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कविता की बेमिसाल चुदाई


कविता की बेमिसाल चुदाई—>समीर और कविता बचपन के बहुत गहरे दोस्त थे, लेकिन पढ़ाई और करियर की भागदौड़ में दोनों के बीच फासले बढ़ गए थे। लगभग छह साल बाद जब समीर अपनी पुरानी सहेली कविता से मिलने उसके नए फ्लैट पर पहुँचा, तो उसे अपनी आँखों पर यकीन नहीं हुआ। वह चुलबुली सी लड़की अब एक बेहद आकर्षक और कामुक महिला में तब्दील हो चुकी थी। कविता ने जब दरवाजा खोला, तो समीर उसे एकटक देखता ही रह गया; उसने एक तंग नीले रंग की कुर्ती पहनी थी, जिससे उसके शरीर का हर उतार-चढ़ाव साफ झलक रहा था।

कविता के शरीर की बनावट अब पहले से कहीं ज्यादा निखर चुकी थी। उसकी कुर्ती के भीतर से उसके पुष्ट और बड़े तरबूज अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे, मानो वो उस कपड़े की कैद से बाहर आने को बेताब हों। समीर की नजरें बार-बार उसके तरबूजों के बीच बनी उस गहरी घाटी पर टिक जाती थीं। कविता ने उसे अंदर बुलाया और सोफे पर बैठने को कहा, लेकिन समीर के मन में तो उसकी सुडौल कमर और चौड़े पिछवाड़े को देखकर हलचल मचने लगी थी। कविता की चाल में एक गजब की लचक थी जो समीर के भीतर दबी हुई सोई हुई इच्छाओं को जगा रही थी।

बातों-बातों में पुरानी यादें ताजा होने लगीं और समीर ने महसूस किया कि कविता की बातों में अब एक अलग तरह की गहराई और मादकता थी। समीर ने उसके पास बैठकर बचपन की फोटो एल्बम देखनी शुरू की, जिससे उनके शरीर एक-दूसरे से छूने लगे। जब भी कविता पन्ना पलटती, उसके तरबूज समीर की बांह से रगड़ खाते, जिससे समीर के पेंट के भीतर उसका खीरा धीरे-धीरे आकार लेने लगा था। कविता ने भी शायद इस छुअन को महसूस किया था, क्योंकि उसकी सांसें अब कुछ तेज चलने लगी थीं और उसकी आंखों में एक अजीब सी चमक आ गई थी।

समीर ने हिम्मत जुटाकर अपना हाथ कविता की पतली कमर पर रखा, तो वह कांप उठी लेकिन उसने हाथ हटाया नहीं। समीर ने धीरे से उसकी रेशमी जुल्फों को पीछे किया और उसके कान के पास फुसफुसाते हुए उसकी खूबसूरती की तारीफ की। कविता ने शर्माते हुए अपनी नजरें झुका लीं, लेकिन उसका पूरा शरीर अब थरथरा रहा था। समीर ने देखा कि उत्तेजना के कारण कविता की कुर्ती के ऊपर से ही उसके मटर साफ उभर आए थे। अब झिझक का पर्दा धीरे-धीरे हट रहा था और दोनों के बीच का आकर्षण अपने चरम पर पहुँचने लगा था।

समीर का हाथ कमर से सरकते हुए कविता के भारी तरबूजों तक जा पहुँचा। जैसे ही समीर ने एक तरबूज को अपनी हथेली में भरकर धीरे से दबाया, कविता के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली आह निकल गई। उसने समीर के कंधे पर अपना सिर रख दिया और अपनी आँखें मूँद लीं। समीर अब और नहीं रुक सकता था, उसने कविता के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके लबों पर एक गहरा चुंबन अंकित कर दिया। दोनों की जुबानें एक-दूसरे में उलझ गईं और कमरे का तापमान अचानक से बढ़ गया, मानो दोनों के शरीर से निकलने वाली गर्मी ने हवा को भी सुलगने पर मजबूर कर दिया हो।

