
सफर की मदहोश रात और अजनबी का साथ —>
दिल्ली के बस अड्डे पर रात के ग्यारह बज रहे थे और वातानुकूलित स्लीपर बस मनाली के लिए तैयार खड़ी थी। रोहित ने अपनी सीट तलाशी, जो कि ऊपर की एक डबल स्लीपर बर्थ थी, जहाँ उसे पूरी रात गुजारनी थी। जैसे ही वह अपनी बर्थ पर पहुँचा, उसने देखा कि वहाँ पहले से ही एक महिला लेटी हुई थी, जिसने गहरे हरे रंग की रेशमी साड़ी पहन रखी थी। उसकी उम्र करीब बत्तीस साल रही होगी, लेकिन उसके शरीर की बनावट किसी को भी सम्मोहित करने के लिए काफी थी। उसके खुले बाल तकिए पर बिखरे हुए थे और उसकी बंद आँखों की लंबी पलकें उसके चेहरे पर एक रहस्यमयी मासूमियत बिखेर रही थीं। रोहित ने संकोच के साथ अपना बैग किनारे रखा और उसके बगल में अपनी जगह बनाने की कोशिश करने लगा, जिससे उसकी धड़कनें तेज होने लगी थीं।
बस ने अपनी रफ्तार पकड़ ली थी और बाहर की अंधेरी दुनिया पीछे छूटती जा रही थी, जबकि अंदर का माहौल धीरे-धीरे गर्म होने लगा था। रोहित की नजर बार-बार उस अजनबी महिला के शरीर पर जा रही थी, जिसकी साड़ी का पल्लू नींद के झोंकों में थोड़ा खिसक गया था। पल्लू खिसकने से उसके उभरे हुए विशाल तरबूज साफ झलक रहे थे, जो ब्लाउज के अंदर से बाहर आने को बेताब लग रहे थे। रोहित ने गौर किया कि बस के हिलने के साथ ही वे तरबूज भी ऊपर-नीचे हो रहे थे, जिससे ब्लाउज के कपड़े पर एक अजीब सा तनाव पैदा हो रहा था। उन तरबूजों के बीच की गहरी घाटी रोहित की नजरों को अपनी ओर खींच रही थी और वह अपनी उत्तेजना को काबू करने की नाकाम कोशिश कर रहा था।
कुछ देर बाद बस एक बड़े गड्ढे से गुजरी, जिससे एक जोरदार झटका लगा और वह महिला हड़बड़ाकर जाग गई। उसकी आँखें खुलीं और उसने अपने सामने एक युवक को इतनी करीब पाकर अपनी साड़ी संभालने की कोशिश की, लेकिन रोहित की नजरें उसके चेहरे पर टिक गई थीं। उसने अपना नाम मीरा बताया और बातचीत का सिलसिला धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगा, जिसमें एक अनकही कशिश महसूस हो रही थी। मीरा की आवाज में एक गजब की मिठास थी, जो रोहित के कानों में शहद की तरह घुल रही थी। बातों-बातों में उनके बीच का संकोच कम होने लगा और वे एक-दूसरे के बारे में जानने लगे, जिससे माहौल में एक भावनात्मक जुड़ाव का जन्म होने लगा था।
मीरा ने महसूस किया कि रोहित की नजरें उसके शरीर के उतार-चढ़ाव का पीछा कर रही हैं, लेकिन उसने उसे टोका नहीं, बल्कि अपनी आँखों से उसे मूक सहमति दे दी। बस की हल्की रोशनी में रोहित ने देखा कि मीरा के उन तरबूजों के ऊपरी हिस्सों पर छोटे-छोटे मटर की तरह उभार साफ नजर आ रहे थे, जो शायद ठंड या बढ़ती उत्तेजना की वजह से सख्त हो गए थे। रोहित का मन हुआ कि वह अपनी उंगलियों से उन मटर जैसे निशानों को छुए, लेकिन मर्यादा और झिझक उसे रोके हुए थी। मीरा की सांसें अब तेज चलने लगी थीं और उसके सीने का उतार-चढ़ाव रोहित के दिल की धड़कन बढ़ा रहा था, जिससे दोनों के बीच एक अदृश्य ऊर्जा का संचार हो रहा था।
