समीर ने अभी कुछ ही दिन पहले इस नए अपार्टमेंट में अपना कदम रखा था, और उसकी बगल वाले फ्लैट में रहने वाली कविता से उसकी पहली मुलाकात लिफ्ट के पास ही हुई थी। कविता की उम्र लगभग बत्तीस साल रही होगी, लेकिन उसका निखरा हुआ रूप और उसके शरीर की बनावट किसी भी युवा को अपना दीवाना बना सकती थी। उस दिन उसने हल्के नीले रंग की सूती साड़ी पहनी हुई थी, जिसमें उसके शरीर के उभार साफ झलक रहे थे। समीर ने महसूस किया कि जब भी वह कविता की ओर देखता, उसकी धड़कनें अपने आप ही तेज हो जाती थीं और एक अनजानी सी कशिश उसे कविता की ओर खींचने लगती थी।
कविता के शरीर की बनावट वाकई कमाल की थी; उसका रंग साफ था और उसकी कद-काठी एकदम सुडौल थी। साड़ी के पल्लू से झांकते उसके दो बड़े और रसीले तरबूज किसी का भी मन मोह लेने के लिए काफी थे, जो हर सांस के साथ धीरे-धीरे ऊपर-नीचे हो रहे थे। उसके चलने का अंदाज इतना मोहक था कि उसके भारी पिछवाड़े की लचक समीर की आंखों में बस गई थी। कविता के चेहरे पर हमेशा एक हल्की सी मुस्कान रहती थी, जो उसके व्यक्तित्व को और भी आकर्षक बना देती थी, लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी गहराई थी जो किसी भूखे दिल की कहानी बयां करती थी।
समीर और कविता के बीच धीरे-धीरे बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ और जल्द ही उनमें एक भावनात्मक जुड़ाव महसूस होने लगा। समीर को पता चला कि कविता के पति एक बड़ी कंपनी में सेल्स मैनेजर हैं और महीने के बीस दिन शहर से बाहर ही रहते हैं। कविता का अकेलापन उसकी बातों में साफ झलकता था, और समीर एक अच्छे श्रोता की तरह उसकी सारी बातें सुनता और उसे मानसिक सहारा देता। इस भावनात्मक नजदीकी ने उनके बीच एक अनकहे आकर्षण को जन्म दिया था, जहाँ शब्द कम और खामोशियाँ ज्यादा बातें करने लगी थीं, जिससे दोनों के बीच की दूरी घटने लगी थी।
एक दोपहर जब पूरा अपार्टमेंट सन्नाटे में डूबा हुआ था, कविता ने समीर को अपने घर चाय पर बुलाया क्योंकि उसके घर का पंखा कुछ आवाज कर रहा था। समीर जब उसके घर पहुँचा, तो कविता ने उसे रसोई में काम करते हुए देखा; उसके पसीने से भीगे चेहरे और गले पर बिखरी लटों ने समीर के भीतर एक ज्वालामुखी सा दहका दिया। समीर ने जैसे ही पंखा ठीक करने के लिए हाथ बढ़ाया, उसका हाथ गलती से कविता की कमर से छू गया। उस एक स्पर्श ने जैसे दोनों के शरीरों में बिजली का करंट दौड़ा दिया हो, और दोनों एक-दूसरे की आँखों में खो गए।
झिझक और मन के संघर्ष की दीवारें धीरे-धीरे ढहने लगी थीं, और समीर ने हिम्मत जुटाकर कविता के कंधे पर अपना हाथ रखा। कविता ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उसकी आँखें झुक गईं और उसकी सांसों की गति तेज हो गई। समीर ने महसूस किया कि कविता का पूरा बदन थरथरा रहा है, जैसे वह बरसों से इस लम्हे का इंतजार कर रही हो। उसने अपनी उंगलियों से कविता के चेहरे को सहलाया और धीरे से उसके होठों के करीब अपना चेहरा ले गया। उन दोनों के बीच की गर्मी इतनी बढ़ चुकी थी कि अब पीछे हटना नामुमकिन सा लग रहा था।
पहला स्पर्श बेहद कोमल और भावुक था, जैसे दो रूहें एक-दूसरे में समाने की कोशिश कर रही हों। समीर ने कविता के रेशमी बालों को पीछे किया और उसके कानों के पास जाकर फुसफुसाया, “तुम इतनी सुंदर हो कि मैं खुद को रोक नहीं पा रहा हूँ।” कविता की कराह निकल गई और उसने समीर को कसकर अपनी बाहों में भर लिया। समीर के हाथ अब कविता की पीठ पर रेंग रहे थे, और वह उसकी साड़ी के पल्लू को धीरे से कंधे से नीचे सरकाने लगा, जिससे उसके मखमली तरबूज पूरी तरह से उजागर होने के करीब आ गए थे।
जैसे-जैसे उत्तेजना बढ़ती गई, समीर ने कविता के ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोलने शुरू किए। जैसे ही ब्लाउज ढीला हुआ, कविता के भारी और सुडौल तरबूज समीर की आँखों के सामने आ गए, जिनके बीच में गुलाबी मटर जैसे दाने ठंढक और उत्तेजना से सख्त हो चुके थे। समीर ने अपनी जीभ से उन मटरों को सहलाना शुरू किया, जिससे कविता के मुँह से सिसकारियां निकलने लगीं। उसने कविता को गोद में उठाया और सीधे बेडरूम की ओर ले गया, जहाँ अब सिर्फ उनकी भारी सांसों और धड़कनों का शोर सुनाई दे रहा था।
