समीर पहाड़ों के इस एकांत बंगले में अपने शोध के लिए आया था, जहाँ की शांति उसे सुकून दे रही थी, लेकिन वहीं की देखरेख करने वाली नंदिनी की उपस्थिति उसके मन में एक अजीब सी हलचल पैदा कर रही थी। नंदिनी की उम्र २३ के करीब रही होगी, उसका रंग गेंहुआ था और उसकी आँखों में एक ऐसी शरारत थी जो किसी भी मर्द को बेचैन कर सकती थी। उस दोपहर जब धूप तेज थी, समीर हॉल में बैठा अपनी फाइलें देख रहा था, तभी नंदिनी कमरे में ठंडी शरबत लेकर आई और उसके झुकते ही समीर की नज़रें उसकी साड़ी के ढीले पल्लू से फिसलते हुए उसके जिस्म के उतार-चढ़ाव पर टिक गईं।
नंदिनी के जिस्म की बनावट एकदम सुडौल थी, जैसे किसी कलाकार ने फुर्सत में तराशा हो, उसके रेशमी ब्लाउज के नीचे दबे हुए भारी तरबूज उसकी हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे जो समीर की धड़कनें बढ़ा रहे थे। समीर ने महसूस किया कि नंदिनी को भी उसकी नज़रों का अहसास हो गया था, उसने अपनी साड़ी ठीक करने की कोशिश तो की लेकिन उसकी आँखों में एक अजीब सी चाहत और आमंत्रण साफ दिखाई दे रहा था। उन दोनों के बीच एक अनकहा सा खिंचाव था, एक ऐसी प्यास जो शब्दों में बयां नहीं की जा सकती थी, बस महसूस की जा सकती थी, जैसे दोनों सदियों से इस पल का इंतज़ार कर रहे हों।
समीर का मन डोलने लगा था, उसने हिम्मत जुटाकर नंदिनी का हाथ पकड़ लिया, जो कि पसीने से हल्का सा नम था और उसकी उंगलियों में एक अजीब सी कंपन थी। नंदिनी ने हाथ छुड़ाने की कोई कोशिश नहीं की, बल्कि उसने अपनी पलकें झुका लीं और समीर के करीब आकर खड़ी हो गई, जिससे उसके शरीर की गर्मी और खुशबू समीर के नथुनों तक पहुँचने लगी। समीर की धड़कनें अब बेकाबू हो रही थीं, उसका खीरा अपनी सीमाएं लांघने के लिए तड़प रहा था और उसने धीरे से अपना दूसरा हाथ नंदिनी की कमर पर रखा, जहाँ की त्वचा मखमल जैसी कोमल थी।
नंदिनी की सिसकी निकली जब समीर ने उसके तरबूजों पर अपनी उंगलियां फेरीं और उनके बीच में दबे नन्हे मटर को हल्के से दबाया, जिससे वह सिहर उठी और उसने अपना सिर समीर के कंधे पर रख दिया। समीर ने धीरे से उसकी साड़ी का पल्लू गिरा दिया और उसके गोरे बदन को निहारने लगा, उसके हाथ अब नंदिनी के पिछवाड़े की गोलाई को महसूस कर रहे थे जो बहुत ही मांसल और सख्त थे। माहौल में एक भारीपन था, समीर ने झुककर नंदिनी के गर्दन को चूमना शुरू किया और उसकी जीभ जब उसकी त्वचा पर फिरी तो नंदिनी के मुँह से ‘उफ़’ की एक गहरी आह निकल गई।
अब सब्र का बांध टूट चुका था, समीर ने नंदिनी को बिस्तर पर लिटाया और उसके कपड़े एक-एक करके उतारने लगा, अब उसके सामने वह पूरी तरह निर्वस्त्र थी, उसकी काली घनी खाई के आसपास के रेशमी बाल चमक रहे थे। समीर ने पहले अपना खीरा बाहर निकाला जो अब पूरी तरह तन चुका था और नंदिनी ने उसे देखते ही अपने हाथ में थाम लिया और उसकी चिकनाई को महसूस करने लगी। फिर नंदिनी ने उस खीरे को अपने मुँह में लिया और उसे बड़े ही प्यार से चूसने लगी, जिससे समीर की आँखों के सामने अंधेरा छा गया और उसे लगा जैसे वह स्वर्ग के द्वार पर खड़ा हो।
समीर ने अब नंदिनी को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने की स्थिति में लाया, उसकी खाई पूरी तरह से गीली और तैयार थी, जैसे किसी प्यासे को पानी की तलाश हो। उसने धीरे से अपने खीरे को उसकी खाई के मुहाने पर रखा और एक ही झटके में गहरा पैठ गया, जिससे नंदिनी की चीख निकल गई लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि चरम सुख की आह थी। समीर अब लगातार उसे खोदने लगा, हर धक्का गहरा और दमदार था, और कमरे में केवल उनके शरीरों के टकराने की आवाज और भारी सांसें गूँज रही थीं, नंदिनी के तरबूज बेतरतीब ढंग से झूल रहे थे।
“ओह समीर, और जोर से… मुझे और गहरा खोदो,” नंदिनी उत्तेजना में चिल्ला रही थी, और समीर उसकी मांगों को पूरा करने के लिए अपनी पूरी ताकत लगा रहा था, उसकी गति अब चरम पर थी। समीर ने अब उसे सामने से खोदना शुरू किया और उसकी आँखों में देखते हुए अपनी रफ्तार बढ़ाई, जहाँ दोनों का पसीना मिलकर एक हो गया था और जिस्मों की रगड़ से एक दिव्य आनंद मिल रहा था। कुछ ही देर में समीर को महसूस हुआ कि उसका रस छूटने वाला है, और ठीक उसी पल नंदिनी की खाई ने भी अपना रस निकाल दिया और दोनों एक-दूसरे में सिमट गए।
जब सब शांत हुआ, दोनों पसीने से लथपथ एक-दूसरे की बाहों में पड़े हुए थे, उनकी सांसें अब भी थोड़ी तेज थीं लेकिन मन को एक गहरा सुकून मिल चुका था। समीर ने नंदिनी के माथे को चूमा और उसे अपनी छाती से लगा लिया, जहाँ नंदिनी के तरबूज अब समीर की छाती पर दबे हुए थे और वह सुकून की नींद की ओर बढ़ रही थी। उस दोपहर की उस खुदाई ने उनके बीच एक ऐसा रिश्ता बना दिया था जो रूहानी भी था और जिस्मानी भी, और बाहर ढलती शाम इस मिलन की गवाह बनी खड़ी थी।