चाची की रसीली चु@@ई—>उस दोपहर की गर्मी कुछ अलग ही थी, जैसे सूरज की तपिश सीधे रूह को झुलसा देने पर आमादा हो। घर के सभी लोग शहर गए हुए थे और मैं, आर्यन, घर की साफ-सफाई के बहाने छत के कोने में बने उस पुराने स्टोर रूम में सीमा चाची की मदद कर रहा था। चाची की उम्र करीब पैंतीस साल रही होगी, लेकिन उनके शरीर की बनावट ऐसी थी कि कोई भी उन्हें देखकर अपनी सुध-बुध खो दे। उन्होंने एक पतली सी सूती साड़ी पहनी हुई थी, जो पसीने के कारण उनके शरीर से चिपकती जा रही थी। जैसे-जैसे वो पुराने डिब्बे हटा रही थीं, उनके शरीर का हर उभार मेरी आँखों के सामने एक नई कहानी लिख रहा था। उनके भारी भरकम तरबूज उस तंग ब्लाउज के अंदर जैसे कैद होने को छटपटा रहे थे और जब भी वो झुकतीं, उनके पीछे का भारी पिछवाड़ा साड़ी को और भी ज्यादा तंग कर देता था।
मैंने गौर किया कि चाची भी शायद उस गर्मी और मेरी उपस्थिति से बेखबर नहीं थीं। जब मैं भारी संदूक खिसकाने के लिए उनके करीब गया, तो उनके बदन से उठती हुई वो सोंधी सी महक और पसीने की खुशबू ने मेरे दिमाग में एक अजीब सी हलचल पैदा कर दी। उनके तरबूज मेरी बांहों से हल्के से टकराए और उस स्पर्श ने मेरे शरीर में बिजली सी दौड़ा दी। चाची ने एक लंबी आह भरी और अपने पसीने से लथपथ चेहरे को साड़ी के पल्लू से पोंछा। उस वक्त उनकी आँखों में एक अजीब सी चमक थी, जिसमें झिझक भी थी और एक अनकही प्यास भी। उनके चेहरे पर आई उस लाली ने मुझे अहसास कराया कि ये सिर्फ गर्मी का असर नहीं था, बल्कि हमारे बीच पनप रहे उस खिंचाव का नतीजा था जिसे हम दोनों ही अब तक दबाते आए थे।
स्टोर रूम की उस घुटन भरी शांति में सिर्फ हमारी सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी। मैंने हिम्मत जुटाकर अपना हाथ उनकी कमर पर रखा, जहाँ साड़ी थोड़ी खिसक गई थी। उनकी त्वचा मखमल की तरह नरम और पसीने से भीगी हुई थी। जैसे ही मेरी उँगलियों ने उनकी कमर को छुआ, वो कांप उठीं लेकिन उन्होंने मुझे रोका नहीं। उनकी सांसें तेज चलने लगीं और वो धीरे से मुड़कर मेरी ओर देखने लगीं। उनके भारी तरबूज अब मेरे सीने के बिल्कुल करीब थे और उन पर लगे दो छोटे मटर ब्लाउज के कपड़े को चीरकर बाहर आने को बेताब दिख रहे थे। हमारी आँखों का वो मौन संवाद किसी भी शब्द से कहीं ज्यादा गहरा था। उनके होंठ थरथरा रहे थे और उनकी आँखों में समर्पण का वो भाव देखकर मेरा संयम पूरी तरह से टूट गया।
मैंने धीरे से अपने हाथ ऊपर उठाए और उनके दोनों तरबूजों को अपनी हथेलियों में भर लिया। वो इतने बड़े और नरम थे कि मेरी हथेलियों से बाहर छलक रहे थे। चाची ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी कराह उनके गले से निकली। जैसे-जैसे मैं उन तरबूजों को सहला रहा था, उनकी पकड़ मेरी पीठ पर मजबूत होती गई। मैंने उनके ब्लाउज के हुक एक-एक करके खोले, तो वे दोनों गोरे और चमकदार तरबूज आज़ाद होकर बाहर आ गिरे। उन पर लगे वो गुलाबी मटर अब और भी ज्यादा सख्त हो चुके थे। मैंने झुककर एक मटर को अपने मुंह में लिया और उसे धीरे से सहलाने लगा। चाची की सिसकियाँ अब स्टोर रूम की दीवारों से टकराने लगी थीं। उन्होंने अपना सर पीछे की ओर झुका लिया और मेरा सिर अपने सीने में और जोर से दबा लिया।
मेरा हाथ अब उनकी साड़ी के नीचे सरकने लगा था, जहाँ उनकी रेशमी टांगों के बीच उस गहरी खाई का रास्ता था। जैसे ही मेरी उँगलियाँ उस खाई के करीब पहुँचीं, मुझे अहसास हुआ कि वो जगह पूरी तरह से गीली हो चुकी थी। वहाँ के घने काले बाल मेरे हाथों को एक अलग ही अहसास दे रहे थे। मैंने धीरे से अपनी उंगली से खोदना शुरू किया, तो चाची का शरीर धनुष की तरह तन गया। उनकी खाई से निकलता हुआ वो चिपचिपा रस मेरी उँगलियों को और भी गहराई तक जाने का रास्ता दे रहा था। वो बार-बार मेरा नाम पुकार रही थीं और कह रही थीं कि आज उन्हें कोई परवाह नहीं है। उनकी उस खाई चाटना शुरू किया तो वो पागलों की तरह छटपटाने लगीं। मेरा मुंह उनकी रसीली खाई में पूरी तरह डूबा हुआ था और वो अपने हाथों से मेरे बालों को खींच रही थीं।
