककर देखा, उसके मन में भी कई सालों से दबी हुई चाहत जाग रही थी, लेकिन वह खुद को रोकना चाहती थी। “राहुल, ऐसा मत बोल… मैं तेरी माँ हूँ,” उसने कहा, लेकिन उसकी आवाज़ में दृढ़ता नहीं थी। राहुल ने एक कदम और बढ़ाया, अब दोनों के बीच सिर्फ़ कुछ इंच की दूरी थी। गीले कपड़ों से माँ के शरीर की गर्माहट और उसकी खुशबू उसे मदहोश कर रही थी।
राहुल ने धीरे से माँ के बालों में हाथ फेरा, फिर उसकी कमर पर। शकुंतला का शरीर सिहर गया, वह पीछे हटना चाहती थी, लेकिन पैर जैसे जड़ हो गए। “नहीं राहुल… यह पाप है,” उसने फुसफुसाया, लेकिन उसकी आँखें बंद हो गईं जब राहुल ने उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। जैसे कोई प्यासा फल का रस चूस रहा हो, दोनों ने एक-दूसरे के होंठों का रस चूसना शुरू किया। शकुंतला ने विरोध किया, लेकिन कुछ ही पलों में उसका हाथ भी राहुल की पीठ पर आ गया। राहुल ने माँ के तरबूज जैसे स्तनों को दबाया, अंगूर जैसे निप्पल को उँगलियों से सहलाया। शकुंतला से एक हल्की सी सिसकारी निकली, “आह… राहुल… मत कर…” लेकिन उसकी आवाज़ में अब रोकने की बजाय प्रार्थना थी।
राहुल ने माँ का ब्लाउज धीरे-धीरे खोला, तरबूज जैसे स्तन बाहर आ गए, बारिश की बूँदें उन पर चमक रही थीं। उसने एक तरबूज को मुंह में लिया, अंगूर जैसे निप्पल को जीभ से चाटा, चूसा। शकुंतला का शरीर काँप रहा था, उसकी खाई में गर्माहट बढ़ रही थी, जैसे कोई रसीली जगह प्यासी हो रही हो। राहुल ने साड़ी को ऊपर सरकाया, माँ की झाड़ी हल्की-हल्की गीली हो चुकी थी। उसने उँगली से खाई को छुआ, शकुंतला ने कराहते हुए कहा, “बेटा… हम क्या कर रहे हैं…” लेकिन राहुल ने कहा, “माँ आज सिर्फ़ औरत बन जाओ… मुझे जी भर के प्यार करने दो।” शकुंतला की आँखों में आँसू थे, लेकिन शरीर कह रहा था कि रुकना अब मुमकिन नहीं।
राहुल ने माँ को घुमाया, वह दीवार की ओर झुक गई। उसने अपना केला बाहर निकाला, जो लंबा, मोटा और सख्त हो चुका था, जैसे कोई पका हुआ फल तैयार हो। उसने केले को माँ की खाई पर रगड़ा, शकुंतला की सिसकारी निकली। फिर धीरे से धक्का दिया, केला खाई में सरक गया। शकुंतला ने “आआह…” कहा, दर्द और सुख का मिश्रण। राहुल ने धीरे-धीरे खुदाई शुरू की, हर धक्के के साथ माँ का पिछवाड़ा हिल रहा था। बाहर बारिश की आवाज़, बिजली की कड़क, और अंदर दोनों की साँसें और कराहें मिलकर एक संगीत बना रही थीं। शकुंतला अब खुद पीछे धक्के देने लगी, उसकी खाई गीली होकर केले को आसानी से अंदर-बाहर होने दे रही थी।
राहुल ने माँ के तरबूज जैसे स्तनों को पीछे से पकड़ा, दबाया, जबकि खुदाई तेज़ हो गई। शकुंतला की आवाज़ें बढ़ती गईं, “आह… राहुल… और गहरा…” वह भूल चुकी थी कि यह उसका बेटा है, अब सिर्फ़ एक पुरुष था जो उसकी सालों की प्यास बुझा रहा था। राहुल ने माँ को घुमाया, उसे ज़मीन पर लिटाया, पैर फैलाए। अब वह ऊपर था, केला पूरी तरह खाई में डालकर जोर-जोर से धक्के मार रहा था। शकुंतला के हाथ राहुल की पीठ पर नाखून गड़ा रहे थे, उसका शरीर लहरा रहा था। कई मिनट तक यह खुदाई चलती रही, दोनों के शरीर पसीने और बारिश से तर थे। आखिरकार राहुल का केला फड़का, और उसने रस छोड़ दिया, गहराई में। शकुंतला भी रस निकालते हुए काँप उठी, जैसे कोई फल पूरी तरह पककर फट पड़ा हो।
दोनों कुछ देर लेटे रहे, साँसें संभालते हुए। बारिश धीमी पड़ गई। शकुंतला ने राहुल की ओर देखा, आँखों में अब शर्मिंदगी कम और संतुष्टि ज़्यादा थी। “हमने जो किया… वह कभी नहीं भूलना चाहिए,” उसने कहा। राहुल ने माँ का हाथ पकड़ा, “माँ, अब से तुम्हारी हर कमी मैं पूरी करूँगा।” दोनों ने कपड़े ठीक किए, हाथ में हाथ डालकर घर की ओर चल पड़े। रात में घर पहुँचकर भी दोनों की आँखों में वही आग थी, और यह सिर्फ़ शुरुआत थी। खेत की उस शाम ने उनके रिश्ते को हमेशा के लिए बदल दिया था, जहाँ प्यार और चाहत एक हो चुके थे।