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उस रात के बाद चंदा के मन में एक नई उत्तेजना थी। मोन सिंह के साथ वह मुलाकात अधूरी नहीं रही, लेकिन अब उसका शरीर और मन दोनों उसकी याद में डूबे रहते थे। दिन में वह घर पर रहती, नानी के साथ रसोई में मदद करती, लेकिन आँखें हमेशा खेतों की ओर चली जातीं। मोन सिंह अब रोज़ शाम को झोपड़ी के पास इंतजार करता, लेकिन चंदा सावधान रहती – दिन में नहीं, सिर्फ रात में मिलने जाती थी। पर उन्हे नहीं पता था की उनपर कोई नजर रख रहा है।
हरिया लाल पड़ोस का किसान था – उम्र पचास के करीब, लंबा-तगड़ा, दाढ़ी-मूंछ वाला, हमेशा अकेला रहता। हरिया लाल नाना रामस्वरूप का पुराना दोस्त था – दोनों साथ में खेतों में काम करते थे, शाम को चबूतरे पर बीड़ी पीते, पुरानी बातें करते। हरिया लाल की पत्नी कई साल पहले मर चुकी थी, वह गाँव में चुपके-चुपके सबकी बातें सुनता, और रात में खेतों की रखवाली करता। उस रात वह बैल को पानी पिलाने आया था, लेकिन झाड़ियों से पूरी हरकत देख ली। पहले दिन की गिरने वाली घटना भी देखी थी, और अब रात की मुलाकात भी। हरिया लाल का मन कुछ और ही सोच रहा था – वह चंदा को देखकर लालच में पड़ गया था। वह सोचता, “यह शहर वाली लड़की इतनी खुली है… शायद मेरे साथ भी मजा कारले..” उसने मन ही मन योजना बनानी शुरू कर दी। अगले दिन वह मोन सिंह से मिला, “भाई, रात में खेत में क्या कर रहा था?” मोन सिंह घबरा गया, लेकिन कुछ नहीं बोला। हरिया लाल मुस्कुराया, “चिंता मत कर, मैंने देख लिया है। लेकिन राज रखूँगा… अगर तू मुझे भी मौका दे।”
मोन सिंह का चेहरा सफेद पड़ गया। हरिया लाल बोला, “अगली बार रात को चंदा आएगी न? तो मैं भी आऊँगा। अगर तू नहीं माना, तो गाँव में सबको बता दूँगा।” मोन सिंह डर गया और मजबूरी मे हाँ करदी, अगर बात नहीं मानता तो पूरे गाँव मे उसकी बदनामी हो जाती। उसने सोचा चंदा को बता दे लेकिन चंदा को बताने की हिम्मत नहीं हुई।
अगले दिन शाम को मोन सिंह ने चंदा को इशारा किया – “पास बुलकर धीरे से बोला रात ठीक बारह बजे आना, झोपड़ी में। आज अंधेरा रखूँगा, मजा दोगुना होगा।” चंदा मुस्कुराई, उसका मन उत्सुक हो गया। “ठीक है अंकल, आऊँगी।” रात हुई। गाँव सो चुका था, चाँद छिपा हुआ, घना अंधेरा। चंदा चुपके से निकली – नाना-नानी सो रहे थे, उनका खर्राटों की आवाज कमरे से आ रही थी। बाहर जंगल की हवा ठंडी थी, कुत्ते दूर से भौंक रहे थे, पेड़ों की पत्तियाँ सरसराती हुईं। चंदा के कदम हल्के थे, लेकिन दिल तेज धड़क रहा था – उत्साह से, अंधेरे में थोड़ा डर भी। वह झोपड़ी की ओर चली, सरसों के पौधों के बीच से गुजरती हुई, पत्तियाँ उसकी जांघों से रगड़ खा रही थीं, हल्की गुदगुदी, Ch@@t और गीली हो गई। झोपड़ी का दरवाजा हल्का खुला था, अंदर घुप्प अंधेरा – एक बल्ब था पर वो भी बंद था, सिर्फ बाहर की हल्की चाँदनी दरवाजे से आ रही थी, फर्श पर धुंधली छाया बना रही थी। चंदा अंदर घुसी, फुसफुसाई, “अंकल… मैं आ गई।” उसकी आवाज में उत्साह था, साँसें तेज, B@@bs ऊपर-नीचे हो रहे थे।
अचानक पीछे से दो मजबूत हाथों ने उसे पकड़ लिया – कमर पर कसकर, सीने से सटा लिया। चंदा चौंकी, हल्की सी चीख निकली, लेकिन सोचा मोन सिंह है। वह कुछ न बोला, बस साँसें तेज, गर्म हवा चंदा की गर्दन पर लग रही थी, दाढ़ी चुभ रही थी। यह हरिया लाल था – मोन सिंह की जगह वह खुद आ गया था, मोन सिंह को बाहर भेज दिया था। हरिया ने चंदा को दीवार से सटा दिया, बिना बोले चुम्बन शुरू कर दिया – रूखे होंठ चंदा के होंठों पर दबाए, जीभ अंदर घुसी, चंदा की जीभ से लड़ने लगी। स्वाद अलग – ज्यादा नमकीन, बीड़ी और पसीने का। चंदा को लगा अंकल आज रूखे हैं, लेकिन मजा आ रहा था। हरिया के हाथ कुर्ते में घुसे, B@@bs को जोर से पकड़ा – बड़े, भरे हुए B@@bs, नरम मांस हाथों में दबा, Ghundi सख्त हो गए, जैसे छोटे-छोटे बटन। हरिया ने Ghundi को pinch किया, खींचा – चंदा की सिसकारी निकली, “आह अंकल… धीरे, दर्द हो रहा है लेकिन बहुत अच्छा लग रहा है।” लेकिन वह कुछ न बोला। चंदा को अजीब लगा – अंकल आज चुप क्यों हैं? लेकिन अंधेरे में कुछ न दिखा, और Ch@@t की जलन बढ़ रही थी।
