रात के ग्यारह बज चुके थे और पूरी ऑफिस बिल्डिंग में सन्नाटा पसरा हुआ था सिवाय दसवें माले के उस केबिन के जहाँ समीर अपनी फाइलों में डूबा हुआ था। समीर एक गठीले बदन का चौबीस वर्षीय नौजवान था जिसकी चौड़ी छाती और मजबूत बाजू उसकी मेहनत की गवाही देते थे। अचानक केबिन का दरवाजा खुला और सुगंधा जी अंदर आईं जो इस कंपनी की मालकिन थीं और जिनकी उम्र चालीस के पार होने के बावजूद किसी कयामत से कम नहीं थी। उन्होंने एक गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी जिसमें से उनके शरीर के उतार-चढ़ाव साफ झलक रहे थे। समीर उन्हें देखते ही खड़ा हो गया क्योंकि सुगंधा जी का व्यक्तित्व ही ऐसा था जो किसी को भी सम्मोहित कर दे। उनके चेहरे पर एक अजीब सी थकान और आँखों में एक अनकही प्यास थी जो समीर को बेचैन करने लगी थी।
सुगंधा जी की शारीरिक बनावट बहुत ही आकर्षक और कामुक थी जो किसी भी मर्द को पागल करने के लिए काफी थी। उनकी रेशमी साड़ी के नीचे उनके दो विशाल तरबूज साफ तौर पर अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे जो हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे। उनके तरबूज इतने भरे हुए और टाइट थे कि ब्लाउज की डोरी उन्हें थामने में मशक्कत कर रही थी। जब वह समीर के पास आकर खड़ी हुईं तो समीर की नजरें उनके तरबूजों के बीच की गहरी घाटी पर टिक गईं जहाँ पसीने की एक बूंद धीरे-धीरे नीचे की ओर सरक रही थी। उनकी कमर पतली थी और उनके कूल्हे काफी चौड़े और भारी थे जिन्हें देखकर समीर के मन में हलचल मच गई। सुगंधा जी ने अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा ढीला किया जिससे उनके तरबूज और भी ज्यादा उभर कर सामने आ गए।
समीर और सुगंधा जी के बीच पिछले कुछ महीनों से एक अनकहा सा खिंचाव महसूस किया जा रहा था जो आज अपनी चरम सीमा पर था। सुगंधा जी ने समीर के कंधे पर अपना कोमल हाथ रखा और उनकी उंगलियां धीरे-धीरे समीर की गर्दन की खाल को सहलाने लगीं। समीर को उनके शरीर की गर्माहट महसूस हो रही थी और उनकी सांसों में घुली मदिरा जैसी खुशबू उसे मदहोश कर रही थी। सुगंधा जी ने बहुत ही धीमी और भारी आवाज में कहा कि आज घर पर कोई नहीं है और वह बहुत अकेला महसूस कर रही हैं। समीर ने उनकी आँखों में देखा जहाँ वासना और प्यार का एक अद्भुत संगम था जिसने उसे अपनी ओर खींच लिया। उन दोनों के बीच की झिझक अब धीरे-धीरे पिघलने लगी थी और हवा में एक अजीब सी उत्तेजना का संचार होने लगा था।
सुगंधा जी ने अपनी रेशमी उंगलियों से समीर के चेहरे को छुआ और फिर धीरे-धीरे उसके होंठों की ओर बढ़ीं जिससे समीर का दिल तेजी से धड़कने लगा। समीर ने अपनी हिम्मत जुटाई और उनके भारी तरबूजों को अपने दोनों हाथों में भर लिया जो बहुत ही मुलायम और गर्म महसूस हो रहे थे। सुगंधा जी के मुँह से एक मदभरी आह निकली और उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं जैसे वह इसी स्पर्श का इंतजार कर रही थीं। समीर ने उनके तरबूजों को हल्के से दबाया जिससे उनके मटर जैसे हिस्से और भी सख्त हो गए और साड़ी के कपड़े के ऊपर से ही महसूस होने लगे। समीर का खीरा अब पूरी तरह से जाग चुका था और उसकी पैंट के अंदर अपनी जगह बनाने के लिए छटपटा रहा था जो सुगंधा जी की जांघों से टकरा रहा था।
