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ऑफिस वाली हॉट चु@@ई


ऑफिस वाली हॉट चु@@ई—>

रात के साढ़े ग्यारह बज चुके थे और शहर की गगनचुंबी इमारतों की लाइटें अब भी टिमटिमा रही थीं। दफ्तर के पच्चीसवें माले पर सन्नाटा पसरा हुआ था, बस एयर कंडीशनर की हल्की सी गूंज और कीबोर्ड पर उंगलियों की थपथपाहट सुनाई दे रही थी। माया, जो कंपनी की सीनियर प्रोजेक्ट डायरेक्टर थी, अपनी केबिन की कांच वाली दीवार के पास खड़ी होकर बाहर की दुनिया देख रही थी। उसकी उम्र करीब पैंतीस साल थी, लेकिन उसका व्यक्तित्व और शरीर किसी बीस साल की मॉडल को भी मात दे सकता था। उसने आज गहरे नीले रंग की सिल्क की साड़ी पहनी थी, जिसके साथ एक बिना आस्तीन का ब्लाउज उसकी पीठ की गोलाई को बखूबी उभार रहा था। उसके शरीर की बनावट ऐसी थी कि कोई भी उसे देखकर अपनी सुध-बुध खो दे, खासकर उसकी छाती पर उभरे वो भारी और रसीले तरबूज जो साड़ी के महीन कपड़े को फाड़कर बाहर आने को बेताब लग रहे थे।

वहीं पास की मेज पर बैठा रोहन, जो कि उसका जूनियर असिस्टेंट था, अपनी फाइलों में डूबा हुआ था लेकिन उसका ध्यान बार-बार माया की खूबसूरती पर जाकर अटक रहा था। रोहन की उम्र छब्बीस साल थी और वह पिछले छह महीनों से माया के साथ काम कर रहा था। माया की चाल-ढाल, उसकी आवाज की खनक और उसका इत्र, जो पूरे केबिन में चंदन की खुशबू की तरह फैला हुआ था, रोहन के मन में हलचल पैदा करता रहता था। माया जब भी उसके करीब आती, उसकी सांसें तेज हो जाती थीं। आज जब पूरा ऑफिस खाली था, तो रोहन के मन में एक अजीब सी बेचैनी और आकर्षण जन्म ले रहा था। उसने देखा कि माया ने अपनी गर्दन को धीरे से घुमाया और उसके गले की नसें साफ़ नजर आ रही थीं, जो उसकी उत्तेजना को और बढ़ा रही थीं।

माया ने धीरे से पीछे मुड़कर रोहन की ओर देखा और अपनी मदहोश कर देने वाली आंखों से उसे निहारा। ‘रोहन, क्या काम पूरा हो गया? बहुत देर हो गई है,’ उसने एक गहरी सांस लेते हुए कहा, जिससे उसके सीने पर टिके वो बड़े तरबूज ऊपर-नीचे हुए। उन तरबूजों के बीच की गहरी खाई साफ़ झलक रही थी, जिसमें रोहन खुद को खोया हुआ महसूस कर रहा था। रोहन की नजरें उन पर जमी हुई थीं, और वह बस इतना ही कह पाया, ‘जी मैम, बस आखिरी फाइल बची है।’ माया धीरे-धीरे चलते हुए उसके पास आई और उसकी मेज पर झुक गई। उसके झुकते ही साड़ी का पल्लू थोड़ा सा खिसक गया और उसके तरबूजों का ऊपरी हिस्सा पूरी तरह उजागर हो गया, जिन पर लगे छोटे-छोटे मटर की आकृति भी ब्लाउज के ऊपर से महसूस की जा सकती थी।

रोहन के दिल की धड़कनें अब काबू से बाहर हो रही थीं। माया ने अपना हाथ रोहन के कंधे पर रखा और धीरे से सहलाया। उसका स्पर्श इतना कोमल और गर्म था कि रोहन के शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ गई। ‘तुम्हें नहीं लगता कि हम दोनों को अब थोड़ा आराम करना चाहिए?’ माया की आवाज अब और भी धीमी और कामुक हो गई थी। उसने अपनी उंगलियों को रोहन के गर्दन के बालों के साथ खेलना शुरू कर दिया। रोहन ने अपनी कुर्सी घुमाई और अब वह सीधे माया के सामने था। उसकी नजरें माया के चेहरे पर थीं, जहाँ हल्की सी मुस्कान और आँखों में प्यास साफ़ दिखाई दे रही थी। उन दोनों के बीच की झिझक अब पिघलने लगी थी और एक गहरे जज्बात का जन्म हो रहा था।

माया ने आगे बढ़कर रोहन के गालों को अपने हाथों में ले लिया और उसके होठों के पास अपनी सांसें छोड़ने लगी। रोहन ने अपनी हिम्मत जुटाई और अपना हाथ माया की पतली कमर पर रख दिया। साड़ी के नीचे उसकी त्वचा मखमली और गर्म महसूस हो रही थी। माया ने अपनी आँखें मूंद लीं और रोहन ने धीरे से उसके होठों का अमृत पान करना शुरू कर दिया। यह स्पर्श इतना गहरा और भावुक था कि दोनों के शरीर एक-दूसरे में सिमटने लगे। रोहन के हाथों ने अब माया के भारी तरबूजों को अपनी गिरफ्त में ले लिया था। वह उन्हें धीरे-धीरे दबाने लगा, जिससे माया के मुँह से एक धीमी कराह निकली। उन तरबूजों की कोमलता और उन पर उभरे कठोर मटर अब रोहन की उंगलियों के नीचे अपनी कहानी कह रहे थे।

