रात के ग्यारह बज चुके थे और ऑफिस की शांत गलियारे में केवल सेंट्रल एसी की हल्की सी सरसराहट गूँज रही थी। राघव अपने विशाल केबिन में बैठा कुछ फाइलों को देख रहा था लेकिन उसका मन काम में कम और सामने बैठी अपनी सेक्रेटरी नेहा की ओर अधिक था। नेहा आज नीले रंग की सिल्क की साड़ी पहनकर आई थी जिसमें उसका गोरा रंग और भी ज्यादा निखर कर आ रहा था। साड़ी का पल्लू बार-बार उसके कंधों से फिसल रहा था जिसे वह बड़ी नजाकत से वापस सहेज लेती थी लेकिन राघव की नजरें उस पर जम चुकी थीं। ऑफिस की मध्यम रोशनी में नेहा के शरीर का हर घुमाव एक अलग ही दास्तां बयां कर रहा था और राघव के अंदर एक अजीब सी हलचल पैदा कर रहा था जो आज नियंत्रण से बाहर होती जा रही थी।
नेहा की शारीरिक बनावट किसी तराशी हुई मूरत जैसी थी जिसके हर अंग में एक अलग ही कशिश और उभार था। उसकी साड़ी के नीचे से उभरते हुए उसके दो बड़े-बड़े रसीले तरबूज राघव की धड़कनों को तेज कर रहे थे जो ब्लाउज की तंग सीमा को लांघने के लिए बेताब लग रहे थे। जब वह झुककर फाइल बढ़ाती तो उसके तरबूजों की गहरी घाटी साफ नजर आती थी जिससे राघव के अंदर का तापमान अचानक ही बढ़ जाता था। उसके कूल्हों का घेराव और उसकी पतली कमर का जोड़ इतना कामुक था कि कोई भी उसे देखकर अपनी सुधबुध खो सकता था। नेहा की आँखों में भी एक अजीब सी चमक थी जो यह बता रही थी कि वह भी इस बढ़ती हुई नजदीकी और हवा में मौजूद तनाव को महसूस कर रही है।
राघव ने अपनी कुर्सी थोड़ी आगे की और एक फाइल मांगने के बहाने अपना हाथ नेहा के हाथ के ऊपर रख दिया। वह स्पर्श मात्र एक शारीरिक स्पर्श नहीं था बल्कि उसमें महीनों की दबी हुई इच्छाएं और भावनाएं एक साथ बह निकली थीं। नेहा ने अपना हाथ हटाया नहीं बल्कि उसकी उंगलियों ने राघव की उंगलियों को और मजबूती से पकड़ लिया जिससे राघव का मनोबल और बढ़ गया। उसने महसूस किया कि नेहा की सांसें अब तेज हो चुकी थीं और उसके चेहरे पर एक हल्की सी गुलाबी रंगत आ गई थी जो उसकी शर्म और बढ़ती हुई उत्तेजना का मिला-जुला रूप थी। कमरे में सन्नाटा तो था पर उन दोनों की सांसों का शोर अब उस सन्नाटे को चीरने लगा था और माहौल पूरी तरह से बदलने लगा था।
राघव धीरे से अपनी कुर्सी से उठा और नेहा के पीछे जाकर खड़ा हो गया जहाँ से उसे नेहा के गर्दन का वह हिस्सा दिख रहा था जो बालों से मुक्त था। उसने झुककर अपनी नाक नेहा की गर्दन के पास ले जाकर उसकी खुशबू को गहराई से महसूस किया जिससे नेहा के शरीर में एक कंपन सा दौड़ गया। राघव के हाथ अब नेहा के कंधों से होते हुए धीरे-धीरे नीचे उसके रेशमी तरबूजों की ओर बढ़ने लगे थे और उसने महसूस किया कि नेहा ने अपनी आँखें बंद कर ली थीं। जैसे ही राघव की हथेलियों ने उन भारी और नरम तरबूजों को छुआ नेहा के मुंह से एक दबी हुई आह निकली जो कमरे की शांति में किसी संगीत की तरह गूँजी। उसने उन तरबूजों को धीरे-धीरे मसलना शुरू किया जिससे उनके ऊपर लगे छोटे-छोटे मटर सख्त होने लगे थे।
नेहा ने धीरे से राघव की ओर मुड़कर उसे देखा और उसकी आँखों में अब कोई झिझक नहीं बल्कि एक प्यास थी जो बुझने का नाम नहीं ले रही थी। राघव ने बिना देर किए उसे अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंठों पर अपना कब्जा जमा लिया जिसे वह काफी समय से चखना चाहता था। उनका यह मिलन बहुत ही गहरा और भावुक था जिसमें दोनों एक-दूसरे की सांसों को अपने अंदर उतार रहे थे। राघव का हाथ अब नेहा की साड़ी के पल्लू को पूरी तरह से हटा चुका था और वह उसके अंगों की बारीकियों को निहार रहा था। उसने नेहा को अपनी मेज पर बैठा दिया और उसकी जांघों के बीच की गहरी खाई की ओर बढ़ने लगा जहाँ से अब हल्की सी नमी का अहसास होने लगा था।