बेड पर लिटाते ही समीर ने कविता के सारे कपड़े उतार दिए और अब वह पूरी तरह से कुदरती रूप में उसके सामने थी। उसकी गहरी खाई अब साफ दिख रही थी, जिसके आसपास घने और काले बाल मौजूद थे। समीर ने अपनी उंगलियों से उसकी खाई को टटोलना शुरू किया, तो पाया कि वह पहले से ही काफी गीली और चिपचिपी हो चुकी थी। कविता ने समीर का पैंट खोलकर उसका विशाल और सख्त खीरा बाहर निकाला, जिसे देखते ही उसकी आँखें फटी की फटी रह गई। उसने उस खीरे को अपने कोमल हाथों में पकड़ा और उसे धीरे-धीरे सहलाने लगी।
कविता ने बिना देर किए उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे चूसने लगी, जिससे समीर के मुँह से आनंद की एक लंबी आह निकली। कुछ देर तक खीरा चूसने के बाद, समीर ने कविता को सामने से लेटने के लिए कहा और वह सामने से खोदना (missionary) शुरू करने की तैयारी करने लगा। उसने अपने खीरे की नोक को कविता की रसीली खाई के मुहाने पर रखा और एक झटके में आधा खीरा भीतर उतार दिया। कविता के मुँह से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि चरम सुख की शुरुआत की आहट थी, जो उसे एक नई दुनिया में ले जा रही थी।
खुदाई की यह प्रक्रिया अब पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी, और कमरे में शरीर के टकराने की आवाजें गूँजने लगी थीं। समीर लगातार अपने खीरे को कविता की गहराई तक पहुँचा रहा था, और हर वार के साथ कविता के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे। समीर ने उससे कहा, “कविता, तुम्हारी ये खाई बहुत गहरी और तंग है, मुझे खोदने में बहुत मजा आ रहा है।” कविता ने जवाब में अपनी टांगें समीर की कमर के चारों ओर कस लीं और कहा, “समीर, मुझे और जोर से खोदो, आज मेरा सारा प्यास बुझा दो, मैं बस तुम्हारी होना चाहती हूँ।”
कुछ देर बाद समीर ने कविता को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने (doggy style) की स्थिति में ला दिया। कविता के उठे हुए पिछवाड़े को देख समीर का जोश दोगुना हो गया। उसने पीछे से अपने खीरे को दोबारा उसकी खाई में डाला और तेजी से धक्के लगाने लगा। हर धक्के के साथ कविता की चीखें और भी तीखी होती जा रही थीं, और वह अपने हाथों से चादर को कसकर जकड़े हुए थी। पसीने से लथपथ उनके शरीर एक-दूसरे से चिपक रहे थे, और खुदाई का यह रोमांच अपने चरम पर पहुँचने वाला था, जहाँ दोनों की आत्माएं मिल रही थीं।
आखिरकार, वह लम्हा आ ही गया जब दोनों का शरीर कांपने लगा और उत्तेजना की लहरें पूरे बदन में दौड़ने लगीं। समीर ने एक आखिरी और जोरदार धक्का मारा और उसका सारा रस कविता की खाई के भीतर छूट गया। ठीक उसी समय कविता का भी रस निकलना शुरू हुआ और वह समीर की बाहों में ढीली पड़ गई। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बेदम होकर पड़े रहे, और कमरे में सिर्फ उनकी भारी सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी। वह शांति बहुत सुखद थी, जो एक लंबे और गहरे मिलन के बाद ही नसीब होती है।
खुदाई के बाद की वह फिलिंग शब्दों में बयां करना मुश्किल था; कविता समीर की छाती पर अपना सिर रखे हुए धीरे-धीरे उसकी त्वचा को सहला रही थी। उसकी हालत ऐसी थी जैसे उसने बरसों की प्यास आज बुझाई हो, और उसके चेहरे पर एक अलग ही संतुष्टि और चमक थी। समीर ने उसके माथे को चूमा और उसे अहसास दिलाया कि यह सिर्फ शारीरिक जरूरत नहीं, बल्कि एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव भी था। वे दोनों जानते थे कि यह शुरुआत थी एक ऐसे रिश्ते की जो शायद समाज की नजरों में गलत हो, लेकिन उनके दिलों के लिए बहुत जरूरी था।
धीरे-धीरे शाम ढलने लगी थी, लेकिन उन दोनों के बीच का वह गर्माहट भरा एहसास अभी भी वैसा ही बना हुआ था। समीर ने उठकर अपने कपड़े पहने और कविता को प्यार से विदा किया, लेकिन जाते-जाते उनकी आँखों ने एक वादा कर लिया था कि यह सिलसिला यहीं खत्म नहीं होगा। कविता ने मुस्कुराते हुए उसे देखा और अपने बिखरे हुए बालों को संवारा, जैसे वह इस नए बदलाव को पूरी तरह से स्वीकार कर चुकी हो। उस रात समीर को एक ऐसी नींद आई जो उसे पहले कभी नहीं मिली थी, क्योंकि उसने एक अधूरी रूह को मुकम्मल किया था।