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दोपहर की मदहोश तपन और चची की रेशमी खाई

दोपहर का वक्त था और सूरज अपनी पूरी तपिश बिखेर रहा था, लेकिन घर के भीतर सन्नाटा पसरा हुआ था। सुनीता चची, जो करीब अड़तीस साल की थीं, अपने कमरे में पंखे की धीमी हवा में लेटी हुई थीं। उनकी देह किसी ढली हुई मूरत जैसी थी, जिसमें भरे हुए तरबूज उनकी सूती साड़ी के भीतर से अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे। उनकी उम्र ने उनके जिस्म को एक अलग ही ढलान और कसावट दी थी, जिसे देखकर मेरा चौबीस साल का युवा मन अक्सर बेचैन हो जाता था। उनके भारी तरबूज जब भी उनकी सांसों के साथ ऊपर-नीचे होते, तो मेरा मन करता कि बस उन्हें निहारता रहूँ।

मेरा नाम रोहित है और मैं गर्मियों की छुट्टियां बिताने शहर से गाँव आया हुआ था। चची का व्यक्तित्व बहुत ही शांत था, लेकिन उनकी आँखों में एक अजीब सी प्यास झलकती थी जो शायद चाचा के शहर में काम करने की वजह से अधूरी रह गई थी। उनके चौड़े पिछवाड़े और सुडौल बदन को देखकर मेरे पेंट के भीतर मेरा सख्त खीरा बार-बार विद्रोह करने लगता था। उस दिन जब मैं उनके कमरे के पास से गुजरा, तो दरवाजा आधा खुला था। वह गहरी नींद में थीं और उनकी साड़ी थोड़ी सरक गई थी, जिससे उनके पेट का गोरा हिस्सा और कमर की गहराई साफ़ दिखाई दे रही थी।

मैंने अपनी धड़कनों को काबू में करने की कोशिश की, लेकिन मेरा मन मुझे अंदर खींच ले गया। मैं धीरे से उनके बिस्तर के पास बैठा और उनकी सुराही जैसी गर्दन को देखने लगा। हमारे बीच हमेशा से एक सम्मान का रिश्ता था, लेकिन उस दोपहर की खामोशी ने उस सम्मान की दीवार को भावनाओं के सैलाब में बदल दिया था। मैंने धीरे से अपना हाथ उनके पैरों की तरफ बढ़ाया। उनकी त्वचा रेशम की तरह मुलायम थी। जैसे ही मेरा स्पर्श उन्हें महसूस हुआ, उन्होंने अपनी आँखें खोलीं, लेकिन उनमें कोई गुस्सा नहीं था, बल्कि एक गहरी स्वीकृति और दबी हुई चाहत की चमक थी।

उन्होंने धीमे से मुस्कुराते हुए मेरा हाथ पकड़ लिया और उसे अपने उभरे हुए तरबूज की ओर ले गईं। उस पल सारी झिझक मिट गई। मैंने अपनी उंगलियों से उनके तरबूज के ऊपर उभरे हुए छोटे-छोटे मटर को सहलाना शुरू किया। चची के मुँह से एक हल्की आह निकली, जो कमरे की शांति को चीरती हुई मेरे कानों तक पहुँची। वह मटर अब पूरी तरह सख्त हो चुके थे, जो उनकी उत्तेजना की गवाही दे रहे थे। मैंने झुककर उनके तरबूज के बीच की घाटी में अपना चेहरा छिपा लिया और उनकी भीनी-भीनी खुशबू को अपनी सांसों में भरने लगा।

अब माहौल पूरी तरह से गर्मा चुका था। चची ने मेरे कपड़ों को उतारने में मेरी मदद की और जब मेरा लंबा और तना हुआ खीरा उनके सामने आया, तो उनकी आँखें फटी की फटी रह गई। उन्होंने अपने कोमल हाथों से मेरे खीरा को थामा और उसे सहलाने लगीं। मुझे ऐसा लगा जैसे स्वर्ग मिल गया हो। उन्होंने धीरे से अपना मुँह खोला और मेरे खीरा को चूसना शुरू किया। उनकी जीभ का वह स्पर्श और मुँह की गर्माहट ने मुझे पागल कर दिया। मैं उनके बालों में अपनी उंगलियां फँसाकर उन्हें अपनी ओर खींचने लगा और वह पूरी शिद्दत से मेरे खीरा का रस लेने में जुट गईं।

कुछ ही देर में चची ने अपनी साड़ी उतार फेंकी और अब वह पूरी तरह प्राकृतिक अवस्था में थीं। उनकी टांगों के बीच की खाई पूरी तरह से नम हो चुकी थी। मैंने अपनी उंगली से उनकी खाई को टटोलना शुरू किया। वहां मौजूद घने बाल मेरे हाथों को गुदगुदा रहे थे। जैसे ही मेरी उंगली उनकी खाई के भीतर गई, उन्होंने अपनी कमर ऊपर उठाई और जोर-जोर से कराहने लगीं। मैंने अपनी उंगली से खुदाई जारी रखी, जिससे उनकी खाई से रस निकलने लगा था। वह अब और ज्यादा प्यासी लग रही थीं और उन्होंने मुझे अपने ऊपर आने का इशारा किया।

मैंने उन्हें बिस्तर पर सीधा लिटाया और उनके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। यह सामने से खुदाई (मिशनरी) की स्थिति थी। मैंने अपने सख्त खीरा की नोक को उनकी गीली खाई के द्वार पर रखा। जैसे ही मैंने धीरे से दबाव डाला, मेरा आधा खीरा उनकी तंग खाई के भीतर समा गया। चची ने जोर से मेरा कंधा पकड़ लिया और उनके मुँह से एक लंबी सिसकारी निकली। मैंने धीरे-धीरे अपनी गति बढ़ाई और पूरा खीरा उनकी गहराई तक उतार दिया। हर धक्के के साथ उनके तरबूज बुरी तरह उछल रहे थे और उनके मटर बार-बार मेरी छाती से टकरा रहे थे।

कमरे में केवल हमारे शरीरों के टकराने की आवाज और चची की सिसकारियां गूँज रही थीं। खुदाई अब अपने चरम पर थी। मैंने उन्हें घुमाया और पिछवाड़े से खोदने (डॉगी स्टाइल) की मुद्रा में ले आया। उनके भारी पिछवाड़े को पीछे से थामकर जब मैंने अपना खीरा उनकी खाई में डाला, तो वह पूरी तरह बेकाबू हो गईं। वह बेड की चादर को अपने हाथों से भींच रही थीं। मेरे खीरा का हर प्रहार उनकी खाई की गहराई को नाप रहा था। हम दोनों पसीने में नहा चुके थे और हमारी सांसें तेज चल रही थीं। चची बार-बार कह रही थीं, ‘रोहित, और जोर से… मुझे पूरी तरह खोद डालो।’

अंत में, जब मुझे लगा कि मेरा रस निकलने वाला है, मैंने अपनी गति और तेज कर दी। चची का पूरा बदन कांपने लगा और उनकी खाई ने मेरे खीरा को जोर से जकड़ लिया। अगले ही पल, उनके भीतर से गर्म रस का फव्वारा छूटा और साथ ही मेरा खीरा भी उनके भीतर अपना सारा रस छोड़ गया। हम दोनों निढाल होकर एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े। उस चरम सुख के बाद चची की हालत देखने लायक थी; उनकी आँखें आधी बंद थीं और चेहरे पर एक असीम संतुष्टि का भाव था। वह मेरे सीने पर सिर रखकर लंबी सांसें ले रही थीं, जैसे सदियों की प्यास बुझ गई हो।

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