तभी अचानक बस की लाइटें बंद हो गईं और चारों ओर अंधेरा छा गया, बस खिड़की से आती चाँदनी की हल्की रोशनी ही अंदर आ रही थी। रोहित ने हिम्मत जुटाई और अपना हाथ धीरे से मीरा की कमर पर रखा, जहाँ साड़ी और ब्लाउज के बीच का मखमली हिस्सा खाली था। मीरा के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई, उसने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक लंबी आह भरी, जिससे रोहित का हौसला बढ़ गया। उसने अपनी उंगलियों को मीरा की पीठ पर धीरे-धीरे फिराना शुरू किया, जिससे उसे मीरा के बदन की तपिश महसूस होने लगी। मीरा ने विरोध करने के बजाय अपनी देह को रोहित की तरफ थोड़ा और झुका दिया, जो इस बात का संकेत था कि वह भी इस स्पर्श की प्यासी थी।
रोहित ने धीरे से मीरा के चेहरे को अपने हाथों में लिया और उसके गुलाबी होठों का रस पीना शुरू कर दिया, जिसे मीरा ने बड़े ही चाव से स्वीकार किया। उनके होठों का यह मिलन इतना गहरा और भावुक था कि दोनों को दुनिया की सुध-बुध नहीं रही, बस एक-दूसरे की सांसों का शोर सुनाई दे रहा था। मीरा के हाथ रोहित के बालों में उलझ गए और वह उसे अपनी ओर और जोर से खींचने लगी, जैसे वह उसे खुद में समा लेना चाहती हो। इस चुंबन के दौरान रोहित का हाथ नीचे गया और उसने मीरा के उन विशाल तरबूजों को अपने हाथों में भर लिया, जो अब और भी ज्यादा सख्त और गरम महसूस हो रहे थे।
मीरा के मुँह से सिसकारियां निकलने लगीं जब रोहित ने अपनी उंगलियों से उन मटर जैसे उभारों को धीरे-धीरे सहलाना और दबाना शुरू किया। वह दर्द और आनंद के एक अनोखे संगम में डूबी जा रही थी, और उसका हाथ रोहित की पैंट के ऊपर उस जगह पहुँचा जहाँ उसका खीरा अब पूरी तरह से अकड़ चुका था। मीरा ने पैंट के ऊपर से ही उस भारी और सख्त खीरे को अपनी मुट्ठी में भींचा, जिससे रोहित के मुँह से एक मदहोश कर देने वाली कराह निकल गई। दोनों की बेताबी अब चरम सीमा पर पहुँच चुकी थी और अब वे और इंतजार करने की स्थिति में नहीं थे, क्योंकि उनके शरीर एक-दूसरे की आग में जल रहे थे।
रोहित ने बड़ी फुर्ती से मीरा की साड़ी को नीचे से ऊपर सरकाया और उसके पैरों के बीच की उस रहस्यमयी खाई तक अपना रास्ता बना लिया। उस खाई के आसपास उगे हुए रेशमी बाल रोहित की उंगलियों को सहला रहे थे, और वह खाई अब पूरी तरह से गीली और लिसलिसी हो चुकी थी। रोहित ने अपनी एक उंगली को धीरे से उस खाई के अंदर उतारा, जिससे मीरा ने अपनी पीठ ऊपर की ओर उचका दी और उसकी आँखों से खुशी के आंसू छलक पड़े। वह अपनी उंगली से उस खाई के अंदरूनी हिस्सों को खोदने लगा, जिससे निकलने वाला रस रोहित के हाथों को और भी ज्यादा चिकना बना रहा था, और मीरा बस जोर-जोर से हांफ रही थी।
अब समय आ गया था कि वह अपनी प्यास बुझाए, इसलिए रोहित ने अपने कपड़े उतारे और अपने लंबे और मोटे खीरे को मीरा के सामने पेश किया। मीरा ने बिना देरी किए उस खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे बड़े ही प्यार से चूसने लगी, जैसे वह दुनिया की सबसे स्वादिष्ट चीज हो। उसके मुँह की गर्मी और जीभ का स्पर्श पाकर रोहित का खीरा और भी ज्यादा फूल गया और वह रस छोड़ने के करीब पहुँचने लगा। मीरा ने पूरी गहराई के साथ उस खीरे को अंदर तक लिया, जिससे रोहित का पूरा शरीर थरथराने लगा और वह मीरा के समर्पण को देखकर दंग रह गया।
