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ऑफिस वाली गहरी चु@@ई

रात के दो बज रहे थे और गगनचुंबी इमारत के पच्चीसवें माले पर स्थित इस कॉर्पोरेट दफ्तर में चारों ओर गहरा सन्नाटा पसरा हुआ था। मीरा अपनी मेज पर झुकी हुई फाइलों में उलझी हुई थी, लेकिन उसका ध्यान बार-बार अपने केबिन के बाहर खड़े समीर की ओर जा रहा था। समीर, जो उसका सीनियर प्रोजेक्ट मैनेजर था, आज सफेद शर्ट के बटन थोड़े खुले रखकर अपनी ब्लैक कॉफी का आनंद ले रहा था। ऑफिस की नीली मंद रोशनी में मीरा की रेशमी साड़ी के नीचे दबे हुए भारी और रसीले तरबूज किसी का भी मन विचलित करने के लिए काफी थे। मीरा को साफ महसूस हो रहा था कि समीर की भूरी निगाहें उसके ब्लाउज के भीतर छिपे उन मटर जैसे दानों पर टिकी हुई हैं जो ठंड और उत्तेजना के कारण अब साड़ी के पतले कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे।

मीरा की देह यकीनन किसी तराशी हुई मूरत जैसी थी, जिसकी कमर की ढलान किसी गहरी घाटी की तरह थी और उसके कूल्हों का घेराव इतना विशाल था कि समीर का मन कई बार उन्हें हाथों में भरने के लिए मचल उठता था। उसकी साड़ी का पल्लू बार-बार खिसक रहा था, जिससे उसके गोरे पेट की चिकनाई और नाभि की गहराई साफ नजर आ रही थी। समीर ने अपनी कॉफी की चुस्की ली और मेज के पास आकर खड़ा हो गया, जहाँ से मीरा के तरबूज का ऊपरी हिस्सा और उनके बीच की वह गहरी लकीर साफ दिख रही थी। समीर के शरीर में भी हलचल तेज हो गई थी और उसके पतलून के भीतर उसका विशाल खीरा अब करवटें बदलने लगा था, जो अपनी कैद से आजाद होकर मीरा की नमी को चखने के लिए व्याकुल था।

हवा में एक अजीब सी भारीपन और कामुकता घुली हुई थी, जहाँ दोनों की सांसों की आवाजें एक लय बनाने लगी थीं। मीरा ने एक बार ऊपर देखा और समीर की आंखों में छिपी उस आग को पढ़ लिया जो आज उसे भस्म करने के लिए तैयार थी। उनके बीच का भावनात्मक जुड़ाव पिछले कुछ महीनों से गहराता जा रहा था, जहाँ काम की बातों से ज्यादा अब खामोश इशारे होने लगे थे। समीर ने धीरे से अपना हाथ मीरा के कंधे पर रखा, जिससे एक बिजली का करंट मीरा के पूरे बदन में दौड़ गया। उसकी हथेलियों की गर्माहट मीरा के रेशमी ब्लाउज को चीरती हुई उसकी त्वचा में समाने लगी, और मीरा की आंखों में शर्म और बेताबी का एक मिला-जुला भाव तैरने लगा।

समीर ने बिना कुछ कहे मीरा की कुर्सी को अपनी ओर घुमाया और उसके चेहरे को अपने दोनों हाथों के बीच भर लिया। मीरा की धड़कनें इतनी तेज थीं कि उसका सीना ऊपर-नीचे हो रहा था, जिससे उसके भारी तरबूज समीर की छाती से बार-बार टकरा रहे थे। समीर ने धीरे से झुककर मीरा के होंठों के पास अपनी सांसें छोड़ीं और फिर उसके माथे को सहलाते हुए उसके कानों में फुसफुसाया। मीरा ने अपनी आंखें बंद कर लीं और समीर की शर्ट को कसकर पकड़ लिया। उसकी उंगलियां समीर के पीठ की मजबूत मांसपेशियों को महसूस कर रही थीं, जबकि समीर के हाथ अब नीचे की ओर सरकते हुए मीरा की पीठ की चिकनाई को महसूस करने लगे थे, जहाँ साड़ी का अंत होता था।

झिझक अब धीरे-धीरे मिट रही थी और उसकी जगह एक आदिम इच्छा ले रही थी। समीर ने धीरे से मीरा के पल्लू को कंधे से नीचे गिरा दिया, जिससे उसके गोरे और दूधिया तरबूज अब पूरी तरह से ब्लाउज की कैद में आजाद होने के लिए फड़फड़ाने लगे। समीर ने अपनी उंगलियों से उन मटर जैसे सख्त दानों को ब्लाउज के ऊपर से ही सहलाया, जिससे मीरा के मुंह से एक दबी हुई कराह निकल गई। वह अपनी जगह से उठी और समीर के गले लग गई, अपने शरीर के हर हिस्से को उसके शरीर से सटा दिया। समीर को महसूस हुआ कि मीरा की उस गहरी खाई के आसपास अब नमी बढ़ने लगी है और वह अपनी खुदाई की शुरुआत के लिए पुकार रही है।

