मौसी की रसीली खुदाई—>भीषण गर्मी की वह दोपहर आज भी अनीश के जेहन में किसी गहरी छाप की तरह अंकित है। २२ साल का अनीश, जो अभी कॉलेज की पढ़ाई पूरी कर रहा था, अपने गर्मियों की छुट्टियां बिताने अपनी मौसी साधना के घर आया हुआ था। साधना मौसी की उम्र ३८ साल के करीब थी, लेकिन उनके शरीर की बनावट और चेहरे का नूर किसी २२-२५ साल की युवती को भी मात दे सकता था। उनका व्यक्तित्व बहुत ही सौम्य और गंभीर था, लेकिन उनके भीतर एक ऐसी दबी हुई आग थी जिसे अनीश ने अपनी पारखी नजरों से पहचान लिया था। साधना मौसी के पति अक्सर व्यापार के सिलसिले में शहर से बाहर रहते थे, और इस बार भी वह १५ दिनों के लिए बाहर गए हुए थे। घर में साधना और अनीश के अलावा और कोई नहीं था। साधना मौसी का शरीर काफी भरा हुआ और सुडौल था। उनके गोरे रंग पर जब वे गहरे रंग की सूती साड़ी पहनती थीं, तो उनकी सुंदरता में चार चांद लग जाते थे।
साधना के शरीर के अंग किसी कलाकार की कल्पना जैसे थे। उनके ब्लाउज के भीतर छिपे हुए भारी और रसीले **तरबूज** जब वह चलती थीं, तो एक लय में ऊपर-नीचे होते थे। अनीश अक्सर रसोई के दरवाजे पर खड़ा होकर उन्हें काम करते हुए देखता रहता। जब साधना ऊपर रखे किसी डिब्बे को उतारने के लिए हाथ ऊपर उठातीं, तो उनके ब्लाउज के नीचे से उनके **तरबूजों** का निचला हिस्सा साफ नजर आता और उनके **मटर** जैसे दाने कपड़े के ऊपर से ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा देते थे। उनकी कमर बहुत ही पतली और लचीली थी, लेकिन उसके नीचे का हिस्सा, जिसे वह अपना **पिछवाड़ा** कहती थीं, काफी भारी और मांसल था। जब वह घर में चहल-कदमी करतीं, तो उनके **पिछवाड़े** का थरथराना अनीश के मन में तूफ़ान पैदा कर देता था। अनीश की नजरें अक्सर उनके पैरों के बीच उस जगह जाकर टिक जातीं जहाँ उनकी **खाई** छिपी हुई थी, और वह कल्पना करता कि वहां कितने कोमल और रेशमी **बाल** होंगे।
उस दिन दोपहर का वक्त था और सूरज अपनी पूरी तपिश बिखेर रहा था। साधना मौसी ने हल्के नीले रंग की पतली साड़ी पहनी हुई थी, जो पसीने के कारण उनके शरीर से चिपक गई थी। अनीश ड्राइंग रूम में बैठा अखबार पढ़ रहा था, लेकिन उसका ध्यान बार-बार मौसी के कमरे की ओर जा रहा था। मौसी वहां लेटी हुई थीं और शायद उन्हें नींद नहीं आ रही थी। अचानक साधना ने अनीश को आवाज दी, “अनीश, जरा यहाँ आना, मेरी पीठ में बहुत दर्द हो रहा है।” अनीश का दिल जोर से धड़कने लगा। वह कमरे में गया तो देखा कि साधना पेट के बल लेटी हुई थीं और उनका ब्लाउज पीछे से खुला हुआ था। उनके गोरे और चिकने बदन को देखकर अनीश की सांसें रुक गईं। उसने धीरे से अपनी उंगलियां उनकी पीठ पर रखीं। साधना का शरीर उस स्पर्श से सिहर उठा। अनीश ने महसूस किया कि उनके शरीर का तापमान सामान्य से ज्यादा था।
जैसे-जैसे अनीश मौसी की पीठ सहलाने लगा, उसकी हिम्मत बढ़ने लगी। उसने धीरे से अपनी उंगलियों को नीचे की ओर सरकाया, जहाँ उनकी साड़ी की बंधक और उनके भारी **पिछवाड़े** की शुरुआत होती थी। साधना ने एक लंबी और गहरी सांस ली, लेकिन उन्होंने उसे रोका नहीं। अनीश ने देखा कि मौसी के **तरबूज** बिस्तर से दबे हुए थे और बगल से उनके उभार साफ झलक रहे थे। उसने हिम्मत जुटाकर अपना हाथ आगे बढ़ाया और एक **तरबूज** को अपनी हथेली में भर लिया। वह इतना नरम और गर्म था कि अनीश को लगा जैसे उसने कोई मखमली चीज पकड़ ली हो। साधना के मुंह से एक धीमी कराह निकली, “अनीश… ये तुम क्या कर रहे हो?” लेकिन उनकी आवाज में विरोध कम और समर्पण ज्यादा था। अनीश ने उनके कान के पास जाकर धीरे से कहा, “मौसी, आप बहुत सुंदर हैं, मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ।”
साधना ने करवट बदली और अब वह सीधे अनीश की आंखों में देख रही थीं। उनकी आंखों में हवस और ममता का एक अजीब मिश्रण था। उन्होंने अनीश का हाथ पकड़कर उसे अपने दूसरे **तरबूज** पर रख दिया। अनीश ने अपनी उंगलियों से उनके **मटर** को सहलाना शुरू किया, जो अब उत्तेजना के मारे पूरी तरह सख्त हो चुके थे। साधना की सांसें अब तेज चलने लगी थीं। अनीश ने झुककर उनके होंठों को चूमना चाहा, लेकिन साधना ने अपना चेहरा फेर लिया। फिर अचानक उन्होंने अनीश को अपनी ओर खींचा और उसके होंठों को जोर से चूसने लगीं। कमरे का माहौल अब पूरी तरह बदल चुका था। अनीश ने धीरे-धीरे उनके कपड़े उतारना शुरू किया। जब साधना पूरी तरह निर्वस्त्र हुईं, तो अनीश के सामने कुदरत का सबसे खूबसूरत करिश्मा था। उनके पैरों के बीच की **खाई** बहुत ही गहरी और गीली हो चुकी थी, और वहां के सुनहरे **बाल** पसीने से चिपके हुए थे।
