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दर्जी की पैमाइश और रेशमी अहसास

दोपहर की सुनहरी और तीखी धूप निशा के आलीशान ड्राइंग रूम की बड़ी सी खिड़की से छनकर आ रही थी, जिससे कमरे का कोना-कोना चमक रहा था। वह अपने नए वैवाहिक घर में अकेली थी और आज उसे अपने कुछ बेहद खास और कीमती कपड़ों की फिटिंग करानी थी। समीर, जो शहर का सबसे आधुनिक और जवान दर्जी माना जाता था, समय का पाबंद था और ठीक दोपहर के डेढ़ बजे उसके दरवाजे पर खड़ा था। समीर की उम्र लगभग 28 साल थी, उसका रंग गेंहुआ था और उसकी कद-काठी किसी कसरती खिलाड़ी की तरह सुडौल और आकर्षक थी। जब उसने घंटी बजाई, तो निशा का दिल एक अनजानी घबराहट और रोमांच से तेजी से धड़कने लगा। उसने एक बहुत ही झीनी और नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी, जो उसके शरीर के हर उतार-चढ़ाव को बड़ी ही खूबसूरती से नुमाया कर रही थी। समीर ने जैसे ही अंदर कदम रखा, दोनों की नजरें एक-दूसरे से टकराईं और हवा में एक अजीब सा तनाव फैल गया, जिसे दोनों ही महसूस कर सकते थे।

निशा की उम्र अभी महज 24 साल थी और उसकी शारीरिक बनावट किसी कामुक मूर्ति की तरह थी जिसे कुदरत ने बड़े ही फुर्सत से तराशा हो। उसकी साड़ी के पतले कपड़े के नीचे दबे हुए उसके भारी और रसीले तरबूज हर लंबी सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे, जिनकी गोलाई और उभार समीर की अनुभवी नजरों को अपनी ओर खींच रहे थे। समीर की चौड़ी छाती और उसकी मजबूत बाहें निशा को एक अजीब सी सुरक्षा और साथ ही साथ एक दबी हुई उत्तेजना का अहसास दे रही थीं। समीर ने अपना बैग खोला और उसमें से इंची-टेप निकाला, उसकी उंगलियां लंबी और साफ थीं। जब वह निशा के करीब आया, तो उसके शरीर से आने वाली हल्की परफ्यूम और पसीने की खुशबू ने निशा के दिमाग को सुन्न करना शुरू कर दिया। उसने निशा के कंधों का माप लेना शुरू किया, और जैसे ही उसकी उंगलियों का स्पर्श निशा की मखमली और गोरी त्वचा पर हुआ, निशा के शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ गई। उसने अपनी आँखें धीरे से बंद कर लीं और एक गहरी, कांपती हुई साँस भरी।

जैसे-जैसे समीर अपनी पैमाइश का काम आगे बढ़ा रहा था, कमरे का तापमान जैसे बढ़ने लगा था और दोनों के बीच की दूरी कम होती जा रही थी। जब वह कमर का माप लेने के लिए नीचे झुका, तो उसकी सांसों की गर्मी निशा की नाभि के पास महसूस हो रही थी। इंची-टेप को जब उसने निशा के रसीले तरबूजों के ऊपर से घुमाया, तो समीर का हाथ जानबूझकर या गलती से उन कोमल उभारों से पूरी तरह रगड़ खा गया। निशा के मुंह से एक धीमी सी सिसकी निकली और उसने अनजाने में समीर के कंधे पर अपना हाथ रख दिया, उसे दूर करने के लिए नहीं बल्कि शायद खुद को संभालने के लिए। समीर ने ऊपर देखा और पाया कि निशा की आंखों में प्यास की एक गहरी झलक थी। साड़ी के पतले कपड़े के ऊपर से ही निशा के तरबूजों पर मौजूद छोटे-छोटे मटर अब पूरी तरह सख्त होकर अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे। समीर ने माप लेना बंद कर दिया और अपना हाथ धीरे से निशा के गाल पर रखा, उसकी उंगलियां उसके कान के पीछे सहलाने लगीं।

