शाम का वक्त था और बाज़ार की हलचल अब धीरे-धीरे कम होने लगी थी, लेकिन समीर की छोटी सी दर्जी की दुकान में अभी भी काम का बोझ कम नहीं हुआ था। समीर अपनी सिलाई मशीन पर झुककर बड़ी बारीकी से धागे पिरो रहा था, तभी दरवाजे पर लगी छोटी सी घंटी बजी और कविता ने भीतर कदम रखा। कविता की उम्र लगभग बत्तीस साल रही होगी, उसका रंग गेहूंआ था और उसकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी जो किसी को भी अपनी ओर खींचने के लिए काफी थी। उसने गहरे हरे रंग की रेशमी साड़ी पहनी हुई थी, जो उसके शरीर के हर उतार-चढ़ाव को बड़ी खूबसूरती से बयां कर रही थी। समीर ने जैसे ही उसे देखा, उसकी धड़कनें थोड़ी तेज हो गई क्योंकि कविता उसके मोहल्ले की सबसे आकर्षक महिला मानी जाती थी।
कविता के शरीर की बनावट किसी अप्सरा से कम नहीं थी, उसके भारी तरबूज साड़ी के ब्लाउज के भीतर से झांकने को बेताब लग रहे थे और उनकी गोलाई इतनी स्पष्ट थी कि समीर की निगाहें चाहकर भी वहाँ से नहीं हट पा रही थीं। जब वह चलती थी, तो उसके भारी पिछवाड़े की मटक समीर के मन में हलचल पैदा कर देती थी, मानो कोई लहर शांत समंदर को झकझोर रही हो। उसकी कमर का पतला घेरा और उस पर रेशमी कपड़े का खिंचाव उसे और भी कामुक बना रहा था। समीर ने अपनी नजरें चुराने की कोशिश की, लेकिन कविता के शरीर की खुशबू ने पूरे कमरे को महका दिया था, जिससे समीर का पूरा ध्यान भटकने लगा और उसके शरीर में एक अजीब सी गर्मी महसूस होने लगी।
कविता ने समीर के करीब आकर अपनी साड़ी का पल्लू थोड़ा ठीक किया और धीमी आवाज में कहा कि उसे एक नया ब्लाउज बहुत जल्दी सिलवाना है क्योंकि अगले हफ्ते एक करीबी शादी है। समीर ने जब उसकी आवाज सुनी, तो उसे लगा जैसे कानों में शहद घुल गया हो, वह थोड़ा हिचकिचाया लेकिन फिर उसने फीता उठाकर नाप लेने की तैयारी शुरू की। कविता ने अपनी साड़ी को थोड़ा और ढीला किया ताकि समीर नाप ले सके, और जैसे ही वह समीर के करीब आई, दोनों के बीच की दूरी कम होने लगी। समीर का हाथ कांप रहा था जब उसने फीता उठाकर उसके तरबूजों के ऊपर से घेरा नापने की कोशिश की, उसकी उंगलियां गलती से उसके रेशमी कपड़े को छू गईं, जिससे कविता के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई।
नाप लेने की प्रक्रिया बहुत धीमी थी क्योंकि समीर चाहकर भी जल्दी नहीं कर पा रहा था, उसका मन हर स्पर्श को महसूस करना चाहता था। जब उसने कविता के सीने का नाप लिया, तो उसके हाथों को उन भारी और नरम तरबूजों की गरमाहट महसूस हुई, जिसके ऊपर लगे छोटे-छोटे मटर जैसे उभार ब्लाउज के कपड़े के पीछे से साफ महसूस किए जा सकते थे। कविता की सांसें तेज होने लगी थीं और वह समीर के इतने करीब होने के कारण थोड़ा असहज लेकिन उत्तेजित भी महसूस कर रही थी। समीर ने देखा कि कविता की गर्दन पर पसीने की छोटी बूंदें चमक रही थीं, जो उसकी उत्तेजना का प्रमाण दे रही थीं। कमरे का तापमान अचानक बढ़ गया था और बाहर की दुनिया की आवाजें अब उन्हें सुनाई नहीं दे रही थीं।
समीर ने अब कमर का नाप लेने के लिए हाथ पीछे की ओर बढ़ाया, तो उसके हाथ कविता के मुलायम पिछवाड़े से हल्का सा टकरा गए। उस स्पर्श ने आग में घी डालने का काम किया, समीर का हाथ वहाँ थोड़ा ठहर सा गया और उसने महसूस किया कि कविता ने भी अपनी आंखें बंद कर ली थीं। कविता ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि वह और भी पीछे की ओर झुकी जिससे उसका शरीर समीर के शरीर से पूरी तरह सट गया। समीर ने अपनी पैंट के भीतर एक भारीपन महसूस किया, उसका खीरा अब जाग चुका था और अपनी जगह बनाने के लिए छटपटा रहा था। कविता को भी अपनी पीठ पर समीर की उस कठोरता का एहसास हुआ, जिसने उसके मन के भीतर दबी हुई इच्छाओं को जगा दिया।
दोनों के बीच एक गहरा मौन छा गया था, लेकिन उनकी सांसों का शोर सब कुछ बयां कर रहा था। समीर ने धीरे से अपनी उंगलियां कविता की नंगी पीठ पर फेरीं, जिससे कविता के मुँह से एक हल्की सी आह निकली। उसने मुड़कर समीर की ओर देखा, उसकी आँखों में अब शर्म नहीं बल्कि एक बेतहाशा प्यास थी। समीर ने बिना कुछ कहे उसे अपनी बाहों में भर लिया और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। यह पहला स्पर्श इतना गहरा और भावुक था कि दोनों के शरीर आपस में जुड़ गए। समीर ने धीरे-धीरे उसके ब्लाउज के हुक खोलना शुरू किए, और जैसे ही कपड़ा नीचे गिरा, उसके सामने दो विशाल और गोरे तरबूज आ गए, जिन पर गुलाबी मटर अपनी पूरी शान से खड़े थे।
