नेहा और समीर की चुड़ाई—>
बरसात की वह रात बहुत ही हसीन थी और बाहर बादलों की गड़गड़ाहट के बीच नेहा के फ्लैट की खिड़की से ठंडी हवा के झोंके अंदर आ रहे थे। समीर और नेहा बचपन के दोस्त थे, जो कई सालों के बाद एक-दूसरे से मिले थे। नेहा ने एक बहुत ही कसी हुई पारदर्शी नाइटी पहनी हुई थी, जिसके अंदर से उसके उभरे हुए तरबूज साफ झलक रहे थे। समीर की नजरें बार-बार नेहा के उन रसीले तरबूजों पर टिक जाती थीं, जिन्हें देखकर उसका मन मचलने लगा था। उन तरबूजों के बीच की गहरी घाटी और उनके ऊपर उभरे हुए छोटे-छोटे मटर समीर के शरीर में एक अजीब सी सिहरन पैदा कर रहे थे।
समीर ने सोफे पर नेहा के करीब खिसकते हुए उसके हाथ को थाम लिया, तो नेहा ने भी कोई विरोध नहीं किया बल्कि उसकी आँखों में देखते हुए एक गहरी आह भरी। नेहा के शरीर से उठती हुई भीनी-भीनी खुशबू समीर के होश उड़ा रही थी और वह उसके जिस्म की गरमाहट को महसूस कर पा रहा था। दोनों के बीच की बातचीत अब शब्दों से ज्यादा खामोशी और गहरी सांसों में सिमट गई थी। समीर ने धीरे से नेहा के कंधे पर हाथ रखा और उसके रेशमी बालों को सहलाने लगा, जिससे नेहा की आँखें अपने आप बंद होने लगीं और उसका पूरा शरीर कांपने लगा।
नेहा ने धीरे से समीर के चेहरे को अपने दोनों हाथों में लिया और उसके करीब आकर उसके होठों को अपने रसीले होठों से भिगो दिया। इस स्पर्श ने जैसे दोनों के बीच सालों से दबी हुई इच्छाओं का बांध तोड़ दिया हो। समीर के हाथ अब नेहा की कमर से होते हुए नीचे की ओर जाने लगे और उसने महसूस किया कि नेहा का पिछवाड़ा कितना गदबदा और कोमल है। नेहा ने समीर के गले में अपनी बाहें डाल दीं और उसके कान के पास फुसफुसाते हुए कहा कि आज वह खुद को पूरी तरह उसे सौंपना चाहती है, जिससे समीर का खीरा पैंट के अंदर ही पूरी तरह से तन गया।
समीर ने नेहा की नाइटी को धीरे-धीरे ऊपर उठाना शुरू किया और उसकी नजरें नेहा के उन गोरे और सुडौल तरबूजों पर जाकर रुक गईं। उन तरबूजों पर उभरे हुए मटर अब ठंड और उत्तेजना के कारण और भी सख्त हो गए थे। समीर ने अपना चेहरा नेहा के सीने में छिपा लिया और उन मटरों को बारी-बारी से अपने मुंह में लेकर चूसने लगा। नेहा की सिसकारियां कमरे की खामोशी को चीरने लगीं और वह अपने हाथों से समीर के बालों को जोर-जोर से सहलाने लगी, जैसे उसे और भी करीब बुला रही हो।
समीर की जीभ अब नेहा के पेट के निचले हिस्से की ओर बढ़ रही थी, जहाँ रेशमी काले बाल उसकी गहरी खाई की रक्षा कर रहे थे। जैसे ही समीर ने नेहा की खाई के करीब अपनी नाक ले जाकर उसकी मदहोश कर देने वाली गंध को सूंघा, नेहा ने एक लंबी कराह भरी और अपने कूल्हों को हवा में उठा लिया। समीर ने धीरे से अपनी उंगली से खोदना शुरू किया, जिससे नेहा की खाई से निकलने वाले रसीले पदार्थ ने समीर की उंगलियों को पूरी तरह से भिगो दिया। नेहा अब बेकाबू हो रही थी और वह बार-बार समीर के खीरे को छूने की कोशिश कर रही थी।
समीर ने अपनी पैंट उतारी और उसका फन फैलाए हुए विशाल खीरा बाहर निकल आया, जिसे देखकर नेहा की आँखें फटी की फटी रह गईं। नेहा ने धीरे से उस खीरे को अपने हाथ में पकड़ा और उसकी गरमाहट को महसूस करते हुए उसे चूमना शुरू कर दिया। कुछ ही देर में नेहा ने समीर का खीरा मुंह में लेना शुरू किया और उसे इतनी गहराई से चूसने लगी कि समीर के शरीर का रोम-रोम कांप उठा। नेहा की जीभ जब उस खीरे के ऊपरी हिस्से से टकराती, तो समीर को ऐसा लगता जैसे उसे स्वर्ग मिल गया हो।