माया ने रोहन की शर्ट के बटन एक-एक करके खोलने शुरू कर दिए और अपनी हथेलियों को उसके सीने पर फिराने लगी। रोहन ने अब माया की साड़ी के पल्लू को पूरी तरह से हटा दिया था। जैसे ही साड़ी नीचे गिरी, माया का शानदार बदन रोहन के सामने था। उसके शरीर के हर उतार-चढ़ाव को देखकर रोहन का खीरा अब पूरी तरह से अकड़ चुका था और उसकी पेंट के अंदर विद्रोह कर रहा था। माया ने रोहन की पेंट की चेन धीरे से नीचे की और उसके अंदर से उस विशाल और तने हुए खीरे को बाहर निकाला। उसे देखते ही माया की आँखों में एक चमक आ गई। उसने अपनी उंगलियों से उस खीरे के ऊपरी हिस्से को सहलाया और फिर उसे धीरे से अपने मुँह में ले लिया। रोहन ने अपनी गर्दन पीछे की ओर झुका ली और उस सुखद अहसास में डूब गया।

माया का खीरा चूसना इतना प्रभावी था कि रोहन को लगा उसका रस अभी निकल जाएगा। उसने माया को धीरे से ऊपर उठाया और उसे ऑफिस की उसी बड़ी महोगनी मेज पर लिटा दिया। अब माया की रेशमी खाई पूरी तरह से उसके सामने थी, जो घने काले बालों से घिरी हुई थी और गीली होकर चमक रही थी। रोहन ने अपनी उंगली से उस खाई की गहराई को नापना शुरू किया। जैसे ही उसकी उंगली ने उस रसीली खाई के अंदर प्रवेश किया, माया ने अपनी पीठ धनुष की तरह मोड़ ली और जोर-जोर से सांसें लेने लगी। रोहन ने अब अपनी जुबान का इस्तेमाल किया और उस खाई के अमृत को चखने लगा। माया के शरीर में कंपन होने लगा और वह रोहन के बालों को पकड़कर उसे अपनी ओर और जोर से खींचने लगी।

अब खुदाई का समय आ चुका था। रोहन ने अपने भारी और तने हुए खीरे को माया की गीली खाई के मुहाने पर टिकाया। माया ने अपने दोनों पैरों को रोहन की कमर के चारों ओर लपेट लिया और उसे अंदर आने का इशारा किया। रोहन ने एक गहरा झटका दिया और उसका पूरा खीरा माया की तंग खाई के अंदर समा गया। दोनों के मुँह से एक साथ ‘आह’ निकली। वह अहसास इतना गहरा और संतोषजनक था कि दोनों कुछ पलों के लिए स्थिर हो गए। फिर रोहन ने धीरे-धीरे खुदाई शुरू की। हर आने-जाने वाले झटके के साथ माया के तरबूज हवा में उछल रहे थे और उनके मटर आपस में टकरा रहे थे। कमरे में केवल उनके शरीर के टकराने की आवाज और भारी सांसें गूँज रही थीं।

रोहन ने अब माया को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने की मुद्रा में ला दिया। माया के गोल और भारी पिछवाड़े को देख रोहन का उत्साह और बढ़ गया। उसने पीछे से अपने खीरे को फिर से उस खाई में उतारा और तेज रफ्तार से खुदाई जारी रखी। माया अपनी कोहनियों के बल टिकी हुई थी और हर धक्के के साथ उसका पूरा शरीर थरथरा रहा था। ‘और तेज रोहन, मुझे और गहराई तक खोदो!’ माया ने चिल्लाते हुए कहा। खुदाई की प्रक्रिया अब अपने चरम पर थी। रोहन की मांसपेशियों में खिंचाव था और पसीना उनके शरीरों पर चमक रहा था। वे दोनों दुनिया से बेखबर, बस एक-दूसरे के शरीर की गहराई में खोए हुए थे। हर धक्का उन्हें उस आनंद की ओर ले जा रहा था जहाँ शब्द खत्म हो जाते हैं।

अंत में, जब दोनों की उत्तेजना अपनी आखिरी सीमा पर पहुँच गई, रोहन ने अपनी गति और बढ़ा दी। माया ने जोर से कराहते हुए अपने शरीर को ढीला छोड़ दिया और उसकी खाई से रसों की नदियाँ बहने लगीं। ठीक उसी पल, रोहन के खीरे ने भी अपना सारा रस माया की गहराई में छोड़ दिया। वे दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए उसी मेज पर गिर पड़े। कमरे में फिर से सन्नाटा छा गया था, लेकिन इस बार वह सन्नाटा सुकून भरा था। माया की बिखरी हुई जुल्फें और रोहन की तेज चलती सांसें उस दिव्य मिलन की गवाह थीं। कुछ देर तक वे वैसे ही पड़े रहे, एक-दूसरे की गर्माहट को महसूस करते हुए। उनके बीच का रिश्ता अब केवल पेशेवर नहीं रह गया था, बल्कि वह रूहानी और जिस्मानी जुड़ाव बन चुका था जिसे वे कभी नहीं भूल सकते थे।

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