दोपहर की उस तपती और उमस भरी गर्मी में पूरा घर एक अजीब से सन्नाटे में डूबा हुआ था। समीर कॉलेज से जल्दी लौट आया था और घर में सिर्फ उसकी सौतेली माँ कविता थी। कविता की उम्र करीब अडतीस साल थी, लेकिन उनके शरीर की बनावट और कसावट किसी जवान लड़की को भी मात देती थी। जैसे ही समीर लिविंग रूम में पहुँचा, उसने देखा कि कविता सोफे पर लेटी हुई थीं और गर्मी की वजह से उनकी साड़ी का पल्लू नीचे खिसक गया था। उनके शरीर के उभार, जिन्हें देखकर समीर अक्सर बेकाबू हो जाता था, आज उसकी नज़रों के बिल्कुल सामने थे। उनके वह बड़े-बड़े और रसीले तरबूज ब्लाउज की तंग सीमाओं को तोड़कर बाहर आने की जद्दोजहद कर रहे थे, और उन पर पसीने की नन्हीं बूंदें चमक रही थीं। समीर की साँसें तेज़ होने लगीं और उसके मन में एक ऐसी आग भड़क उठी जिसे आज वह बुझाना चाहता था।
कविता की शारीरिक बनावट बहुत ही आकर्षक और कामुक थी। उनके शरीर के अंग-अंग से कामुकता छलकती थी। समीर की नज़रें उनके तरबूजों पर टिकी थीं, जिनके ऊपर लगे छोटे-छोटे मटर ब्लाउज के कपड़े के ऊपर से ही अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहे थे। उनकी कमर का घेरा और वहां जमी हल्की सी चर्बी समीर को पागल करने के लिए काफी थी। समीर धीरे-धीरे उनके करीब गया, उसके दिल की धड़कन इतनी तेज़ थी कि उसे खुद सुनाई दे रही थी। उसने देखा कि कविता की नींद गहरी थी, शायद दोपहर की थकावट ने उन्हें बेसुध कर दिया था। समीर की नज़रें उनके सुडौल पैरों से होती हुई उनके भारी पिछवाड़े पर जा टिकीं, जो साड़ी के नीचे भी अपनी गोलाई का एहसास करा रहे थे। उसे महसूस हुआ कि उसके पायजामे के अंदर उसका खीरा अब पूरी तरह से अकड़ चुका है और बाहर निकलने के लिए बेताब है।
समीर ने हिम्मत जुटाई और अपना हाथ धीरे से कविता के पैर पर रखा। स्पर्श होते ही कविता के शरीर में एक सिहरन सी दौड़ी, लेकिन उन्होंने आँखें नहीं खोलीं। समीर का हाथ धीरे-धीरे ऊपर की ओर सरकने लगा, उनकी मखमली जांघों को सहलाते हुए। वह जानता था कि यह गलत है, लेकिन उनकी खूबसूरती का जादू ऐसा था कि वह खुद को रोक नहीं पा रहा था। जब उसका हाथ कविता की कमर तक पहुँचा, तो उन्होंने धीरे से अपनी आँखें खोलीं। उनकी आँखों में पहले तो हैरानी थी, फिर धीरे-धीरे उनमें भी वही आग दिखने लगी जो समीर की आँखों में थी। कविता ने धीमी आवाज़ में कहा, समीर, ये तुम क्या कर रहे हो? क्या तुम्हें पता है कि यह कितना गलत है? समीर ने उनके गले के पास अपनी साँसें छोड़ते हुए कहा, माँ, गलत और सही का फैसला तो समाज करता है, लेकिन मेरा यह तड़पता हुआ शरीर सिर्फ आपकी चाहत जानता है।
कविता के मन में एक गहरा संघर्ष चल रहा था। एक तरफ समाज की मर्यादा थी और दूसरी तरफ उनकी अपनी दबी हुई इच्छाएं। समीर की उंगलियाँ अब उनके तरबूजों के पास पहुँच चुकी थीं। उसने धीरे से उनके ब्लाउज के हुक को एक-एक करके खोलना शुरू किया। जैसे ही आखिरी हुक खुला, उनके विशाल तरबूज आज़ाद होकर समीर के सामने आ गए। समीर ने अपनी नज़रों से उन अंगों की पूजा की और फिर अपनी उंगलियों से उनके ऊपर लगे गुलाबी मटर को सहलाना शुरू किया। कविता के मुंह से एक दबी हुई कराह निकली और उन्होंने समीर के सिर को अपने सीने से लगा लिया। अब झिझक खत्म हो चुकी थी, सिर्फ दो जिस्मों की भूख बची थी। समीर ने अपनी जीभ से उन रसीले तरबूजों को चाटना शुरू किया, जिससे कविता का पूरा शरीर कांपने लगा और वह बिस्तर की चादर को अपनी मुट्ठियों में भींचने लगीं।