राघव के हाथ अब नेहा की जांघों को सहला रहे थे और वह धीरे-धीरे उसकी उस गुप्त और पवित्र खाई की ओर बढ़ रहा था जो पूरी तरह से गीली हो चुकी थी। जब राघव की उंगलियों ने उस खाई को स्पर्श किया तो नेहा ने अपनी कमर ऊपर की ओर उठाई और उसकी पकड़ राघव के बालों पर और भी ज्यादा मजबूत हो गई। उसने अपनी उंगली से उस खाई में खुदाई शुरू की जिससे नेहा के शरीर में बिजली सी दौड़ गई और वह जोर-जोर से कराहने लगी। उस खाई के अंदर का तापमान और उसका लचीलापन राघव को पागल कर रहा था और अब उसे महसूस हुआ कि उसका अपना खीरा भी पूरी तरह से तैयार और कड़ा हो चुका है जो अपनी जगह से बाहर निकलने के लिए छटपटा रहा था।
नेहा ने राघव की बेल्ट खोल दी और जैसे ही उसने राघव के उस विशाल और सख्त खीरे को बाहर निकाला उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वह खीरा इतना लंबा और मोटा था कि उसे देखकर नेहा के मन में डर और उत्तेजना का एक अद्भुत मिश्रण पैदा हुआ। नेहा ने उस खीरे को अपने नाजुक हाथों में पकड़ा और उसे सहलाने लगी जिससे राघव के मुंह से भी सिसकारियां निकलने लगीं। कुछ ही पलों बाद नेहा ने उस खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे बड़े चाव से चूसने लगी जैसे वह किसी स्वादिष्ट फल का आनंद ले रही हो। राघव को ऐसा सुख मिल रहा था जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था और वह नेहा के सिर को पकड़कर उसे और गहराई तक खींचने लगा।
जब उत्तेजना अपनी चरम सीमा पर पहुँच गई तो राघव ने नेहा को मेज पर लेटा दिया और उसकी दोनों टांगों को अपने कंधों पर रख लिया। उसने अपने खीरे की नोक को नेहा की उस गीली और तंग खाई के मुहाने पर टिकाया और एक गहरे दबाव के साथ अंदर की ओर धकेल दिया। नेहा के मुंह से एक तीखी चीख निकली लेकिन वह दर्द जल्द ही चरम आनंद में बदल गया क्योंकि वह खीरा धीरे-धीरे उसकी खाई की गहराई को नाप रहा था। राघव ने अब पूरी ताकत से खुदाई शुरू कर दी थी और हर धक्के के साथ नेहा का पूरा शरीर मेज पर आगे-पीछे हो रहा था। उन दोनों के शरीर पसीने से लथपथ थे और कमरे में केवल अंगों के टकराने की आवाजें और उनकी भारी सांसें सुनाई दे रही थीं।
राघव ने अब नेहा को मेज पर घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने की मुद्रा में ले आया जिससे उसके उभरे हुए पिछवाड़े का नजारा और भी ज्यादा दिलकश लग रहा था। उसने पीछे से अपने खीरे को फिर से उस खाई में उतारा और तेज गति से खुदाई जारी रखी जिससे नेहा की आवाज अब और भी ऊँची हो गई थी। वह बार-बार राघव से और तेज खोदने की विनती कर रही थी क्योंकि उसे अब उस मुकाम का अहसास होने लगा था जहाँ पहुँचकर सब कुछ शून्य हो जाता है। राघव की मेहनत अब रंग ला रही थी और नेहा की खाई से रस की कुछ बूंदें बाहर निकलने लगी थीं जो इस बात का संकेत थीं कि वह अपने गंतव्य के बेहद करीब है।
अंततः वह पल आ ही गया जब दोनों का शरीर एक साथ कांपने लगा और राघव ने अपने खीरे को नेहा की खाई के एकदम अंदर तक घुसा दिया। नेहा के शरीर से ढेर सारा रस निकलने लगा और वह पूरी तरह से निढाल होकर मेज पर गिर पड़ी जबकि राघव का भी सारा सत्व उस खाई के भीतर समा गया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए काफी देर तक वहीं पड़े रहे और उनकी धड़कनें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं। उस रात ऑफिस के उस केबिन ने न केवल दो शरीरों का मिलन देखा था बल्कि दो आत्माओं की उस प्यास को भी शांत होते देखा था जो सामाजिक बंधनों और काम के दबाव के नीचे कहीं दबी हुई थी। नेहा और राघव अब पहले जैसे नहीं रहे थे उनके बीच अब एक ऐसा रिश्ता बन चुका था जिसकी यादें हमेशा उनके जेहन में ताजा रहने वाली थीं।