समीर ने धीरे-धीरे कविता की कुर्ती के बटन खोलने शुरू किए। जैसे ही कपड़ा हटा, कविता के दूधिया सफेद तरबूज पूरी तरह से आजाद हो गए, जिनके ऊपर लगे गुलाबी मटर ठंड और उत्तेजना से पूरी तरह सख्त हो चुके थे। समीर ने अपनी जुबान से उन मटरों के साथ खेलना शुरू किया, जिससे कविता की कराहें और गहरी हो गईं। वह समीर के बालों को अपनी उंगलियों से सहलाने लगी और खुद को पूरी तरह उसके हवाले कर दिया। समीर अब उसके निचले अंगों की ओर बढ़ा और उसकी लेगिंग को नीचे सरका दिया, जहाँ घने बालों के बीच उसकी रहस्यमयी खाई नजर आ रही थी।

समीर ने अपनी उंगलियों से उस खाई को टटोलना शुरू किया, जो पहले से ही कामवासना के रस से पूरी तरह भीग चुकी थी। जब समीर ने अपनी उंगली खाई के भीतर डाली, तो कविता ने अपनी पीठ धनुष की तरह मोड़ ली और जोर-जोर से सांसें लेने लगी। समीर ने फिर अपनी जुबान नीचे ले जाकर उस खाई को चाटना शुरू किया, जिससे कविता का पूरा शरीर झटके लेने लगा। उसे ऐसा अहसास हो रहा था मानो उसके शरीर के हर पोर से बिजली की लहरें दौड़ रही हों। वह बार-बार समीर का नाम लेकर उसे पुकार रही थी और अपने खीरे की मांग कर रही थी।

समीर ने अब अपने कपड़े उतारे और अपने फनफनाते हुए लंबे और सख्त खीरे को कविता की नज़रों के सामने लाया। कविता उसे देखकर दंग रह गई और उसने धीरे से अपने हाथों में लेकर उसे सहलाया। समीर ने उसे अपने मुँह में लेने को कहा और कविता ने बिना देर किए उस खीरे को चूसना शुरू कर दिया। खीरे के मुँह में जाते ही समीर को स्वर्ग जैसा आनंद मिलने लगा। कुछ देर बाद, समीर ने कविता को सोफे पर ही सामने से खोदने की मुद्रा में लिटाया और अपने खीरे के सिर को उसकी गीली और तंग खाई के मुहाने पर टिका दिया।

समीर ने एक जोरदार धक्का दिया और उसका आधा खीरा कविता की तंग खाई के भीतर समा गया। कविता के मुँह से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि उस चरम सुख की थी जिसका वह बरसों से इंतजार कर रही थी। समीर ने धीरे-धीरे अपनी गति बढ़ाई और पूरी ताकत से खुदाई शुरू कर दी। हर धक्के के साथ कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके टकराने की आवाज़ पूरे कमरे में गूँज रही थी। समीर ने उसके पैरों को अपने कंधों पर रख लिया ताकि वह और गहराई तक खुदाई कर सके, और हर प्रहार के साथ कविता ‘ओह समीर, और तेज’ चिल्ला रही थी।

खुदाई का यह सिलसिला काफी देर तक चलता रहा। समीर ने फिर कविता को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने वाली पोजीशन में कर दिया। पीछे से कविता का पिछवाड़ा बहुत ही कामुक लग रहा था। समीर ने पीछे से वार करना शुरू किया तो कविता की उत्तेजना सातवें आसमान पर पहुँच गई। वह अपने हाथों से सोफे को कसकर पकड़े हुए थी और हर धक्के का आनंद ले रही थी। समीर ने अब अपनी रफ्तार पूरी कर दी थी, उसे महसूस हो रहा था कि अब उसका रस छूटने ही वाला है। ठीक उसी समय कविता का भी रस निकलने लगा और वह बुरी तरह कांपने लगी।

समीर ने अपना अंतिम और सबसे शक्तिशाली धक्का मारा और अपना सारा गरम रस कविता की खाई की गहराई में उड़ेल दिया। दोनों पसीने से तरबतर एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े। कविता की सांसें अभी भी उखड़ी हुई थीं और उसका शरीर हल्के झटके ले रहा था। समीर ने उसे अपनी बांहों में भर लिया और उसके माथे को चूमा। उस रात दोनों ने न केवल शारीरिक बल्कि मानसिक रूप से भी एक-दूसरे को पूरी तरह पा लिया था। कमरे में छाई शांति अब उनके प्यार की गवाह थी, और उनकी थकी हुई मुस्कान यह बता रही थी कि यह सिर्फ एक शुरुआत थी।

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