अब समीर ने नेहा को बिस्तर पर सीधा लिटाया और उसके पैरों को अपने कंधों पर रखकर सामने से खोदना शुरू करने की तैयारी की। जैसे ही समीर के खीरे का सिरा नेहा की तंग खाई के द्वार पर पहुँचा, नेहा ने समीर के कंधों को जोर से पकड़ लिया। समीर ने एक जोरदार धक्का दिया और उसका आधा खीरा नेहा की तंग खाई के अंदर समा गया। नेहा के मुंह से एक दबी हुई चीख निकली, लेकिन अगले ही पल वह दर्द आनंद में बदल गया और वह समीर की कमर को अपने पैरों से जकड़ कर उसे और अंदर खींचने लगी।
खुदाई की यह प्रक्रिया अब बहुत ही लयबद्ध और गहरी हो चली थी, कमरे में मांस से मांस टकराने की चप-चप की आवाजें गूँज रही थीं। समीर हर धक्के के साथ अपने खीरे को नेहा की खाई की गहराई तक पहुँचा रहा था, जहाँ नेहा का रस उसे और भी फिसलन भरा बना रहा था। नेहा के तरबूज हवा में जोर-जोर से उछल रहे थे और समीर बार-बार झुककर उन मटरों को अपने दांतों से हल्का काट रहा था। दोनों के शरीरों से पसीना बह रहा था, जो उनके जिस्मानी मिलन की गवाही दे रहा था।
समीर ने अब नेहा को पलट दिया और उसे घुटनों के बल झुकाकर पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। इस स्थिति में समीर को नेहा के पिछवाड़े का पूरा नजारा मिल रहा था और वह पीछे से अपनी पूरी ताकत लगाकर नेहा की खाई को जोत रहा था। नेहा अपने सिर को तकिए में छिपाए हुए जोर-जोर से कराह रही थी और समीर से और भी तेज खोदने की गुहार लगा रही थी। समीर के हर धक्के के साथ नेहा के कूल्हे पीछे की ओर टकराते और एक मधुर ध्वनि पैदा करते, जो समीर की उत्तेजना को चरम पर पहुँचा रही थी।
काफी देर तक चली इस जबरदस्त खुदाई के बाद समीर को महसूस हुआ कि अब उसका बांध टूटने वाला है। समीर ने नेहा को फिर से अपनी ओर खींचा और उसे सीने से लगाकर अपनी गति और भी तेज कर दी। नेहा की खाई अब बहुत ही गर्म और संकुचित महसूस हो रही थी, जैसे वह समीर के खीरे को जकड़ लेना चाहती हो। नेहा की सांसें भी अब फूलने लगी थीं और वह थरथराने लगी थी, जिसका मतलब था कि उसका भी रस छूटने वाला है।
अचानक नेहा ने एक बहुत ही तीखी कराह भरी और समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ा दिए, उसका पूरा शरीर अकड़ गया और उसकी खाई से रसीला सैलाब उमड़ पड़ा। ठीक उसी समय समीर ने भी अपना सारा नियंत्रण खो दिया और उसका खीरा नेहा की खाई के अंदर ही फटने लगा। समीर का गाढ़ा और गर्म रस नेहा की खाई की गहराइयों में समाता चला गया, जिससे दोनों को एक असीम शांति और सुख का अनुभव हुआ। दोनों काफी देर तक एक-दूसरे से लिपटे रहे, उनकी धड़कनें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं।
उस गहरी खुदाई के बाद नेहा के चेहरे पर एक अजीब सी चमक और संतुष्टि थी। वह समीर के सीने पर अपना सिर रखकर लेटी हुई थी और उसकी उंगलियां समीर के शरीर पर बने पसीने की बूंदों के साथ खेल रही थीं। समीर ने नेहा के माथे को चूमा और उसे अपने बाहुपाश में और भी कस लिया। बाहर बारिश अब भी हो रही थी, लेकिन अंदर की वह आग अब एक शीतल अहसास में बदल चुकी थी। दोनों के बीच का वह पुराना रिश्ता अब एक नई गहराई और जिस्मानी सच्चाई के साथ जुड़ चुका था।
नेहा ने धीरे से समीर की आँखों में देखते हुए कहा, ‘समीर, तुमने मुझे आज जो सुख दिया है, वह मैंने कभी महसूस नहीं किया था।’ समीर मुस्कुराया और उसने नेहा के गालों को थपथपाते हुए कहा, ‘यह तो बस शुरुआत है नेहा, हमारी दोस्ती अब इस खूबसूरत मोड़ पर आ गई है जहाँ से वापसी का कोई रास्ता नहीं है।’ दोनों ने एक-दूसरे को फिर से अपनी बाहों में भर लिया और उस सुकून भरी रात की गोद में सो गए, यह जानते हुए कि उनका कल और भी रंगीन होने वाला है।