हरिया ने चंदा को घास पर गिराया, सलवार की डोरी खोली, नीचे सरका दी – चंदा की जांघें नंगी, Ch00t की jhat हल्की, गीली, Ch@@t का मुंह खुला हुआ, रस टपक रहा था। हरिया ने उंगलियाँ Ch@@t पर फेरी, क्लिट को रगड़ा – चंदा कमर उठाती, “अंकल… उंगली अंदर डालो।” हरिया ने दो उंगलियाँ अंदर सरका दीं – Ch@@t गर्म, गीली, दीवारें सिकुड़ रही थीं। उंगलियाँ अंदर-बाहर, G-spot को रगड़ते। चंदा की साँसें तेज, B@@bs ऊपर-नीचे हो रहे, nippal सख्त। हरिया ने अपना L@nd बाहर निकाला – बड़ा, मोटा, काला, नसें फूली हुईं, सिरा गीला, पूर्व-रस टपक रहा था। चंदा की Ch@@t के मुंह पर रखा, धीरे से धकेला। चंदा को दर्द, “आह… अंकल, आज L@nd बड़ा लग रहा है, धीरे।” लेकिन मीठा दर्द, पूरा अंदर गया – Ch@@t फैली, दीवारें L@nd को कसकर पकड़ रही थीं। हरिया ने धक्के शुरू – धीरे से तेज, गहराई बढ़ती गई, हर धक्के में चंदा की Ch@@t से चटकने की आवाज, रस बह रहा था। चंदा सोच रही थी, “आज अंकल कुछ अलग हैं… ज्यादा जोर से, L@nd ज्यादा मोटा लग रहा है। क्यों नहीं बोल रहे? शायद खेल है, मजा ले लूँ।” हरिया कुछ न बोला, बस साँसें तेज, हाथ चंदा के B@@bs पर कसते, nippal pinch करते, खींचते। चंदा चरम पर पहुँच रही थी – शरीर काँपता, Ch@@t सिकुड़ रही थी, “आह… आ रही हूँ अंकल!”
ठीक उसी वक्त, झोपड़ी का बल्ब जल गया – हरिया ने सोचा की सुयाभ से पहले बिजली नहीं आएगी लेकिन वो उसी वक़्त आ गयी। रोशनी फैली, चंदा ने आँखें खोलीं तो वो एकदम से डर गयी लेकिन Ch@@t के अंदर L@nd अंदर बाहर हो रहा था ओर वो अपनी चरम सीमा पर पहुँच रही थी। – उसने देखा उसके ऊपर मोन सिंह नहीं, हरिया लाल था। दाढ़ी-मूंछ वाला चेहरा, आँखें लाल, L@nd अभी भी Ch@@t में धंसा हुआ। “अरे… आप कौन? अंकल नहीं…” चंदा चौंकी, हल्का आश्चर्य, डर की लहर दौड़ी, लेकिन शरीर चरम पर था – Ch@@t सिकुड़ रही थी, रस बह रहा था। वह उठी नहीं, बस लेटी रही, धक्कों का मजा लेती रही।
L@nd इतना मोटा, मजा अलग है। डर लग रहा है, लेकिन रुक क्यों जाऊँ? यह भी अच्छा लग रहा है।” हरिया मुस्कुराया, “चुप रह बिटिया, मैं हरिया लाल हूँ, नाना का दोस्त। मैंने सब देख लिया है। अब मजा ले।” चंदा का मन सिहर गया – डर, लेकिन साथ में एक अजीब उत्तेजना। वह कुछ न बोली, बस कमर उठाती रही, धक्कों का जवाब देती रही, Ch@@t L@nd को कसकर पकड़ रही थी। हरिया ने स्पीड बढ़ाई, चंदा की कमर पकड़ी, B@@bs को जोर से मसला, Ghundi काटे। चंदा की Ch@@t सिकुड़ रही थी, रस बह रहा था। दोनों साथ चरम पर – हरिया का गर्म रस Ch@@t में फूटा, चंदा का शरीर लहरों में काँपता रहा, मन में सोच रही थी, “यह कौन है? नाना का दोस्त हरिया लाल? लेकिन…
बाद में हरिया बोला, “बिटिया, अब हर रात आना। नहीं आई तो नाना को बता दूँगा।” चंदा डर गई, लेकिन हल्के आश्चर्य से मन में सोच रही थी, “अब क्या होगा और मोन सिंह कहाँ है … कुछ भी हो चंदा को पहले से जादा मजा आया।” वह चुपचाप घर लौटी। अब हरिया का राज चंदा पर था, और मोन सिंह बीच में फँस गया। आगे की कहानी अगले भाग म….
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