समीर अब नीचे की ओर बढ़ा और उसने कविता की साड़ी और पेटीकोट को धीरे से पैरों की तरफ सरका दिया। अब उसके सामने उनकी वह रहस्यमयी और घनी बालों वाली खाई थी, जहाँ से एक सोंधी सी खुशबू आ रही थी। समीर ने अपनी उंगलियों को उस खाई के मुहाने पर रखा, जो पहले से ही गीली हो चुकी थी। उसने धीरे-धीरे अपनी एक उंगली को खाई के अंदर डाला, जिससे कविता ने अपनी कमर ऊपर की ओर उठा ली। वह मदहोश होकर कहने लगीं, ओह समीर, तुम मुझे पागल कर दोगे, और तेज़ करो। समीर ने अपनी जीभ का इस्तेमाल किया और खाई को गहराई से चाटना शुरू किया। उनकी कामुक बातचीत अब और भी गहरी हो चली थी। कविता समीर के खीरे को अपने हाथों में लेकर उसे सहलाने लगीं, उसकी लंबाई और मोटाई महसूस करके वह हैरान थीं।
समीर अब और इंतज़ार नहीं कर सकता था। उसने अपने कपड़े उतारे और अपने सख्त खीरे को कविता के हाथों में थमा दिया। कविता ने उसे गौर से देखा और फिर उसे धीरे से अपने मुंह के अंदर ले लिया। वह उसे किसी कैंडी की तरह चूसने लगीं, जिससे समीर की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। कुछ देर तक खीरा चूसने के बाद, समीर ने उन्हें बिस्तर पर सीधा लिटाया और उनके पैरों को चौड़ा कर दिया। वह अब सामने से खुदाई करने के लिए तैयार था। उसने अपने खीरे की टोपी को खाई के गीले मुहाने पर रखा और एक ही झटके में उसे आधा अंदर धकेल दिया। कविता के मुंह से एक तेज़ चीख निकली, पर वह दर्द की नहीं, बल्कि एक असीम आनंद की थी। समीर ने उनके होठों को अपने होठों से सिल दिया ताकि उनकी आवाज़ बाहर न जाए और फिर धीरे-धीरे खुदाई की गति बढ़ाने लगा।
कमरे में सिर्फ शरीर के टकराने की आवाज़ और उनकी भारी साँसें गूँज रही थीं। समीर पूरी ताकत से खुदाई कर रहा था, उसका हर धक्का कविता की रूह तक पहुँच रहा था। उसने उनके दोनों तरबूजों को अपने हाथों में जोर से जकड़ रखा था और उनके मटर को मरोड़ रहा था। कविता चिल्ला रही थीं, हाँ समीर, और अंदर तक खोदो, मुझे पूरा भर दो। समीर ने अब उनकी स्थिति बदली और उन्हें घुटनों के बल खड़ा कर दिया। अब वह उनके भारी पिछवाड़े से खुदाई करने लगा। इस पोजीशन में उसका खीरा उनकी खाई की गहराइयों को और भी बेहतर तरीके से छू पा रहा था। कविता की कमर हर धक्के के साथ आगे-पीछे हो रही थी, और उनका शरीर पसीने से लथपथ हो चुका था। यह एक ऐसा एहसास था जिसे उन दोनों ने पहले कभी महसूस नहीं किया था।
खुदाई की प्रक्रिया अब अपने चरम पर पहुँच रही थी। समीर की गति इतनी तेज़ थी कि कविता का पूरा शरीर हर धक्के के साथ हिल रहा था। वह उनके बालों को पकड़कर पीछे खींचता और अपने खीरे को पूरी ताकत से अंदर तक धकेलता। दोनों का पसीना एक-दूसरे में मिल चुका था। अचानक कविता का शरीर अकड़ने लगा और उनकी खाई से भारी मात्रा में रस निकलने लगा। उन्होंने समीर को कसकर पकड़ लिया और उनकी आँखों से खुशी के आंसू निकल आए। ठीक उसी समय समीर ने भी महसूस किया कि उसका बांध टूटने वाला है। उसने अंतिम कुछ तेज़ धक्के लगाए और अपना सारा गर्म रस उनकी खाई की गहराइयों में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे के ऊपर ढह गए, उनकी साँसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं, लेकिन उनके दिलों की धड़कन अभी भी तेज़ थी।
उसके बाद का वह समय बहुत ही भावुक और शांत था। समीर कविता की गोद में सिर रखकर लेटा हुआ था और वह उसके बालों में अपनी उंगलियाँ फिरा रही थीं। उनके शरीर अभी भी एक-दूसरे की गर्माहट महसूस कर रहे थे। उस खुदाई ने उनके बीच के सारे पर्दों को हटा दिया था। कविता ने समीर के माथे को चूमा और कहा, आज तुमने मुझे फिर से जीवित कर दिया है। समीर ने उनकी आँखों में देखते हुए कहा, यह तो बस शुरुआत है माँ, हमारी यह गुप्त प्यास अब हमेशा ऐसे ही बुझती रहेगी। उनके चेहरे पर एक संतुष्टि थी और मन में एक नया जुड़ाव। वे जानते थे कि बाहर की दुनिया के लिए वे माँ-बेटे हैं, लेकिन इस कमरे की चारदीवारी के अंदर वे सिर्फ दो प्यासे शरीर थे जिन्होंने एक-दूसरे में पूर्णता पा ली थी।