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शिखा की दफ्तर वाली चुदाई

दफ्तर की घड़ी में रात के दस बज चुके थे और पूरी बिल्डिंग में सन्नाटा पसरा हुआ था लेकिन शिखा के केबिन की लाइट अब भी जल रही थी। शिखा जो कि इस कंपनी की जनरल मैनेजर थी अपनी उम्र के बत्तीसवें पड़ाव पर एक ऐसी सुडौल काया की मालकिन थी जिसे देखकर किसी भी मर्द का ईमान डोल जाए। उसने उस रात एक गहरे नीले रंग की रेशमी साड़ी पहनी हुई थी जो उसके शरीर के हर उतार-चढ़ाव को बड़ी ही बेबाकी से बयां कर रही थी। उसका रंग गोरा था और चेहरे पर एक अलग ही तेज था लेकिन उसकी आँखों में आज एक अजीब सी थकान और प्यास छिपी हुई थी। शिखा के शरीर की बनावट किसी अप्सरा से कम नहीं थी उसके ऊपर के हिस्से में लगे दो विशाल और रसीले तरबूज साड़ी के ब्लाउज को चीर कर बाहर आने को बेताब लग रहे थे।

रोहन जो कि उसका जूनियर असिस्टेंट था पिछले तीन सालों से शिखा के नीचे काम कर रहा था और मन ही मन उसे अपनी कल्पनाओं की रानी बना चुका था। रोहन की उम्र करीब छब्बीस साल थी और वह काफी कसरती बदन का मालिक था जो शिखा को अक्सर अपनी ओर आकर्षित करता था। उस रात ऑफिस में सिर्फ वे दोनों ही बचे थे क्योंकि एक बड़े प्रोजेक्ट की डेडलाइन नजदीक थी और काम का बोझ बहुत ज्यादा था। शिखा अपनी कुर्सी पर बैठी फाइलें देख रही थी तभी रोहन उसके केबिन में कॉफी लेकर दाखिल हुआ और उसकी नजर शिखा के झुकने की वजह से साड़ी के पल्लू से बाहर झांकते हुए उन गोरे और भारी तरबूजों पर टिक गई। उन तरबूजों के बीच की गहरी घाटी रोहन के मन में हलचल पैदा कर रही थी और वह अपनी नजरें वहां से हटा नहीं पा रहा था।

शिखा ने महसूस किया कि रोहन की नजरें कहाँ अटकी हुई हैं लेकिन उसने आज टोकने के बजाय एक हल्की सी मुस्कान दी और अपनी साड़ी को सही करने का कोई नाटक नहीं किया। उन दोनों के बीच एक अनकहा सा खिंचाव बढ़ने लगा था जो पिछले कई महीनों से दफन था पर आज उस तन्हाई में वह बाहर निकलने को बेताब था। शिखा ने अपनी कुर्सी पीछे की और रोहन को अपने पास बुलाया ताकि वह फाइल में कुछ आंकड़े देख सके पर असल में वह उसके शरीर की खुशबू को महसूस करना चाहती थी। जैसे ही रोहन उसके करीब आया उसकी सांसें शिखा के गर्दन के पास महसूस होने लगीं जिससे शिखा के शरीर में एक अजीब सी सिहरन दौड़ गई। शिखा के उन रसीले तरबूजों पर लगे छोटे-छोटे मटर अब साड़ी के पतले कपड़े के ऊपर से ही सख्त होकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने लगे थे।

शिखा का दिल जोर-जोर से धड़क रहा था और उसे अपनी जांघों के बीच मौजूद उस रेशमी खाई में हल्की सी नमी महसूस होने लगी थी जो उसकी बढ़ती हुई उत्तेजना का प्रमाण थी। रोहन ने धीरे से अपना हाथ मेज पर रखा और उसका हाथ अनजाने में शिखा के मुलायम हाथ से छू गया जिससे दोनों के शरीर में बिजली सी दौड़ गई। शिखा ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी आह भरी मानो वह इस लम्हे का बरसों से इंतजार कर रही थी। रोहन ने हिम्मत जुटाई और अपना हाथ शिखा की पतली कमर पर रख दिया जहाँ साड़ी और त्वचा का मिलन हो रहा था। शिखा ने कोई विरोध नहीं किया बल्कि अपना सिर पीछे की ओर झुकाकर रोहन के मजबूत सीने पर टिका दिया और उसकी सांसें अब और भी तेज हो गई थीं।

रोहन ने धीरे से शिखा के चेहरे को अपनी तरफ मोड़ा और उसके गुलाबी होठों का रस चखना शुरू कर दिया जिसे पाकर शिखा जैसे पागल सी हो गई। वह पागलों की तरह रोहन के बालों में अपनी उंगलियां फंसाने लगी और उन दोनों की जीभ एक-दूसरे के रस का आनंद लेने लगी। रोहन का एक हाथ अब शिखा के भारी तरबूजों को सहलाने लगा था जो साड़ी के भीतर कैद होने के लिए बहुत बड़े लग रहे थे। शिखा के मुंह से हल्की-हल्की कराहें निकलने लगीं जब रोहन ने उसके एक मटर को अपने दांतों के बीच हल्के से दबाया जिससे उसे एक मीठा सा दर्द और बेपनाह मजा महसूस हुआ। कमरे का तापमान बढ़ता जा रहा था और दोनों के शरीर पसीने से लथपथ होने लगे थे पर वह पसीना उनकी कामुकता को और भी बढ़ा रहा था।