अनीश का **खीरा** अब अपनी पेंट की कैद से बाहर आने को व्याकुल था। जैसे ही उसने अपनी पेंट उतारी, उसका विशाल और सख्त **खीरा** उछलकर बाहर आ गया। साधना उसे देखकर दंग रह गईं और अपनी आंखें बड़ी कर लीं। उन्होंने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और उस **खीरे** को पकड़ लिया। उसकी गर्मी और सख्ती ने साधना को और भी पागल कर दिया। उन्होंने उस **खीरे को अपने मुंह में ले लिया** और उसे किसी आइसक्रीम की तरह चूसने लगीं। अनीश की आंखों के सामने अंधेरा छाने लगा, उसे इतना सुख मिल रहा था कि वह शब्दों में बयां नहीं कर सकता था। साधना की जीभ जब **खीरे** के ऊपरी हिस्से पर फिरती, तो अनीश के शरीर में बिजली की लहर दौड़ जाती। काफी देर तक **खीरा चूसने** के बाद, साधना ने उसे इशारे से बिस्तर पर लेटने को कहा।
अब बारी **खुदाई** की थी। अनीश ने साधना को बिस्तर के किनारे पर किया और उनके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। उनकी **खाई** अब पूरी तरह उसके सामने थी, जो उत्तेजना के रस से लबालब भरी हुई थी। अनीश ने पहले अपनी **उंगली से खोदना** शुरू किया ताकि वह जगह और भी नरम हो जाए। साधना की कमर हवा में झूल रही थी और वह बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींच रही थीं। फिर अनीश ने अपने **खीरे** की नोक को उस **खाई** के मुहाने पर रखा और धीरे से धक्का दिया। साधना के मुंह से एक चीख निकल गई, “ओह्ह अनीश… बहुत बड़ा है… धीरे…” अनीश ने उन्हें चूमकर शांत किया और फिर एक गहरा धक्का दिया। उसका पूरा **खीरा** उस रसीली **खाई** के भीतर समा गया। साधना की आँखों से आंसू निकल आए, लेकिन वह दर्द के नहीं, बल्कि एक चरम सुख के थे जो उन्हें सालों बाद मिला था।
अनीश ने अब **सामने से खोदना** शुरू किया। हर धक्के के साथ साधना के **तरबूज** ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके **मटर** अनीश के सीने से रगड़ खा रहे थे। कमरे में थप-थप की आवाज गूंजने लगी। अनीश ने अपनी गति बढ़ाई और गहरी **खुदाई** करने लगा। साधना बेहाल होकर चिल्ला रही थीं, “हाँ अनीश… और अंदर तक खोदो… मुझे पूरा खत्म कर दो… आज छोड़ना मत।” अनीश का जोश सातवें आसमान पर था। उसने साधना को घुमाया और उन्हें घुटनों के बल खड़ा कर दिया। अब वह **पिछवाड़े से खोदना** चाहता था। साधना का भारी **पिछवाड़ा** अब अनीश के सामने था। उसने पीछे से अपने **खीरे** को फिर से उस **खाई** में उतारा और पागलों की तरह **खोदना** शुरू किया। साधना की कमर हर धक्के पर झुक जाती और वह बिस्तर पर अपना सिर पटकने लगतीं।
पसीना दोनों के शरीरों से बहकर एक हो रहा था। अनीश की रफ्तार अब बेकाबू हो चुकी थी। वह साधना के **तरबूजों** को पीछे से पकड़कर उन्हें जोर-जोर से मसल रहा था और नीचे अपनी **खुदाई** जारी रखे हुए था। साधना का पूरा शरीर कांपने लगा था, उन्हें महसूस हो रहा था कि उनका **रस छूटने** वाला है। उन्होंने पीछे मुड़कर अनीश को देखा और बोलीं, “अनीश, मैं निकलने वाली हूँ… और तेज…” अनीश ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी और कुछ ही पलों बाद साधना का **रस निकलना** शुरू हो गया। उनकी **खाई** ने अनीश के **खीरे** को कसकर जकड़ लिया। उसी पल अनीश ने भी अपना सारा गर्म **रस** उनकी **खाई** की गहराइयों में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे पर गिर पड़े और काफी देर तक वैसे ही पड़े रहे।
उस **खुदाई** के बाद कमरे में एक अजीब सी शांति थी। साधना की सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। उन्होंने अनीश को अपनी बाहों में भर लिया और उसके माथे को चूमा। उनकी आंखों में अब कोई शर्म नहीं थी, बल्कि एक संतोष था। अनीश ने महसूस किया कि यह केवल शारीरिक भूख नहीं थी, बल्कि दो अकेलेपन का मिलन था। साधना के बदन की महक और उस **खुदाई** की यादें अब अनीश के दिल में हमेशा के लिए बस गई थीं। वह दोपहर ढल चुकी थी, लेकिन उनके बीच जो आग जली थी, वह अभी शांत होने वाली नहीं थी। साधना ने मुस्कुराते हुए अनीश से कहा, “कल फिर से **खुदाई** करनी पड़ेगी, अभी मेरा मन नहीं भरा।” अनीश ने बस उन्हें कसकर गले लगा लिया।
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