चाची की मदहोश चुदाई—>
उस रात बाहर मूसलाधार बारिश हो रही थी और ठंडी हवाओं के झोंके खिड़कियों को झकझोर रहे थे। समीर अपने कमरे में लेटा हुआ था लेकिन उसका ध्यान बगल वाले कमरे में था जहाँ उसकी चाची शीला अकेली सोई हुई थी। शीला चाची की उम्र करीब पैंतीस साल थी लेकिन उनके शरीर की बनावट और ढलान किसी भी जवान लड़की को मात दे सकती थी। समीर के चाचा काम के सिलसिले में शहर से बाहर गए हुए थे और पूरा घर इस तूफानी रात में सन्नाटे से भरा हुआ था। समीर के मन में बार-बार शीला चाची की वह गदराई हुई देह और उनके रेशमी साड़ी का पल्लू फिसलना घूम रहा था जो उसने शाम को रसोई में देखा था।
शीला चाची का शरीर एक बहती हुई नदी की तरह था जिसमें लहरें और गहराई दोनों थीं। उनके सीने पर लदे दो भारी और गोल तरबूज किसी भी पुरुष का मन भटकाने के लिए काफी थे जो साड़ी के भीतर से अपनी मौजूदगी का एहसास कराते रहते थे। समीर ने कई बार छुपकर उन तरबूजों के ऊपर मौजूद मटर के दानों को साड़ी के कपड़े के ऊपर से उभरते देखा था जिससे उसकी सांसें तेज हो जाती थीं। शीला चाची की कमर पतली थी लेकिन उनके पीछे का पिछवाड़ा काफी भरा हुआ और मांसल था जो चलते समय एक अजीब सी लय में हिलता था जिसे देखकर समीर अक्सर अपनी सुध-बुध खो बैठता था।
समीर हिम्मत जुटाकर चाची के कमरे की तरफ बढ़ा और देखा कि चाची अभी तक जागी हुई थीं और बिस्तर पर करवटें बदल रही थीं। उनकी साड़ी थोड़ी अस्त-व्यस्त थी और उनके गोरे बदन की चमक अंधेरे में भी साफ झलक रही थी। समीर को देखते ही शीला चाची चौंक गईं लेकिन उनकी आँखों में गुस्सा नहीं बल्कि एक अजीब सी तड़प और प्यास दिखाई दे रही थी। समीर ने उनके पास जाकर धीरे से उनका हाथ थामा और उनके बीच एक अनकहा भावनात्मक जुड़ाव महसूस होने लगा जो सालों से दबा हुआ था। चाची ने समीर की आँखों में देखा और उनकी सांसों की गर्मी समीर के चेहरे पर महसूस होने लगी जो उनके बीच की दूरियों को कम कर रही थी।
आकर्षण का ज्वार अब दोनों तरफ से उमड़ रहा था और समीर ने धीरे से चाची के कंधे पर हाथ रखा। शीला चाची के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई और उनके चेहरे पर शर्म और हवस का एक मिला-जुला भाव तैरने लगा। समीर ने अपने हाथ नीचे ले जाते हुए उनके भारी तरबूजों को सहलाना शुरू किया तो चाची के मुँह से एक हल्की आह निकल गई। उनके मटर के दाने अब सख्त होने लगे थे और समीर की उंगलियों के स्पर्श से वे और भी ज्यादा उभर आए थे। समीर ने धीरे से उनके ब्लाउज के हुक खोले और उन रसीले तरबूजों को आज़ाद कर दिया जो अब समीर की आँखों के सामने अपनी पूरी भव्यता के साथ मौजूद थे।
शीला चाची की झिझक अब पूरी तरह से खत्म हो चुकी थी और उन्होंने समीर को अपनी बाहों में भर लिया। समीर ने अपना चेहरा उनके तरबूजों के बीच फँसा दिया और उनकी खुशबू को अपने अंदर उतारने लगा। चाची की उंगलियां समीर के बालों में खेल रही थीं और उनकी सांसें अब तेज और गर्म हो चुकी थीं। समीर ने धीरे से नीचे झुककर उनके तरबूजों को अपने मुँह में लेना शुरू किया और उन्हें धीरे-धीरे सहलाने लगा। चाची का शरीर धनुष की तरह मुड़ने लगा था और उनकी टांगों के बीच की खाई अब गीली होने लगी थी जिसका एहसास समीर को उनके शरीर की हरारत से हो रहा था।