शिखा ने अब रोहन की पैंट की जिप खोली और उसके भीतर छिपे हुए उस विशाल और सख्त खीरे को बाहर निकाला जो अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ खड़ा था। उस खीरे को देखते ही शिखा की आँखें फटी की फटी रह गई क्योंकि वह इतना बड़ा और दमदार था कि उसे अपनी खाई में समाना एक चुनौती लग रही थी। शिखा ने बिना देर किए उस खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे बड़े चाव से चूसने लगी जैसे वह कोई बहुत ही स्वादिष्ट फल हो। रोहन के मुंह से आनंद की एक लंबी आह निकली और उसने शिखा के सिर को पकड़कर उसे गहराई तक चूसने के लिए प्रेरित किया। शिखा की इस सेवा ने रोहन को पूरी तरह से पागल कर दिया था और अब वह उस रेशमी खाई की गहराई नापने के लिए बेकरार था।

रोहन ने शिखा को मेज पर लिटा दिया और उसकी साड़ी को कमर तक ऊपर उठा दिया जिससे उसका भारी पिछवाड़ा और उसके बीच छिपी वह गुलाबी खाई पूरी तरह से उजागर हो गई। उस खाई के आसपास हल्के-हल्के बाल थे जो उसकी खूबसूरती को और बढ़ा रहे थे और वहां से बहता हुआ प्राकृतिक रस उसकी चमक बढ़ा रहा था। रोहन ने पहले अपनी उंगली से उस खाई को खोदना शुरू किया जिससे शिखा तड़पने लगी और अपनी कमर ऊपर उठाकर उस उंगली का स्वागत करने लगी। रोहन की उंगली जब उस गहराई में जा रही थी तो शिखा के शरीर में झटके लग रहे थे और वह बार-बार रोहन का नाम पुकार रही थी। अब रोहन ने अपने थूक से उस खीरे को चिकना किया और उसे उस गीली खाई के मुहाने पर टिका दिया।

जैसे ही रोहन ने अपने खीरे का अगला हिस्सा शिखा की तंग खाई में डाला शिखा के मुंह से एक चीख निकल गई क्योंकि वह रास्ता बहुत ही संकरा था। लेकिन रोहन ने धीरे-धीरे दबाव बढ़ाया और देखते ही देखते वह पूरा खीरा शिखा की गहराई में समा गया जिससे उसे एक पूर्णता का अहसास हुआ। शिखा ने अपनी दोनों टांगें रोहन की कमर पर लपेट लीं ताकि वह और गहराई तक खुदाई कर सके और रोहन ने भी अपनी गति बढ़ानी शुरू कर दी। सामने से खोदना इतना मजेदार था कि शिखा के तरबूज हर धक्के के साथ ऊपर-नीचे उछल रहे थे और रोहन उन्हें अपने हाथों में भरकर मसल रहा था। हर धक्के के साथ एक थप-थप की आवाज गूंज रही थी जो उस सन्नाटे भरे ऑफिस में संगीत की तरह लग रही थी।

खुदाई की यह प्रक्रिया अब और भी तेज और उग्र हो गई थी क्योंकि दोनों ही चरम सुख के करीब थे। रोहन ने अब शिखा को घुमाया और उसे मेज पर झुकाकर पिछवाड़े से खोदना शुरू किया जिससे खीरा और भी गहराई तक जा रहा था। शिखा को इस स्थिति में बहुत मजा आ रहा था और वह अपने पिछवाड़े को पीछे की ओर धकेल रही थी ताकि रोहन उसे और भी जोर से खोद सके। रोहन ने उसके दोनों तरबूजों को पीछे से पकड़ लिया और पागलों की तरह उसे खोदने लगा जिससे शिखा की सांसें उखड़ने लगीं। अंत में जब दोनों की बर्दाश्त खत्म होने लगी तो रोहन ने अपने खीरे को पूरी ताकत से अंदर धकेला और उसका सारा रस शिखा की खाई की गहराइयों में छूटने लगा।

शिखा का भी उसी वक्त रस निकलना शुरू हो गया और उसका पूरा शरीर कांपने लगा मानो उसे कोई दौरा पड़ा हो। दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए काफी देर तक वहीं मेज पर पड़े रहे और उनकी भारी सांसें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं। शिखा के चेहरे पर एक अजीब सा सुकून था और रोहन को भी अपनी मर्दानगी पर गर्व महसूस हो रहा था। उस रात के बाद उन दोनों का रिश्ता सिर्फ प्रोफेशनल नहीं रहा बल्कि उस दफ्तर की दीवारों ने उनकी उस बेपनाह खुदाई के कई और किस्से देखे। शिखा ने महसूस किया कि उस एक रात ने उसकी बरसों की प्यास बुझा दी थी और रोहन के उस दमदार खीरे ने उसे एक नई जिंदगी दे दी थी। ऑफिस की वह रात उनके जीवन की सबसे यादगार और कामुक रात बन गई थी जिसे वे कभी नहीं भूल सकते थे।

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