धीरे-धीरे समीर ने सुगंधा जी को मेज के पास धकेला और उनके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने शुरू कर दिए जिससे उनके गोरे और विशाल तरबूज पूरी तरह बाहर आ गए। समीर ने अपनी जुबान से उनके मटर जैसे हिस्सों को सहलाना शुरू किया जिससे सुगंधा जी की कराहें पूरे कमरे में गूंजने लगीं। उन्होंने समीर के सिर को अपने तरबूजों में भींच लिया और जोर-जोर से सांसें लेने लगीं जो समीर के कानों में संगीत की तरह लग रही थीं। समीर ने अब उनके हाथ को अपने उभरे हुए खीरे पर रखा जिसे महसूस करते ही सुगंधा जी के चेहरे पर एक अलग ही चमक आ गई। उन्होंने समीर की पैंट की जिप खोली और उस विशाल और सख्त खीरे को बाहर निकाला जो अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ गर्व से खड़ा था।
सुगंधा जी ने बिना देर किए उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे बड़ी ही कोमलता से चूसने लगीं जैसे वह कोई स्वादिष्ट फल हो। समीर के लिए यह अनुभव बहुत ही सुखद था और वह अपनी आँखें बंद करके उस आनंद को महसूस कर रहा था। कुछ देर खीरा चूसने के बाद समीर ने उन्हें मेज पर लेटा दिया और उनकी साड़ी को ऊपर की ओर खिसकाया जहाँ उनकी गहरी और नम खाई इंतजार कर रही थी। समीर ने अपनी उंगलियों से उस खाई को टटोलना शुरू किया जो पूरी तरह से गीली हो चुकी थी और वहां के छोटे-छोटे बाल समीर की उंगलियों में फंस रहे थे। सुगंधा जी अपनी कमर ऊपर उठा-उठाकर समीर को और भी ज्यादा कुरेदने के लिए उकसा रही थीं क्योंकि उनकी खाई अब पूरी तरह से खुदाई के लिए तैयार थी।
समीर ने अपने भारी खीरे को उस गीली और तंग खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से अंदर धकेला जिससे सुगंधा जी के मुँह से एक लंबी और दर्दभरी लेकिन सुखद चीख निकली। खाई बहुत ही तंग थी लेकिन समीर के खीरे ने अपनी जगह बनानी शुरू कर दी और वह धीरे-धीरे गहराई तक समा गया। सुगंधा जी ने अपने दोनों पैर समीर की कमर के चारों ओर लपेट लिए और उसे अपने और भी करीब खींच लिया। समीर ने अब पूरी रफ्तार से खुदाई शुरू कर दी और कमरे में मांस के टकराने की आवाजें आने लगीं। हर धक्के के साथ सुगंधा जी के तरबूज जोर-जोर से हिल रहे थे और समीर उन्हें अपने हाथों में पकड़कर और भी तेजी से खुदाई कर रहा था। दोनों के शरीर पसीने से तरबतर हो चुके थे और कमरे का तापमान काफी बढ़ चुका था।
खुदाई की प्रक्रिया अब बहुत ही गहन और भावनात्मक मोड़ ले चुकी थी जहाँ सिर्फ शरीर नहीं बल्कि आत्माएं भी मिल रही थीं। समीर ने सुगंधा जी को घुमाया और उन्हें पिछवाड़े से खोदने की मुद्रा में ला खड़ा किया जिससे उनका भारी पिछवाड़ा समीर के सामने था। समीर ने अपने खीरे को पीछे से उनकी तंग खाई में उतारा और तेज झटकों के साथ खुदाई जारी रखी जिससे सुगंधा जी बेहाल हो गईं। वह बार-बार समीर का नाम पुकार रही थीं और कह रही थीं कि उसे कभी मत छोड़ना। समीर की गति अब बेकाबू हो गई थी और उसे महसूस हो रहा था कि अब उसका रस निकलने ही वाला है। सुगंधा जी भी अपने चरम पर थीं और उनकी खाई के अंदर की दीवारें समीर के खीरे को जोर-जोर से भींच रही थीं।
अंत में एक जबरदस्त झटके के साथ समीर का सारा गर्म रस सुगंधा जी की खाई की गहराई में छूट गया और उसी समय सुगंधा जी का भी रस निकल गया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए मेज पर ही ढह गए और उनकी सांसें बहुत तेज चल रही थीं। समीर को एक ऐसी संतुष्टि महसूस हुई जो उसने पहले कभी नहीं जानी थी और सुगंधा जी के चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था। खुदाई के बाद की वह शांति बहुत ही गहरी थी जहाँ दोनों एक-दूसरे की धड़कनों को महसूस कर रहे थे। सुगंधा जी ने समीर के माथे को चूमा और धीरे से मुस्कुराईं जैसे उन्हें वो सब मिल गया हो जिसकी उन्हें सालों से तलाश थी। उस रात के बाद उन दोनों का रिश्ता सिर्फ काम का नहीं रहा बल्कि वह एक गहरे और अटूट बंधन में बंध चुके थे।