रात के ग्यारह बज चुके थे और राजधानी एक्सप्रेस अपनी पूरी रफ़्तार से पटरियों पर दौड़ रही थी। कोच के अंदर की मद्धम रोशनी एक अजीब सा नशा पैदा कर रही थी। समीर अपनी सीट पर बैठा बाहर के अंधेरे को देख रहा था, तभी उसकी नज़र सामने वाली बर्थ पर बैठी उस अजनबी महिला पर पड़ी जिसका नाम उसने अभी कुछ देर पहले ही बातों-बातों में जाना था—अंजली। अंजली की उम्र लगभग बत्तीस साल रही होगी, लेकिन उसके शरीर की बनावट किसी ढलती उम्र की नहीं बल्कि एक पके हुए रसीले फल की तरह थी जो बस टूटने के इंतज़ार में हो। उसने गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी, जिसमें से उसके शरीर के उभार रह-रहकर समीर की आँखों को अपनी ओर खींच रहे थे। अंजलि की आँखों में एक अजीब सी बेचैनी थी और वही बेचैनी समीर के मन में भी घर कर रही थी। ट्रेन के झटकों के साथ उसके शरीर का हर अंग एक लय में हिल रहा था, जिससे माहौल में कामुकता का एक नया रंग घुलने लगा था।
अंजली के शरीर की बनावट वाक़ई किसी अप्सरा से कम नहीं थी। जब वह अपनी साड़ी का पल्लू ठीक करती, तो उसके ब्लाउज में दबे हुए पुष्ट और उभरे हुए तरबूज साफ़ नज़र आते थे, जो सांसों की गति के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। उन तरबूजों की गोलाई इतनी गहरी थी कि समीर का मन कर रहा था कि बस उन्हें देखता ही रहे। जब भी वह हिलती, उसके भारी पिछवाड़ा सीट पर एक अलग ही दबाव बनाता, जिससे उसकी कामुकता और भी बढ़ जाती थी। साड़ी के नीचे से उसकी गोरी कमर की झलक मिल रही थी और नाभि के पास का वो हिस्सा किसी गहरी खाई की तरह लग रहा था, जिसमें कोई भी खो जाना चाहेगा। उसके चेहरे की मासूमियत और उसके बदन की उत्तेजना का संगम समीर के दिल की धड़कनें बढ़ा रहा था। समीर को लग रहा था जैसे अंजली भी उसकी नज़रों को महसूस कर रही है और उसे अनदेखा करने के बजाय उसका आनंद ले रही है।
दोनों के बीच बातों का सिलसिला धीरे-धीरे शुरू हुआ। अंजलि ने बताया कि वह एक शादी से लौट रही है और उसका पति इस समय शहर से बाहर है। उसकी बातों में एक अकेलापन था और आवाज़ में एक ऐसी थरथराहट थी जो साफ़ बता रही थी कि वह भी किसी स्पर्श की भूखी है। समीर ने भी अपनी बातों से उसे ये महसूस कराया कि वह उसे बहुत पसंद कर रहा है। धीरे-धीरे बातों का रुख निजी होने लगा और माहौल में एक कामुक खिंचाव सा पैदा हो गया। अंजली की साँसें अब कुछ तेज़ चलने लगी थीं और वह बार-बार अपने होंठों पर ज़बान फेर रही थी, जैसे वह समीर को कोई मूक निमंत्रण दे रही हो। ट्रेन का शोर अब फीका पड़ गया था और उन दोनों की साँसों की आवाज़ें एक-दूसरे के बहुत करीब आने लगी थीं। समीर ने महसूस किया कि अब झिझक की दीवारें धीरे-धीरे गिर रही हैं और उनके बीच का आकर्षण अपने चरम पर पहुँच रहा है।
समीर ने हिम्मत जुटाई और धीरे से अपना हाथ अंजलि के घुटने पर रखा। अंजली ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उसकी आँखें बंद हो गईं और उसने एक लंबी गहरी साँस ली। समीर का हाथ धीरे-धीरे उसकी जांघों के ऊपर की ओर बढ़ने लगा। रेशमी साड़ी के स्पर्श के नीचे अंजलि की गर्म त्वचा समीर को पागल कर रही थी। जैसे ही समीर का हाथ उसके तरबूजों के पास पहुँचा, अंजली के मुँह से एक हल्की सी कराह निकली। समीर ने अपनी उँगलियों से उसके ब्लाउज के ऊपर से ही उन सख्त मटर को सहलाया, जो उत्तेजना के मारे अब साफ़ महसूस किए जा सकते थे। समीर ने अंजली के करीब जाकर उसके कानों में कुछ फुसफुसाया, जिससे वह पूरी तरह कांप उठी। अब उन दोनों के बीच कोई दूरी नहीं बची थी; समीर ने उसके होठों का शहद चखना शुरू किया और अंजली ने भी उतनी ही शिद्दत से उसका साथ दिया।
