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कविता मौसी की चु@@ई

बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और ठंडी हवाओं के झोंके खिड़की के पर्दों को बेतहाशा उड़ा रहे थे, जिससे कमरे के भीतर एक अजीब सी सिहरन और गर्माहट का अहसास हो रहा था। समीर अपनी मौसी कविता के साथ सोफे पर बैठा था, जो शहर में कुछ दिनों के लिए काम के सिलसिले में रुकी हुई थी और आज रात बिजली कटने की वजह से पूरा घर अंधेरे में डूबा हुआ था। कविता मौसी की उम्र करीब पैंतीस साल थी, लेकिन उनके बदन की बनावट और चेहरे की चमक किसी बीस साल की जवान लड़की को मात देने के लिए काफी थी, जो समीर के मन में हलचल पैदा कर रही थी। समीर ने महसूस किया कि उसकी मौसी की सांसें कुछ तेज चल रही हैं और उनके रेशमी ब्लाउज के भीतर दबे हुए रसीले तरबूज रह-रहकर उसकी बांहों से टकरा रहे थे, जिससे समीर के शरीर में एक अज्ञात उत्तेजना दौड़ने लगी थी।

कविता मौसी ने आज एक गहरे नीले रंग की शिफॉन की साड़ी पहन रखी थी, जो उनके गोरे और सुडौल बदन पर किसी दूसरी खाल की तरह चिपकी हुई थी और उनके अंगों की गोलाई को बखूबी निखार रही थी। समीर की नजरें बार-बार उनके उन विशाल तरबूजों पर टिक जाती थी, जो ब्लाउज के गहरे गले से बाहर झांकने की नाकाम कोशिश कर रहे थे और जिनके बीच की गहरी घाटी समीर को अपनी ओर खींच रही थी। उनके शरीर से आने वाली मोगरे की धीमी खुशबू समीर के दिमाग को सुन्न कर रही थी और वह अपनी नजरें उनके उस चौड़े पिछवाड़े से नहीं हटा पा रहा था, जो सोफे पर दबाव बना रहा था। समीर ने धीरे से अपनी मौसी के कंधे पर हाथ रखा, तो उन्होंने मना करने के बजाय अपनी आंखें मूंद लीं और एक गहरी आह भरी, जिससे समीर का हौसला और बढ़ गया।

समीर ने महसूस किया कि अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं बचा है और मौसी की खामोशी उसे आगे बढ़ने का मौन निमंत्रण दे रही थी, जिससे उसके भीतर की दबी हुई इच्छाएं ज्वालामुखी की तरह फटने को तैयार थीं। उसने बहुत ही कोमलता से मौसी के गालों को छुआ और फिर धीरे-धीरे अपनी उंगलियां उनके गले से नीचे उतारते हुए उन तने हुए तरबूजों की सरहद तक ले गया, जहां छोटे-छोटे मटर साड़ी के कपड़े के नीचे से अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे। कविता के होठों से एक धीमी कराह निकली और उसने समीर को अपनी बांहों में कस लिया, जिससे उन दोनों के जिस्म एक-दूसरे में सिमटने लगे और समीर को अपने कपड़ों के भीतर अपना खीरा पूरी तरह से अकड़ता हुआ महसूस होने लगा। मौसी की धड़कनें अब समीर की छाती पर साफ सुनाई दे रही थीं और उनके बीच का संकोच धीरे-धीरे उस बारिश की बूंदों की तरह पिघलकर बहने लगा था जो बाहर खिड़की पर गिर रही थीं।

समीर ने अब धीरे-धीरे कविता की साड़ी के पल्लू को खिसका दिया, जिससे उनके बदन की आधी खूबसूरती अब बिना किसी रुकावट के समीर की भूखी आंखों के सामने थी और वह नजारा किसी स्वर्ग से कम नहीं लग रहा था। उसने अपने कांपते हुए हाथों से कविता के ब्लाउज के हुक खोलने शुरू किए और जैसे ही आखिरी हुक खुला, मौसी के दोनों भारी तरबूज आजाद होकर बाहर आ गए, जिन पर गुलाबी रंग के मटर ठंड और उत्तेजना से पूरी तरह तन चुके थे। समीर ने बिना देर किए अपना मुंह एक तरबूज पर जमा दिया और उसे पूरी शिद्दत से चूसने लगा, जबकि कविता ने उसके सिर को अपने सीने से और जोर से चिपका लिया और उसके बालों में अपनी उंगलियां फंसाकर जोर-जोर से सिसकारियां लेने लगीं। कमरे का तापमान अब काफी बढ़ चुका था और दोनों के शरीरों से निकलने वाला पसीना उनके बीच के घर्षण को और भी अधिक कामुक और आनंददायक बना रहा था।

जैसे-जैसे समीर की जीभ मौसी के बदन के अलग-अलग हिस्सों को चख रही थी, कविता का पूरा शरीर कमान की तरह मुड़ने लगा और उसकी आहें अब और भी गहरी और बेकाबू होती जा रही थीं। समीर ने धीरे से मौसी को बिस्तर पर लिटाया और उनकी पेटीकोट की डोरी ढीली कर दी, जिससे उनकी जांघों के बीच की वह रहस्यमयी खाई अब पूरी तरह से बेपर्दा हो चुकी थी, जहाँ काले रेशमी बाल उस रास्ते की रखवाली कर रहे थे। उसने अपनी उंगलियों से उस खाई को टटोलना शुरू किया, जो पहले से ही काम-रस से पूरी तरह गीली और लिसलिसी हो चुकी थी, जिससे समीर की उत्तेजना सातवें आसमान पर पहुँच गई। कविता ने अपनी टांगें फैला दीं और समीर को अपने करीब आने का इशारा किया, उसकी आंखों में अब सिर्फ और सिर्फ अपनी प्यास बुझाने की एक गहरी तड़प और समर्पण का भाव साफ दिखाई दे रहा था।