समीर ने अब और देरी नहीं की और अपनी उंगलियों को निशा की सुराहीदार गर्दन से नीचे की ओर सरकाना शुरू किया। उसने बहुत ही नजाकत से उसकी साड़ी का पल्लू उसके गोरे कंधे से नीचे गिरा दिया। निशा ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि उसकी गर्दन एक तरफ झुक गई जिससे समीर को वहां अपना चेहरा ले जाने का पूरा रास्ता मिल गया। समीर ने अपनी जुबान से निशा की गर्दन का मीठा शहद चखना शुरू किया, जिससे निशा के पूरे शरीर में एक सिहरन दौड़ गई और उसके गले से एक मदहोश कर देने वाली कराह निकली। समीर की उंगलियां अब धीरे-धीरे नीचे की ओर बढ़ रही थीं और निशा की कमर के घेरे को पार करते हुए उसकी रेशमी पेटीकोट के अंदर जाने का रास्ता तलाशने लगीं। वहां, कपड़ों की परतों के नीचे छिपी उसकी गहरी और गीली खाई पूरी तरह से समीर के स्पर्श का इंतजार कर रही थी। निशा ने समीर की टी-शर्ट के ऊपर से ही उसके हाथ को पकड़ लिया और उसे अपनी गहराई की ओर ले जाने लगी।

निशा अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थी और उसने समीर को खींचकर पास ही मौजूद नरम बिस्तर पर गिरा दिया। समीर ने तेजी से अपने कपड़े उतारे और उसका विशाल, सख्त और गर्म खीरा पूरी ताकत के साथ बाहर निकल आया। जब निशा की नजरें उस लंबे और रफ-टफ खीरे पर पड़ीं, तो उसकी आंखों की चमक और बढ़ गई और उसके नीचे की खाई से रस बहने लगा। निशा ने अपने घुटनों के बल बैठकर उस खीरे को अपनी दोनों हथेलियों में लिया और उसे बड़े प्यार से सहलाने लगी। समीर इस सुखद अहसास से अपनी आँखें मीचकर आहें भर रहा था। फिर निशा ने अपनी जीभ से उस खीरे के ऊपरी हिस्से को चाटा और उसे धीरे-धीरे अपने मुंह के अंदर समाने लगी। वह उस खीरे को इतनी गहराई से चूस रही थी जैसे वह दुनिया का सबसे रसीला फल हो। समीर के हाथ निशा के रेशमी बालों में उलझे हुए थे और वह उसे बार-बार अपने करीब खींच रहा था, जिससे कमरे में सिसकियों का शोर बढ़ गया था।

अब समीर से और इंतजार नहीं हो रहा था, उसने निशा को सीधा लेटाया और उसकी दोनों टांगों को अपने कंधों पर रख लिया। उसने अपने खीरे को निशा की रसीली और तंग खाई के मुहाने पर टिकाया और एक गहरा दबाव बनाया। जैसे ही आधा खीरा उस गीली खाई के अंदर समाया, निशा ने समीर की बाहों को कसकर पकड़ लिया और उसके मुंह से ‘आह्ह्ह…’ की एक लंबी और गहरी आवाज निकली। समीर ने अब सामने से खोदना शुरू कर दिया, उसके हर धक्के के साथ खीरा पूरी तरह से खाई की गहराइयों को छूकर वापस आ रहा था। निशा की खाई अब पूरी तरह से चिकनी हो चुकी थी और हर बार अंदर-बाहर होने पर एक सोंधी सी आवाज कमरे में गूँज रही थी। समीर ने निशा के तरबूजों को अपने हाथों में भरकर उन्हें बुरी तरह मसलना शुरू किया, जिससे निशा का दर्द और आनंद चरम पर पहुँच गया। वह समीर के साथ ताल से ताल मिला रही थी और अपने पिछवाड़े को ऊपर उठाकर हर धक्के का स्वागत कर रही थी।

खुदाई की रफ्तार अब अपने चरम पर पहुँच चुकी थी, समीर ने अब निशा को पलटा और उसे घुटनों के बल करके पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। यह स्थिति निशा को पागल कर रही थी क्योंकि समीर का खीरा अब उसकी गहराई के एक नए कोने को छू रहा था। समीर के थपेड़ों की आवाज अब और तेज हो गई थी और निशा का शरीर पसीने से नहा चुका था। अचानक निशा का पूरा बदन कांपने लगा, उसने अपने दांतों से तकिए को दबा लिया और उसकी खाई से रसीला सैलाब उमड़ पड़ा। उसी पल, समीर का खीरा भी पूरी तरह अकड़ गया और उसने अपना सारा गर्म और गाढ़ा रस निशा की खाई की सबसे गहरी दीवारों पर छोड़ दिया। दोनों ही निढाल होकर एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े, उनकी सांसें एक-दूसरे से टकरा रही थीं। निशा के चेहरे पर एक गजब की शांति और तृप्ति थी, और समीर उसे बाहों में भरकर उस रेशमी दोपहर की यादों को अपने दिल में सहेज रहा था।

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