समीर ने अंजली को अपनी बाहों में भर लिया और उसके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने लगा। जैसे ही ब्लाउज खुला, दो विशाल और चमकदार गोरे तरबूज समीर की आँखों के सामने थे। उनके ऊपर मौजूद गुलाबी मटर अब पूरी तरह से तने हुए थे। समीर ने झुककर उन तरबूजों को अपने मुँह में लिया और उन्हें धीरे-धीरे चूसने लगा। अंजली अपनी पीठ मोड़कर समीर के बालों में उंगलियां फिराने लगी और उसकी कराहें कोच की शांत हवा में गूँजने लगीं। समीर ने अब साड़ी की परतों को हटाया और उसकी गहरी खाई के पास पहुँचा। वहाँ घने बाल एक रक्षक की तरह खड़े थे, लेकिन समीर ने अपनी उँगलियों से उस खाई के द्वार को सहलाना शुरू किया। खाई अब पूरी तरह गीली हो चुकी थी, जो इस बात का सबूत था कि अंजली की खुदाई की इच्छा अब अपने चरम पर पहुँच चुकी है।
अंजली की उत्तेजना अब बेकाबू हो रही थी। उसने समीर की पैंट की ज़िप खोली और उसके अंदर छिपे हुए गर्म और विशाल खीरा को बाहर निकाला। जैसे ही उसने उस खीरा को अपने हाथ में लिया, वह उसकी लंबाई और मोटाई देखकर दंग रह गई। उसने अपनी गर्म हथेलियों से उस खीरा को ऊपर-नीचे सहलाया और फिर धीरे से उसे अपने मुँह में लेकर खीरा चूसना शुरू किया। समीर की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा और वह बस उस सुखद अहसास में डूब गया। अंजली ने बड़ी ही कुशलता से उस खीरा को अपने मुँह की गहराई तक लिया, जिससे समीर का पूरा बदन कांप उठा। कुछ देर बाद, समीर ने उसे रोका और उसे बिस्तर पर सामने से खोदना की स्थिति में लिटा दिया। उसने अपने खीरा को उसकी रसीली खाई के मुहाने पर रखा और एक ज़ोरदार धक्के के साथ आधा खीरा अंदर उतार दिया। अंजलि के मुँह से एक तीखी चीख निकली जो फिर एक आनंदमयी कराह में बदल गई।
समीर ने अब अपनी रफ़्तार बढ़ानी शुरू की। वह पूरी ताकत से अंजलि की खाई की खुदाई करने लगा। हर धक्के के साथ अंजलि के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उसकी चूड़ियाँ खनक रही थीं। समीर ने उसे अब पिछवाड़े से खोदना की स्थिति में किया और पीछे से उसके भारी पिछवाड़ा को पकड़कर अपनी खुदाई जारी रखी। अंजली बार-बार कह रही थी, ‘हाँ समीर, और तेज़ खोदो, मुझे पूरा भर दो!’ कमरे का तापमान अब बहुत बढ़ चुका था और दोनों पसीने से तरबतर थे। समीर का खीरा बार-बार उसकी खाई की गहराई से टकरा रहा था, जिससे अंजलि की आँखों में आँसू और होठों पर मुस्कान एक साथ आ रही थी। अंत में, समीर ने अपनी रफ़्तार को चरम पर पहुँचाया और जैसे ही उसका रस छूटना शुरू हुआ, अंजली ने भी ज़ोर से चिल्लाते हुए अपना रस निकाला। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बेदम होकर गिर पड़े। उस रात ट्रेन की वो यात्रा उनके जीवन की सबसे यादगार और रसीली खुदाई की कहानी बन गई।