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पड़ोसन कविता की चुदाई


पड़ोसन कविता की चुदाई—>

शहर की उस तंग गली के आखिरी छोर पर बसे उस पुराने मकान में समीर अभी दो दिन पहले ही रहने आया था। दोपहर की चिलचिलाती धूप में सामान व्यवस्थित करते हुए उसका शरीर पसीने से तरबतर हो चुका था। तभी दरवाजे पर एक दस्तक हुई और उसने देखा कि सामने पड़ोस में रहने वाली कविता खड़ी थी। कविता की उम्र लगभग चौंतीस वर्ष रही होगी, लेकिन उसके शरीर की बनावट ऐसी थी कि कोई भी उसे देखकर अपनी सुध-बुध खो दे। उसके शरीर पर कसी हुई साड़ी उसके उभरे हुए अंगों को और भी ज्यादा आकर्षक बना रही थी। समीर ने उसे अंदर आने का इशारा किया और वह मुस्कुराते हुए अपनी कोमल आवाज में बोली कि अगर उसे किसी चीज की जरूरत हो तो वह बेझिझक मांग सकता है। समीर की नजरें अनायास ही कविता के ब्लाउज के भीतर दबे उन भारी भरकम तरबूजों पर टिक गई जो उसकी हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे।

कविता का शरीर किसी तराशी हुई मूरत की तरह था। उसके तरबूज इतने बड़े और सुडौल थे कि साड़ी का पल्लू भी उन्हें पूरी तरह ढक नहीं पा रहा था। जब वह बात करती तो उसके तरबूजों के ऊपर के हिस्से की गोलाई समीर की धड़कनों को बढ़ा देती थी। उसके चेहरे पर एक अजीब सी चमक थी और उसकी आँखों में एक गहरी प्यास छिपी हुई थी। समीर ने गौर किया कि कविता की कमर पतली थी लेकिन उसका पिछवाड़ा काफी भारी और मांसल था जो चलते समय मटकता हुआ बहुत ही कामुक लगता था। समीर ने उसे चाय के लिए पूछा और कविता ने मुस्कुराते हुए हामी भर दी। रसोई में काम करते हुए समीर बार-बार कविता के उन रसीले अंगों की कल्पना कर रहा था, जिनसे उसे एक अजीब सी बेचैनी महसूस हो रही थी। उसे लग रहा था कि उसका खीरा अब पैंट के भीतर अपनी जगह बनाने के लिए छटपटाने लगा है।

बातों-बातों में पता चला कि कविता का पति अक्सर व्यापार के सिलसिले में शहर से बाहर रहता है और वह घर में काफी अकेली महसूस करती है। समीर ने उसकी आँखों में झाँका तो उसे वहां एक खालीपन के साथ-साथ एक दबी हुई इच्छा भी दिखाई दी। समीर ने धीरे से कविता का हाथ पकड़ा तो उसने उसे हटाया नहीं, बल्कि उसकी उंगलियों में अपनी उंगलियां फंसा लीं। समीर को महसूस हुआ कि कविता का हाथ रेशम की तरह मुलायम था और उस स्पर्श ने उसके पूरे शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ा दी। कमरे का माहौल अब पूरी तरह से बदल चुका था और दोनों के बीच एक अनकहा आकर्षण जन्म ले चुका था। समीर ने धीरे-धीरे अपना हाथ ऊपर की ओर बढ़ाया और कविता के कंधे को सहलाने लगा। कविता की सांसें अब तेज चलने लगी थीं और वह अपनी नजरें समीर की आँखों से नहीं हटा पा रही थी।

समीर ने अब और देरी न करते हुए कविता को अपनी बाहों में भर लिया। कविता ने पहले तो हल्की सी झिझक दिखाई, लेकिन जैसे ही समीर ने उसके चेहरे के करीब जाकर उसकी सांसों को महसूस किया, वह पूरी तरह से पिघल गई। समीर ने अपनी मिठास कविता के होंठों पर उड़ेल दी और दोनों एक-दूसरे की सांसों में खो गए। समीर के हाथ अब कविता की पीठ पर रेंग रहे थे और वह उसके भारी पिछवाड़े को अपने हाथों से भींचने लगा। कविता ने एक हल्की सी कराह भरी और समीर के बालों में अपनी उंगलियां गड़ा दीं। उस कमरे में केवल उनकी तेज चलती सांसों की आवाज सुनाई दे रही थी। समीर ने महसूस किया कि कविता का शरीर अब पूरी तरह से गर्म हो चुका है और वह इस मिलन के लिए पूरी तरह से तैयार है।