समीर ने अपना हाथ नीचे ले जाकर चाची के रेशमी बालों के नीचे छुपी हुई उस गहरी खाई को महसूस किया। वह खाई अब पूरी तरह से रसीली और चिपचिपी हो चुकी थी जो समीर के आगमन का इंतज़ार कर रही थी। समीर ने अपनी एक उंगली को उस खाई में डाला तो चाची ने अपनी आँखें बंद कर लीं और उनके मुँह से एक लंबी कराह निकली। समीर की उंगली उस गहराई में धीरे-धीरे अंदर-बाहर हो रही थी जिससे चाची का शरीर पानी की तरह पिघलने लगा था। वे बार-बार समीर के नाम की रट लगा रही थीं और उनके हाथ समीर की पीठ को मजबूती से जकड़े हुए थे।
अब समीर ने अपने कपड़े उतारे और उसका सख्त और लंबा खीरा चाची की आँखों के सामने तनकर खड़ा हो गया। शीला चाची ने अपनी प्यासी निगाहों से उस खीरे को देखा और उसे अपने हाथों में थाम लिया। उन्होंने धीरे से उस खीरे को चूसना शुरू किया और उनकी जुबान उस खीरे की हर नस को महसूस कर रही थी। समीर को ऐसा लग रहा था जैसे वह स्वर्ग के द्वार पर खड़ा हो और चाची का मुँह उसे उस पार ले जाने का रास्ता हो। खीरा चूसने की प्रक्रिया इतनी गहरी और भावनात्मक थी कि समीर की आंखों से खुशी के आंसू निकलने ही वाले थे कि तभी उसने चाची को सीधा लिटाया।
समीर अब चाची के ऊपर आ गया और उसने अपने खीरे की नोक को चाची की गीली खाई के द्वार पर टिका दिया। जैसे ही समीर ने थोड़ा दबाव डाला, उसका खीरा धीरे-धीरे उस तंग और गर्म खाई के अंदर समाने लगा। शीला चाची ने एक दर्द और मजे भरी चीख निकाली और समीर को कसकर पकड़ लिया। खुदाई की प्रक्रिया अब शुरू हो चुकी थी और समीर बहुत ही धीमी गति से अपने खीरे को उस गहराई में उतार रहा था। हर बार जब वह अंदर जाता, चाची का शरीर ऊपर की ओर उछलता और उनके तरबूज हवा में थरथराते। यह खुदाई इतनी गहरी थी कि उन दोनों को अपनी आत्माओं के मिलन का एहसास हो रहा था।
कमरे में अब सिर्फ थप-थप की आवाजें और चाची की सिसकारियां गूँज रही थीं। समीर ने अब अपनी गति बढ़ा दी थी और वह पूरी ताकत से उस खाई को खोद रहा था। शीला चाची ने अपनी टांगें समीर की कमर के चारों तरफ लपेट ली थीं ताकि वह और भी गहराई तक पहुँच सके। खुदाई की इस प्रक्रिया में दोनों का पसीना एक-दूसरे के जिस्म से मिल रहा था और कमरे की हवा कामुकता से भारी हो गई थी। समीर ने चाची को घुमाया और उन्हें पिछवाड़े से खोदना शुरू किया जिसे देखकर चाची का पिछवाड़ा और भी ज्यादा आकर्षक लग रहा था।
अंतिम क्षणों में समीर ने चाची को सामने से लेटाया और अपनी पूरी ताकत के साथ आखिरी कुछ प्रहार किए। शीला चाची का शरीर पूरी तरह से कांपने लगा था और उनकी खाई से रस छूटने लगा था। समीर का भी अब सब्र का बांध टूट गया और उसका सारा रस चाची की गहराई में निकल गया। दोनों एक-दूसरे की बाहों में ढह गए और उनकी सांसें सामान्य होने में काफी समय लगा। खुदाई के बाद की वह शांति और शरीर की वह थकावट एक अजीब सा सुकून दे रही थी। शीला चाची समीर के सीने पर सर रखकर लेटी थीं और उनकी आँखों में एक तृप्ति और गहरे प्यार की चमक थी जिसे समीर कभी नहीं भूल सकता था।