अंततः, रोहित ने मीरा को सीधा लेटाया और सामने से खुदाई शुरू करने के लिए खुद को तैयार किया, उसका खीरा अब मीरा की खाई के मुहाने पर टिका हुआ था। जैसे ही उसने एक जोरदार धक्का दिया, उसका पूरा खीरा मीरा की तंग खाई के अंदर समा गया, जिससे मीरा के मुँह से एक लंबी और तीखी चीख निकली। वह दर्द शुरुआती था, जो जल्द ही बेपनाह आनंद में बदल गया क्योंकि रोहित ने अपनी लय बनानी शुरू कर दी थी। वह पूरी ताकत के साथ मीरा को खोदने लगा, और हर धक्के के साथ मीरा के तरबूज हवा में उछल रहे थे, जिन्हें रोहित कभी अपने हाथों से मरोड़ता तो कभी अपने मुँह में भर लेता।
खुदाई की यह प्रक्रिया बहुत ही गहन और लंबी चली, जहाँ दोनों के शरीर पसीने से तरबतर हो चुके थे और बस के उस छोटे से केबिन में उनकी शारीरिक क्रियाओं की आवाजें गूँज रही थीं। मीरा ने रोहित को अपने पैरों से कसकर जकड़ लिया था ताकि वह और भी गहराई तक खुदाई कर सके, और रोहित भी कोई कसर नहीं छोड़ रहा था। वह कभी पिछवाड़े से खोदने के लिए उसे पलट देता, तो कभी उसे अपने ऊपर बिठाकर खुद खुदाई का आनंद लेता, जिससे मीरा का पूरा बदन कांपने लगता था। उनके बीच के डाइलोग्स भी अब काफी उत्तेजक हो चले थे, मीरा बार-बार रोहित से कह रही थी कि ‘मुझे और गहराई से खोदो, आज मेरा सारा रस निकाल दो’ जिसे सुनकर रोहित का जोश दुगना हो जाता था।
काफी देर तक चली इस जबरदस्त खुदाई के बाद, वह पल आया जब दोनों का रस छूटने लगा और वे एक-दूसरे के शरीर में समा गए। रोहित ने अपना सारा गर्म रस मीरा की उस गहरी खाई के अंदर ही खाली कर दिया, जिससे मीरा को एक असीम शांति और संतुष्टि का अनुभव हुआ। उसका पूरा बदन ढीला पड़ गया और वह रोहित की बाहों में सिमट गई, उसकी सांसें अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं लेकिन दिल की धड़कन अभी भी तेज थी। उस रस के निकलने के बाद की जो फिलिंग थी, वह शब्दों में बयान करना मुश्किल था, क्योंकि उसमें सिर्फ शारीरिक सुख नहीं बल्कि एक भावनात्मक सुकून भी शामिल था।
अगली सुबह जब बस मनाली पहुँची, तो दोनों की आँखों में एक-दूसरे के लिए एक नई चमक और सम्मान था, जैसे वे अजनबी से बहुत करीब आ गए हों। मीरा की हालत अभी भी थोड़ी सुस्त थी, उसके शरीर के अंगों में उस खुदाई की मीठी सी जलन और भारीपन महसूस हो रहा था, जो उसे रात के उन हसीन पलों की याद दिला रहा था। रोहित ने उसे उतरने में मदद की और उन दोनों ने एक-दूसरे को आखिरी बार गले लगाया, यह जानते हुए कि यह सफर भले ही खत्म हो गया है, लेकिन इसकी यादें उनके दिलों में हमेशा के लिए अंकित हो गई हैं। वह सुबह की ठंडी हवा उनके चेहरों को सहला रही थी, और वे दोनों अपने-अपने रास्तों पर निकल पड़े, लेकिन उनके अंदर की वह आग अब एक शांत और सुखद एहसास में बदल चुकी थी।