समीर ने मीरा को उठाकर ऑफिस की विशाल मेज पर बैठा दिया, जहाँ ढेरों फाइलें और लैपटॉप बिखरे पड़े थे। उसने मीरा की साड़ी को धीरे-धीरे खोलना शुरू किया, जैसे कोई कीमती तोहफा खोल रहा हो। जैसे ही साड़ी और पेटीकोट का बंधन ढीला हुआ, मीरा के जांघों के बीच मौजूद वह रेशमी बाल वाली खाई समीर की आंखों के सामने आ गई। वह खाई अब पूरी तरह से भीग चुकी थी और उससे एक नशीली खुशबू आ रही थी। समीर ने अपने पतलून की जिप खोली और अपना खड़ा हुआ, सख्त और लाल खीरा बाहर निकाला, जिसे देख मीरा की आंखें फटी की फटी रह गईं। वह खीरा अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ मीरा की खाई में समाने के लिए थरथरा रहा था।

समीर पहले मीरा के पैरों के बीच झुक गया और अपनी जुबान से उस गहरी खाई को चखने लगा। मीरा ने अपना सिर पीछे की ओर झुका लिया और मेज के किनारों को कसकर पकड़ लिया। समीर की जुबान जब उस खाई के छोटे से दाने से टकराई, तो मीरा का पूरा बदन कांप उठा। वह बार-बार ‘समीर… ओ समीर…’ पुकार रही थी। समीर ने अब अपनी उंगली से उस खाई की गहराई को मापना शुरू किया, और मीरा के रस से उसकी उंगलियां पूरी तरह तरबतर हो गईं। वह गहराई इतनी गरम और मखमली थी कि समीर अब और इंतजार नहीं कर पा रहा था। उसने अपने खीरे को हाथ में लिया और उसे मीरा की खाई के मुहाने पर टिका दिया।

खुदाई की शुरुआत बहुत ही धीमी और दर्दनाक अहसास के साथ हुई। जैसे ही समीर ने अपने भारी खीरे का सिरा मीरा की तंग खाई में धकेला, मीरा ने समीर के कंधों को अपने नाखूनों से खुरच दिया। वह खाई इतनी तंग थी कि ऐसा लग रहा था जैसे वह उस खीरे को निगलने से मना कर रही हो, लेकिन समीर ने अपनी कमर के एक झटके से आधे खीरे को भीतर उतार दिया। मीरा की आंखों से आंसू की एक बूंद निकली, लेकिन वह दर्द अब धीरे-धीरे एक असीम सुख में बदलने लगा था। समीर ने अपनी गति बढ़ाई और अब वह पूरी ताकत के साथ उस खाई के भीतर अपनी खुदाई करने लगा, जिससे मेज पर रखे लैपटॉप और फाइलें नीचे गिरने लगीं।

कमरे में अब केवल उनके शरीरों के टकराने की ‘चप-चप’ वाली आवाज गूंज रही थी। समीर ने मीरा को घुमाकर मेज पर ही उल्टा खड़ा कर दिया, जिससे उसका भारी पिछवाड़ा अब समीर की ओर था। यह पिछवाड़े से खोदने का सबसे बेहतरीन मौका था। समीर ने मीरा के कूल्हों को अपने दोनों हाथों से कसकर पकड़ा और पीछे से अपने खीरे को पूरी ताकत के साथ भीतर धकेलना शुरू किया। हर धक्के के साथ मीरा के तरबूज मेज से टकराकर और भी लाल हो रहे थे। मीरा की कराहें अब चीखों में बदल चुकी थीं, क्योंकि समीर का खीरा उसकी खाई की आखिरी दीवारों को छू रहा था। खुदाई इतनी दमदार थी कि मीरा का शरीर पसीने से नहा चुका था और उसकी साड़ी फर्श पर बेतरतीब पड़ी थी।

समीर ने मीरा को फिर से सीधा किया और उसे अपनी गोद में उठा लिया। अब वे सामने से खुदाई कर रहे थे, जहाँ मीरा की टांगें समीर की कमर के चारों ओर लिपटी हुई थीं। समीर ने अपने खीरे को पूरी गहराई तक पहुँचाया और फिर अपनी गति को चरम पर ले गया। दोनों के शरीरों के बीच घर्षण इतना बढ़ गया था कि कमरे का तापमान कई डिग्री बढ़ गया था। मीरा का चेहरा पूरी तरह लाल हो चुका था और उसकी सांसें उखड़ने लगी थीं। उसे महसूस हुआ कि अब उसका रस छूटने वाला है। ठीक उसी पल, समीर ने भी एक आखिरी जोरदार झटका दिया और अपने खीरे के सारे रस को मीरा की गहरी खाई के भीतर उड़ेल दिया।

जैसे ही रस छूटा, दोनों एक-दूसरे में सिमट गए। मीरा का शरीर अभी भी कंपन कर रहा था और समीर की सांसें उसके गले पर गरम हवा की तरह लग रही थीं। वे काफी देर तक उसी अवस्था में मेज पर लेटे रहे, जहाँ चारों ओर केवल शांति थी। मीरा को अपनी देह के भीतर उस गरम रस के बहने का अहसास हो रहा था, जो उसे एक अनूठी तृप्ति दे रहा था। समीर ने धीरे से उसके माथे को चूमा और उसे अपनी बाहों में और भी कस लिया। उस रात ऑफिस की उस मेज ने एक ऐसी खुदाई देखी थी जिसने दो रूहों को हमेशा के लिए एक कर दिया था। मीरा ने धीरे से अपनी साड़ी समेटी, लेकिन उसकी चाल में अभी भी उस भारी खुदाई की लचक और थकान साफ झलक रही थी, जो उसे बार-बार उस रात की याद दिला रही थी।

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