समीर ने धीरे से कविता की साड़ी का पल्लू नीचे गिरा दिया, जिससे उसके विशाल और सफेद तरबूज पूरी तरह से उजागर हो गए। उन तरबूजों के ऊपर दो छोटे-छोटे गुलाबी मटर के दाने उभरे हुए थे जो ठंडक और उत्तेजना के कारण सख्त हो गए थे। समीर ने अपना मुंह नीचे झुकाया और एक मटर को अपने दांतों के बीच हल्के से दबाया। कविता के मुंह से एक लंबी आह निकली और उसने समीर के सिर को अपने सीने से और जोर से सटा लिया। समीर ने अब बारी-बारी से दोनों मटरों को चूसना शुरू किया और साथ ही अपने हाथों से उन भारी तरबूजों को मसलने लगा। कविता की उत्तेजना अब चरम पर थी और वह बार-बार अपना शरीर समीर की ओर धकेल रही थी। समीर ने महसूस किया कि उसकी उंगलियां अब नीचे की ओर बढ़ने के लिए बेताब हैं।

समीर ने कविता को बिस्तर पर लिटा दिया और धीरे-धीरे उसके कपड़े उतारने लगा। जब कविता पूरी तरह से निर्वस्त्र हुई तो समीर उसकी सुंदरता को देखता ही रह गया। उसकी जांघों के बीच घने बाल थे जो उसकी गहरी और गीली खाई को आधा ढके हुए थे। समीर ने अपनी उंगलियों को उस खाई के मुहाने पर ले जाकर सहलाना शुरू किया। खाई से निकलने वाले रसीले तरल ने समीर की उंगलियों को पूरी तरह भिगो दिया था। समीर ने अपनी जीभ से उस खाई को चाटना शुरू किया, जिससे कविता का पूरा शरीर कांपने लगा। वह जोर-जोर से कराह रही थी और उसका हाथ समीर के खीरे को छूने के लिए नीचे बढ़ा। जैसे ही कविता का हाथ समीर के कड़े और लंबे खीरे पर पड़ा, वह दंग रह गई। उसने उस गर्म खीरे को अपनी मुट्ठी में भर लिया और उसे ऊपर-नीचे करने लगी।

समीर अब और इंतजार नहीं कर सकता था। उसने कविता की टांगों को चौड़ा किया और अपने सख्त खीरे को उसकी गीली खाई के दरवाजे पर टिका दिया। जैसे ही समीर ने पहला धक्का मारा, उसका खीरा आधा उस रसीली खाई के भीतर समा गया। कविता ने दर्द और आनंद की एक मिली-जुली चीख मारी। समीर ने उसे चूमते हुए अपनी गति बढ़ानी शुरू की। अब वह पूरी ताकत से कविता की खाई में खुदाई कर रहा था। हर धक्के के साथ कविता के तरबूज हवा में उछल रहे थे और उनके टकराने की आवाज पूरे कमरे में गूँज रही थी। समीर के खीरे की गर्माहट कविता की खाई की गहराई तक महसूस हो रही थी। दोनों एक-दूसरे के पसीने और खुशबू में पूरी तरह सराबोर हो चुके थे। समीर कभी सामने से खुदाई करता तो कभी कविता को घुमाकर उसके पिछवाड़े की ओर से खुदाई शुरू कर देता।

खुदाई का यह सिलसिला काफी देर तक चलता रहा। समीर के धक्के अब और भी गहरे और तेज होते जा रहे थे। कविता अपनी आँखें बंद किए उस असीम सुख का आनंद ले रही थी और बार-बार समीर से उसे और जोर से खोदने के लिए कह रही थी। उसे लग रहा था कि उसका पूरा वजूद इस खुदाई में समा गया है। अचानक समीर को महसूस हुआ कि अब उसका रस निकलने ही वाला है। उसने अपनी गति को और तेज कर दिया और कविता को भी महसूस होने लगा कि उसकी खाई अब फटने वाली है। जैसे ही समीर ने आखिरी जोर लगाया, उसका सारा रस कविता की गहरी खाई के भीतर छिटक गया। ठीक उसी समय कविता का भी रस निकल गया और वह समीर को कसकर पकड़ते हुए शांत हो गई। दोनों काफी देर तक उसी अवस्था में लेटे रहे, उनकी धड़कनें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं।

इस शारीरिक मिलन के बाद समीर और कविता के बीच एक अटूट जुड़ाव पैदा हो गया था। वे दोनों निर्वस्त्र होकर एक-दूसरे की बाहों में लिपटे हुए थे। कविता का चेहरा सुकून से भरा हुआ था और उसकी आँखों में अब वह अकेलापन गायब था। समीर उसके माथे को चूमते हुए उसके बिखरे हुए बालों को संवार रहा था। उस रात उस कमरे में केवल दो शरीरों का मिलन नहीं हुआ था, बल्कि दो एकाकी आत्माओं ने एक-दूसरे में अपना घर ढूंढ लिया था। समीर को पता था कि अब उसकी यह नई जिंदगी इस पड़ोसन के बिना अधूरी होगी और कविता के लिए भी यह खुदाई केवल एक शारीरिक सुख नहीं, बल्कि एक नया जीवन पाने जैसा था। पसीने से भीगे हुए उनके शरीर धीरे-धीरे ठंडी हवा के झोंकों से शांत हो रहे थे, लेकिन उनके दिलों में जल रही वह आग अब हमेशा के लिए एक मीठी याद बन चुकी थी।

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