नेहा को इस नए शहर में आए अभी मुश्किल से एक हफ्ता ही हुआ था। उसका पति एक प्राइवेट बैंक में मैनेजर था और सुबह जल्दी निकल जाता था, जिससे नेहा सारा दिन घर में अकेली और ऊब महसूस करती थी। नेहा की उम्र करीब सत्ताइस साल थी, और उसका शरीर किसी तराशी हुई मूरत जैसा था। उसके शरीर के हर अंग में एक अजीब सी मादकता थी, विशेषकर उसके भारी और उभरे हुए तरबूज जो उसकी साड़ी के ब्लाउज को चीर कर बाहर आने को बेताब रहते थे। उसका पिछवाड़ा भी काफी भरा हुआ और गोल था, जो चलते समय एक अलग ही ताल में हिलता था। वह जब भी अपनी बालकनी में खड़ी होती, तो आसपास के लोगों की नजरें अनायास ही उसकी ओर खिंची चली आती थीं। नेहा को अपनी खूबसूरती का अंदाजा था, लेकिन पति की व्यस्तता ने उसके भीतर की कामुक इच्छाओं को जैसे एक शांत ज्वालामुखी बना दिया था जो बस फटने का इंतजार कर रहा था।
उसी बिल्डिंग के बगल वाले फ्लैट में समीर रहता था, जो एक जिम ट्रेनर था और जिसकी कद-काठी देखकर ही किसी भी स्त्री का मन डोल जाए। समीर की उम्र लगभग तीस साल थी, उसका रंग गेंहुआ और शरीर कसरती था। उसके चौड़े कंधे और तनी हुई छाती उसकी मर्दानगी का अहसास कराती थी। एक शाम जब नेहा अपनी बालकनी में कपड़े सुखा रही थी, तब समीर की नजर उस पर पड़ी। नेहा ने उस वक्त एक पतली पारदर्शी साड़ी पहनी थी, जिसमें से उसके तरबूज साफ झलक रहे थे और उनके ऊपर उभरे हुए छोटे-छोटे मटर साफ दिखाई दे रहे थे क्योंकि शाम की ठंडी हवा ने उन्हें सख्त कर दिया था। समीर उसे बस देखता ही रह गया, और नेहा ने भी जब उसकी आंखों में वह भूखी चमक देखी, तो उसके शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। उसे पहली बार महसूस हुआ कि कोई उसे कितनी शिद्दत से चाह रहा है।
अगले दिन दोपहर के समय, जब पूरी बिल्डिंग में सन्नाटा था, समीर ने नेहा के दरवाजे की घंटी बजाई। नेहा ने दरवाजा खोला, तो सामने समीर को खड़ा पाया। उसने बहाना बनाया कि उसे थोड़ी चीनी चाहिए। नेहा उसे अंदर बुलाने से खुद को रोक नहीं पाई। जैसे ही समीर रसोई में दाखिल हुआ, नेहा को उसके शरीर की महक और उसकी गर्मी महसूस होने लगी। नेहा जब चीनी का डिब्बा उतारने के लिए ऊपर उचकी, तो उसकी साड़ी का पल्लू नीचे गिर गया और उसके भरे हुए तरबूज समीर की आंखों के ठीक सामने आ गए। समीर की सांसें तेज हो गईं और उसने बिना सोचे समझे नेहा की कमर पर हाथ रख दिया। वह स्पर्श इतना बिजली जैसा था कि नेहा के मुंह से एक हल्की सी कराह निकल गई। नेहा ने मुड़कर देखा, उसकी आंखों में झिझक थी, लेकिन शरीर की प्यास उस झिझक पर भारी पड़ रही थी।
समीर ने धीरे से नेहा को अपनी ओर खींचा और उसके होंठों पर अपने होंठ रख दिए। नेहा ने पहले तो थोड़ा विरोध किया, लेकिन जल्द ही वह समीर की बाहों में पिघलने लगी। समीर के हाथ नेहा की पीठ पर रेंगते हुए उसके गोल पिछवाड़े तक जा पहुंचे और उसे जोर से भींचने लगे। नेहा की सिसकारियां अब कमरे की दीवारों में गूंजने लगी थीं। समीर ने नेहा को उठाकर पास के सोफे पर लिटा दिया और उसकी साड़ी के बंधनों को एक-एक करके खोलने लगा। जब नेहा पूरी तरह से निर्वस्त्र हुई, तो समीर उसे देखता ही रह गया। उसके गोरे बदन पर काले बाल एक अलग ही कंट्रास्ट पैदा कर रहे थे। समीर ने झुककर नेहा के तरबूजों को अपने मुंह में भर लिया और उनके मटर जैसे सिरों को अपनी जीभ से सहलाने लगा। नेहा का पूरा शरीर धनुष की तरह तन गया था और वह अपने पैरों को समीर की कमर के चारों ओर लपेटने लगी थी।