समीर ने अपनी जीभ से उन मटरों को सहलाना शुरू किया, जिससे कविता के शरीर में बिजली सी दौड़ गई और वह समीर के बालों को अपनी उंगलियों से भींचने लगी। उसने अपने दोनों हाथों से समीर के चेहरे को पकड़ा और उसे अपने सीने में भींच लिया, जैसे वह उन तरबूजों का पूरा रस उसे पिला देना चाहती हो। समीर अब नीचे की ओर बढ़ा और उसने कविता की साड़ी के घेरे को खोला, जिससे उसकी रेशमी त्वचा और उसकी गहरी खाई के ऊपर मौजूद बारीक काले बाल नजर आने लगे। समीर ने अपनी घुटनों पर बैठकर उस खाई का मुआयना किया, जिसकी खुशबू उसे मदहोश कर रही थी। उसने धीरे से अपनी उंगलियों को उस खाई के भीतर डाला, तो पाया कि वह पहले से ही काफी गीली और गर्म थी।
कविता ने एक लंबी कराह भरी और अपनी गर्दन पीछे की ओर झुका ली, जब समीर ने अपनी जीभ से उसकी खाई चाटना शुरू किया। वह स्वाद इतना नशीला था कि समीर खुद को रोक नहीं पाया और उसकी गति तेज होती गई। कविता के हाथ अब समीर के सिर पर कसने लगे थे और वह बार-बार ‘ओह समीर, और’ के नारे लगा रही थी। जैसे ही समीर ने अपनी उंगली से खोदना तेज किया, कविता के शरीर में एक कंपन हुआ और उसकी खाई से ढेर सारा मीठा रस निकलने लगा। यह रस समीर के लिए किसी अमृत से कम नहीं था, उसने उसे पूरी तरह साफ किया और फिर खड़ा होकर अपनी पैंट नीचे उतार दी।
समीर का विशाल और कठोर खीरा अब कविता की आंखों के सामने था, जिसे देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने धीरे से हाथ बढ़ाकर उस खीरे को छुआ और उसकी गर्माहट महसूस की, फिर उसने उसे अपने मुँह में ले लिया। खीरा चूसना कविता को एक नया अनुभव दे रहा था, वह उसे गहराई तक अपने गले में उतार रही थी, जिससे समीर का पूरा शरीर कांप उठा। समीर ने उसे रोका और उसे दुकान की मेज पर लिटा दिया, जहाँ कपड़ों का ढेर लगा था। उसने कविता की टांगों को फैलाया और अपने खीरे के सिर को उसकी खाई के मुहाने पर रखा। जैसे ही उसने पहला धक्का लगाया, कविता की एक तीखी चीख निकली लेकिन वह दर्द जल्द ही मजे में बदल गया।
समीर अब सामने से खोदना शुरू कर चुका था, हर धक्का इतना गहरा था कि वह कविता की आत्मा तक पहुँच रहा था। मेज के हिलने की आवाज और उनके शरीरों के टकराने की ‘चप-चप’ की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी। समीर ने उसके तरबूजों को अपने हाथों में दबा रखा था और वह पागलों की तरह उसे खोद रहा था। कविता के पैर अब समीर की कमर के चारों ओर लिपटे हुए थे, वह उसे और भी गहराई में खींच रही थी। उनकी सांसें एक-दूसरे में मिल रही थीं और पसीने से उनके शरीर चमक रहे थे। समीर ने अब कविता को पलटा दिया और उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, यह नया कोण कविता को और भी अधिक सुख दे रहा था।
खुदाई की प्रक्रिया अब अपने चरम पर थी, समीर की गति इतनी तेज हो गई थी कि कविता सिर्फ लंबी-लंबी आहें भर पा रही थी। समीर को महसूस हुआ कि उसका रस छूटने वाला है, उसने एक आखिरी जोरदार धक्का मारा और अपने खीरे को पूरी गहराई तक पहुँचा दिया। उसी पल कविता का शरीर भी पूरी तरह अकड़ गया और उसकी खाई से गर्म रस का फव्वारा फूटा, जिसने समीर के खीरे को पूरी तरह भिगो दिया। समीर ने भी अपना सारा गर्म रस उसकी खाई के भीतर ही छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे के ऊपर ढह गए, उनकी धड़कनें अभी भी बहुत तेज थीं और कमरे में सिर्फ उनके भारी सांसों की आवाज आ रही थी।
कुछ देर तक दोनों उसी अवस्था में लेटे रहे, जैसे वक्त ठहर गया हो। समीर ने धीरे से कविता के माथे को चूमा और उसे सहारा देकर खड़ा किया। कविता के बाल बिखरे हुए थे और उसके चेहरे पर एक अलग ही संतुष्टि की चमक थी। उसने अपने कपड़े ठीक किए लेकिन उसकी टांगें अभी भी थोड़ी कांप रही थीं। उसने समीर की आँखों में देखा और एक छोटी सी मुस्कान दी, जिसमें ढेर सारी भावनाएं और भविष्य के वादे छिपे थे। दुकान से बाहर निकलते समय कविता ने एक बार पीछे मुड़कर देखा, वह जानती थी कि यह सिर्फ एक नाप लेने का सिलसिला नहीं था, बल्कि एक ऐसी कहानी की शुरुआत थी जिसे वह उम्र भर याद रखेगी।