अब मेरा सब्र जवाब दे चुका था। मैंने अपनी पैंट उतारी और मेरा फौलादी खीरा अब पूरी तरह से सीधा होकर उनकी आँखों के सामने था। चाची ने जब उस विशाल खीरे को देखा, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने झुककर उस खीरे को अपने दोनों हाथों में थामा और उसे अपने कोमल होंठों से स्पर्श किया। अगले ही पल, उन्होंने पूरा खीरा मुंह में ले लिया और उसे इतनी शिद्दत से चूसने लगीं कि मेरे पैरों के नीचे से जमीन खिसकने लगी। वो किसी माहिर खिलाड़ी की तरह उस खीरे को अपने गले तक उतार रही थीं। उनके मुंह की गर्मी और जीभ का वो अहसास मुझे चरम सीमा की ओर धकेल रहा था। मैंने उन्हें रोककर चटाई पर लिटाया और उनके पैरों को अपने कंधों पर रख लिया।
मैंने अपने खीरे की नोक को उनकी रसीली खाई के मुहाने पर टिकाया और एक जोरदार धक्का दिया। खाई तंग थी, लेकिन उनके रस ने रास्ता आसान कर दिया था। जैसे ही आधा खीरा अंदर गया, चाची ने चीखते हुए मुझे कसकर पकड़ लिया। मैंने रुक-रुक कर गहरे धक्के मारना शुरू किया। हर धक्के के साथ मेरे अंडकोष उनके पिछवाड़े से टकरा रहे थे, जिससे एक थप-थप की आवाज गूँज रही थी। सामने से खोदना इतना सुखद था कि हम दोनों ही सुध-बुध खो चुके थे। चाची की टांगे मेरी कमर के इर्द-गिर्द कस गई थीं और वो हर धक्के को गहराई तक महसूस कर रही थीं। उनके तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे, जो मेरी आँखों के लिए किसी उत्सव से कम नहीं थे। हम दोनों के शरीर पसीने से नहा चुके थे और वो पसीना हमारे मिलन को और भी ज्यादा फिसलन भरा बना रहा था।
कुछ देर बाद मैंने उन्हें घुमाया और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। इस स्थिति में उनके भारी पिछवाड़े का नजारा बहुत ही कामुक था। मैंने उनके दोनों हाथों को आगे की ओर फर्श पर टिका दिया और पीछे से अपने खीरे को उनकी खाई में उतार दिया। जैसे ही मैंने खुदाई की गति बढ़ाई, उनकी आहें और भी तेज हो गईं। हर धक्के के साथ उनके शरीर का कंपन बढ़ता जा रहा था। चाची अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थीं। वो चिल्ला रही थीं, “और तेज आर्यन, मुझे पूरी तरह से खोदो!” उनकी वो मांग मेरे भीतर की मर्दानगी को और भी ज्यादा उकसा रही थी। मैं पूरी ताकत से उनके पिछवाड़े से टकरा रहा था, जिससे उनके शरीर का मांस थरथरा रहा था।
अब चरम का समय करीब था। मेरी सांसें उखड़ने लगी थीं और उनके शरीर में भी तेज थरथराहट होने लगी थी। चाची ने पीछे मुड़कर मेरी आँखों में देखा और अचानक उनका पूरा शरीर जोर-जोर से कांपने लगा। उनकी खाई से भारी मात्रा में रस निकलना शुरू हो गया, जिसने मेरी खुदाई को और भी सुगम बना दिया। ठीक उसी पल, मैंने भी अपने सारे संयम खो दिए और मेरा सारा गरम रस उनकी खाई की गहराइयों में जाकर गिरने लगा। हम दोनों ही कुछ मिनटों तक उसी अवस्था में जुड़े रहे, जैसे वक्त थम गया हो। हमारे जिस्मों से उठता धुआं और हमारी भारी सांसें उस ऐतिहासिक मिलन की गवाह थीं।
सब कुछ शांत होने के बाद, चाची मेरे सीने से लगकर लेटी हुई थीं। उनकी आँखों में अब एक संतुष्टि और सुकून का भाव था। उन्होंने धीरे से मेरे माथे को चूमा और मुस्कुराते हुए साड़ी ठीक करने लगीं। स्टोर रूम की वो गर्मी अब हमें परेशान नहीं कर रही थी, क्योंकि हमारे भीतर की आग शांत हो चुकी थी। उस दिन के बाद से हमारे बीच एक ऐसा अटूट और गहरा रिश्ता बन गया, जिसे दुनिया की कोई भी दीवार नहीं तोड़ सकती थी। हम दोनों जानते थे कि ये सिर्फ शरीर का मिलन नहीं था, बल्कि दो अधूरी रूहों का एक-दूसरे को मुकम्मल करना था। उस कमरे से बाहर निकलते वक्त, चाची की चाल में एक अलग ही आत्मविश्वास और चेहरे पर एक नई चमक थी, जो हमारे उस गुप्त और रसीले मिलन की कहानी बयां कर रही थी।