समीर ने अब अपना खीरा पूरी तरह से आजाद कर लिया था, जो अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ कविता की आंखों के सामने गर्व से तनकर खड़ा था और उसकी टोपरी से प्यार की कुछ बूंदें छलक रही थीं। कविता ने उस गर्म खीरे को अपने हाथों में थामा और उसकी कठोरता को महसूस करते हुए उसे चूम लिया, फिर धीरे-धीरे उसे अपने मुंह में लेकर चूसने लगी, जिससे समीर की रीढ़ की हड्डी में झुनझुनी दौड़ गई। वह मौसी के सिर को पकड़कर अपने खीरे को उनके हलक तक उतारने लगा, जबकि कविता उसे बड़े चाव से चूस रही थी और बीच-बीच में उसे जीभ से सहला रही थी, जिससे समीर को ऐसा लग रहा था मानो वह किसी दूसरी दुनिया में पहुंच गया हो। इस सुखद अहसास ने समीर के भीतर एक ऐसी आग लगा दी थी जिसे अब सिर्फ और सिर्फ कविता की उस गहरी खाई के भीतर जाकर ही बुझाया जा सकता था।

अंततः समीर ने कविता को सामने से खोदना शुरू करने का फैसला किया और अपने खीरे के अगले हिस्से को उस गीली खाई के मुहाने पर टिका दिया, जहाँ से उठती हुई गर्मी उसे पागल कर रही थी। उसने एक जोरदार धक्का लगाया और उसका आधा खीरा एक झटके में कविता की तंग और गर्म खाई के भीतर समा गया, जिससे मौसी के मुंह से एक चीख निकल गई जो आनंद और हल्के दर्द का मिश्रण थी। समीर ने रुकने के बजाय अपनी गति बढ़ा दी और धीरे-धीरे पूरा खीरा उनकी गहराई तक उतार दिया, जिससे कविता का पूरा बदन कांपने लगा और वह समीर की पीठ पर अपने नाखून गड़ाने लगी। हर धक्के के साथ उनके शरीर आपस में टकरा रहे थे और उस सन्नाटे में केवल उनके अंगों के मिलन की आवाज़ और उनकी भारी सांसें ही गूँज रही थीं, जो उस रात की गवाह बन रही थीं।

थोड़ी देर बाद समीर ने कविता को पलटा दिया और अब उसे पिछवाड़े से खोदना शुरू किया, जिससे उसे एक नया और गहरा आनंद मिलने लगा क्योंकि मौसी का वह भारी पिछवाड़ा हर धक्के के साथ हिल रहा था। कविता अब पूरी तरह से सुध-बुध खो चुकी थी और वह बस पागलों की तरह समीर का नाम पुकार रही थी, उसकी उंगलियां चादर को बुरी तरह से नोच रही थीं क्योंकि उत्तेजना अब अपने चरम पर पहुँच चुकी थी। समीर ने अपनी रफ्तार और तेज कर दी और अब वह बिना किसी दया के मौसी की उस गहरी खाई में गोते लगा रहा था, जिससे कमरे की हवा में एक अजीब सी मादक महक फैल गई थी। उन दोनों का पसीना अब एक होकर उनके शरीरों के बीच फिसलन पैदा कर रहा था, जिससे हर धक्का और भी ज्यादा गहरा और मारक महसूस हो रहा था, जो उन्हें रस निकलने के करीब ले जा रहा था।

कविता ने समीर को फिर से अपनी ओर घुमाया और उसे जोर से जकड़ लिया क्योंकि अब उसे महसूस हो रहा था कि उसका रस निकलने वाला है और उसका पूरा शरीर थरथराने लगा था। समीर ने भी अपनी पूरी ताकत झोंक दी और आखिरी कुछ जोरदार धक्के लगाए, जिससे मौसी की खाई के भीतर एक हलचल हुई और उनका गर्म रस भारी मात्रा में बाहर बहने लगा। ठीक उसी समय समीर का भी सब्र टूट गया और उसने अपना सारा गर्म रस कविता की गहराई में छोड़ दिया, जिससे दोनों के शरीर शांत होकर एक-दूसरे पर गिर पड़े। वे दोनों काफी देर तक उसी अवस्था में लेटे रहे, उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं लेकिन उस रात की जो यादें उन्होंने बनाई थीं, वह उनके दिलों में हमेशा के लिए अंकित हो गई थीं, जिसमें शर्म की जगह केवल एक गहरा और अटूट प्रेम और संतुष्टि थी।

खुदाई के बाद कविता ने समीर के माथे को चूमा और उसकी बांहों में सिमट कर सो गई, मानो उसे दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह मिल गई हो, जबकि समीर उसे निहारता रहा। उनके बीच का वह रिश्ता अब केवल खून का नहीं रह गया था, बल्कि उसमें एक ऐसी रूहानी और जिस्मानी गहराई आ गई थी जिसे शब्दों में बयान करना नामुमकिन था। बाहर बारिश अब भी हो रही थी लेकिन अब वह डरावनी नहीं बल्कि संगीत की तरह लग रही थी, जो उनके मिलन की खुशी में बज रही थी। समीर ने महसूस किया कि उस रात उसने न केवल एक शरीर को पाया था बल्कि एक ऐसी आत्मा को छुआ था जो सालों से प्यार और स्पर्श के लिए तरस रही थी, और अब दोनों के मन शांत और तृप्त थे।

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