नेहा की सांसें अब अनियंत्रित हो चुकी थीं और उसकी खाई अब पूरी तरह से गीली और रसदार हो गई थी। समीर ने अपनी उंगलियों से उस खाई की गहराई को मापना शुरू किया, तो नेहा के मुंह से बेतहाशा आहें निकलने लगीं। समीर ने अपने कपड़े उतारे और उसका विशाल और सख्त खीरा पूरी शान से बाहर निकल आया। नेहा ने जब उस खीरे को देखा, तो उसकी आंखें फटी की फटी रह गई थीं, वह इतना लंबा और मोटा था कि उसे देखकर ही नेहा के अंदर एक मीठा सा दर्द होने लगा। समीर ने नेहा के चेहरे पर प्यार बरसाया और फिर धीरे से अपने खीरे को उसकी खाई के मुहाने पर रखा। नेहा ने अपनी आंखें बंद कर लीं और समीर ने एक जोरदार धक्का दिया, जिससे वह खीरा आधा नेहा की खाई के भीतर समा गया। नेहा के गले से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द और आनंद का एक अद्भुत मिश्रण था।
खुदाई की प्रक्रिया अब अपनी पूरी रफ़्तार पकड़ने लगी थी। समीर ने नेहा की टांगों को अपने कंधों पर रख लिया और तेजी से अंदर-बाहर होने लगा। हर बार जब वह गहरा धक्का मारता, तो उसका खीरा नेहा की खाई की दीवारों को रगड़ते हुए अंदर तक जाता, जिससे नेहा का पूरा शरीर कांप उठता। नेहा के हाथों की उंगलियां समीर की पीठ में गड़ गई थीं और वह बार-बार कह रही थी, “और जोर से… समीर, मुझे और खोदो… मुझे खत्म कर दो!” समीर का जोश भी बढ़ता जा रहा था, उसके शरीर का पसीना नेहा के बदन पर गिर रहा था, जिससे दोनों के शरीर आपस में चिपक रहे थे। कमरे में केवल उनके शरीरों के टकराने की आवाज़ और भारी सांसें सुनाई दे रही थीं। समीर ने अब नेहा को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने की मुद्रा में ले आया, जहां से खुदाई का मजा और भी बढ़ गया था।
नेहा का पिछवाड़ा समीर के धक्कों के साथ ताल मिला रहा था, और समीर ने पीछे से उसके तरबूजों को मजबूती से पकड़ रखा था। अब दोनों ही अपनी चरम सीमा के करीब थे। नेहा की खाई से अब बहुत सारा रस निकलने लगा था, जो समीर के खीरे को और भी चिकना बना रहा था। अंत में, समीर ने नेहा को अपनी ओर पलटा और मिशनरी स्टाइल में सामने से खोदना शुरू किया। उसकी रफ़्तार अब पागलों जैसी थी। अचानक नेहा का पूरा शरीर अकड़ गया और उसकी आंखों के सामने अंधेरा छा गया, उसकी खाई से रस का फव्वारा छूट पड़ा। उसी पल समीर ने भी अपना सारा गर्म रस नेहा की गहराईयों में छोड़ दिया। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बिस्तर पर गिर पड़े, उनकी धड़कनें एक-दूसरे को सुनाई दे रही थीं। नेहा को ऐसा लग रहा था जैसे वह किसी दूसरी दुनिया से लौटकर आई हो, उसके चेहरे पर एक सुकून और थकावट भरी मुस्कान थी।
कुछ देर बाद जब दोनों की सांसें सामान्य हुईं, तो कमरे में एक अलग ही सुकून भरा सन्नाटा छा गया। नेहा ने अपना सिर समीर की चौड़ी छाती पर रख दिया और समीर उसके बालों को सहलाने लगा। नेहा को अब अपनी उस झिझक पर हंसी आ रही थी जो उसे पहले महसूस हो रही थी। उसे लग रहा था कि आज उसे वह तृप्ति मिली है जिसकी उसे बरसों से तलाश थी। समीर ने उसके माथे को चूमा और धीरे से कहा, “तुम बहुत सुंदर हो नेहा, और यह तो बस शुरुआत है।” नेहा ने उसकी आंखों में देखा और उसे समझ आ गया कि अब उसके अकेलेपन के दिन खत्म हो चुके हैं। वे दोनों जानते थे कि यह रिश्ता अब सिर्फ एक जिस्मानी जरूरत नहीं, बल्कि एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव बन चुका था, जो उन्हें बार-बार एक-दूसरे की बाहों में खींचेगा।