Join WhatsApp Click Here
Join Telegram Click Here

शादी की रात मौसी की चु@#ई

शादी वाले दिन पूरा घर हलचल और रंग-बिरंगी रोशनी से भरा हुआ था। आयुष का चचेरा भाई की शादी थी और रेखा मौसी भी उसी परिवार की थीं। मौसी ने गहरे लाल रंग की रेशमी साड़ी पहनी थी जो उनके शरीर से बिल्कुल चिपकी हुई थी। उनके भारी तरबूज ब्लाउज के अंदर से उभरे हुए थे और हर बार जब वे हँसतीं या चलतीं, तो तरबूज हल्के-हल्के हिलते और मटर साड़ी के कपड़े पर अपनी छाप छोड़ जाते। आयुष बार-बार उनकी तरफ देख रहा था। मौसी भी उसे देखकर हल्के से मुस्कुरा रही थीं, जैसे कोई राज़ जानती हों।

दिन भर नोक-झोंक चलती रही। जब आयुष ने मौसी को फूलों की माला पहनाने में मदद की, तो उसका हाथ अनजाने में मौसी के कंधे पर रुक गया। मौसी ने मुस्कुराते हुए कहा, “आयुष बेटा, हाथ थोड़ा ऊपर करो ना…” लेकिन उनकी आँखों में शरारत थी। आयुष ने मुस्कुराकर हाथ थोड़ा और ऊपर किया और उंगलियों से उनकी गर्दन को हल्का-हल्का सहला दिया। मौसी की साँस एक पल के लिए रुक गई, फिर वे हँस पड़ीं और आयुष की छाती पर हल्का-सा थपकी मार दी। “शरारती हो गए हो तुम…” उन्होंने फुसफुसाया।

शाम को जब बारात आई, तो डांस के दौरान मौसी का पल्लू बार-बार सरक रहा था। आयुष ने मौका देखकर पल्लू ठीक करने का बहाना बनाया और अपना हाथ उनके तरबूजों के ठीक नीचे कमर पर रख दिया। मौसी ने पलटकर देखा, मुस्कुराईं और आँख मार दी। “सावधानी से…” उनकी आवाज़ में मिठास थी। आयुष का हाथ एक पल के लिए रुक गया, फिर हल्के से दबा दिया। मौसी का शरीर हल्का सा काँपा, लेकिन वे मुस्कुराती रहीं।

रात के खाने के बाद जब सब थककर सोने लगे, तो कमरे में सब लोग फर्श पर चटाई बिछाकर लेट गए। आयुष मौसी के बगल में ही था। लालटेन जल रही थी, लेकिन धीरे-धीरे उसकी रोशनी भी कम होने लगी। अचानक पूरे मोहल्ले में बिजली चली गई। कमरा अंधेरे में डूब गया। सिर्फ बाहर की बारिश की आवाज़ और हल्की-सी साँसें सुनाई दे रही थीं।

अंधेरे में आयुष ने महसूस किया कि मौसी का हाथ उसकी जांघ पर आकर रख गया है। वह मुस्कुराया। उसने अपना हाथ बढ़ाया और मौसी की कमर पर रख दिया। मौसी ने हल्के से करवट बदली, अब उनकी पीठ आयुष की तरफ थी। आयुष ने बहुत धीरे से मौसी की साड़ी का पल्लू सरकाया। उनके तरबूज अब आधे बाहर थे। आयुष ने हाथ बढ़ाकर एक तरबूज को हल्के से छुआ। मौसी का शरीर सिहर उठा, लेकिन वे चुप रहीं। सिर्फ उनकी साँसें तेज हो गईं। आयुष ने तरबूज को पूरा हाथ में भर लिया, बहुत धीरे-धीरे दबाया। मटर सख्त हो गए थे। मौसी ने बिना कुछ बोले अपना हाथ पीछे कर के आयुष की जांघ को जकड़ लिया।

आयुष का हाथ अब नीचे सरकने लगा। उसने साड़ी का पेटीकोट भी धीरे से खोला। मौसी की पैंटी अब सिर्फ एक पतली परत थी। आयुष ने उंगली से पैंटी के ऊपर से खाई को सहलाया। मौसी का पिछवाड़ा हल्का सा हिला। वे मुस्कुरा रही थीं – अंधेरे में भी आयुष को उनकी मुस्कान महसूस हो रही थी। आयुष ने पैंटी को बहुत धीरे से नीचे सरकाया। अब मौसी की खाई पूरी तरह नंगी थी। आयुष ने उंगली से खाई के ऊपर-नीचे सहलाया, फिर धीरे से अंदर डाली। मौसी की खाई पहले से ही गीली थी। मौसी ने दबी हुई आह भरी, लेकिन चुप रहीं।

आयुष अब और करीब आ गया। उसने अपना खीरा निकाला और मौसी के पिछवाड़े से खाई के मुंह पर रख दिया। मौसी ने बिना बोले अपना पिछवाड़ा थोड़ा पीछे किया। आयुष ने बहुत धीरे-धीरे खीरा अंदर डाला। इंच-इंच करके। मौसी की खाई तंग थी, लेकिन गीली होने से आसानी से घुस गया। जब पूरा खीरा अंदर चला गया, तो मौसी ने हल्का सा काँपकर आयुष की जांघ को और जोर से पकड़ लिया। आयुष ने धीरे-धीरे हिलना शुरू किया। बहुत धीमी गति से, ताकि कोई जाग न जाए। हर थ्रस्ट में मौसी का पिछवाड़ा हल्का सा हिलता। उनके तरबूज आयुष के हाथों में थे। आयुष उन्हें दबाता, मसलता, मटर को उंगलियों से घुमाता। मौसी बिना एक शब्द बोले बस मुस्कुराती रहीं और अपनी खाई को और पीछे धकेलती रहीं।

रात भर ये सिलसिला चलता रहा। कभी आयुष धीरे-धीरे खोदता, कभी थोड़ा तेज। मौसी कभी दबी कराहतीं, कभी मुस्कुरातीं। कभी उनकी उंगलियाँ आयुष की पीठ पर नाखून गड़ा देतीं। कभी वे खुद अपनी जांघें फैलाकर खाई और खोल देतीं। अंधेरे में, सबके सोते हुए, दोनों चुपचाप एक-दूसरे में खोए रहे। मौसी की खाई कई बार सिकुड़ी, रस निकला, लेकिन वे चुप रहीं। सिर्फ मुस्कान और शरीर की कंपकंपी बता रही थी कि उन्हें कितना मजा आ रहा है।

आखिरी बार जब आयुष का गर्म रस मौसी की खाई के अंदर छूटा, तो मौसी ने पहली बार हल्के से आयुष का नाम लिया – सिर्फ होंठों से, बिना आवाज़ के। फिर वे मुस्कुराते हुए करवट लेकर सो गईं। आयुष भी उनके बगल में लेट गया। दोनों के शरीर अभी भी एक-दूसरे से चिपके हुए थे। खीरा अभी भी मौसी की खाई में था।

सुबह होने तक दोनों ऐसे ही लिपटे रहे। जब सब जागे, तो मौसी सामान्य मुस्कान के साथ उठीं, जैसे कुछ हुआ ही न हो। लेकिन जब उनकी नजर आयुष से मिली, तो उन्होंने फिर वही शरारती मुस्कान दी। रात की वो यादगार, खामोश और गहरी खुदाई दोनों के मन में हमेशा के लिए छिप गई थी।

Leave a Comment