गर्मियों की वह एक बोझिल दोपहर थी जब समीर अपने कॉलेज की छुट्टियों में अपनी चाची शीला के घर रहने आया था। शीला चाची की उम्र करीब पैंतीस साल थी, लेकिन उनके शरीर की बनावट किसी बीस साल की नवयौवना को भी मात देती थी। समीर जब भी उन्हें देखता, उसके मन में अजीब सी हलचल मच जाती थी। चाची के वे गोल और उभरे हुए तरबूज जब उनकी साड़ी के ब्लाउज को चीर कर बाहर आने की कोशिश करते, तो समीर की नजरें वहीं जम जाती थीं। चाची का रंग निखरा हुआ गेहूंआ था और उनकी चाल में एक ऐसा लचीलापन था जो उनके भारी पिछवाड़े को हर कदम पर मदमस्त तरीके से हिलाता था।
समीर ने गौर किया था कि चाची के उन रसीले तरबूजों के बीच एक गहरी घाटी बनती थी, जिसमें अक्सर पसीने की कुछ बूंदें चमकती रहती थीं। उनके चेहरे पर हमेशा एक हल्की मुस्कान रहती थी, लेकिन उनकी आंखों में एक अनकही प्यास छिपी थी। शीला चाची का पिछवाड़ा इतना मांसल और चौड़ा था कि जब वे किचन के स्लैब पर झुकती थीं, तो समीर के शरीर का खीरा अपने आप ही कड़ा होने लगता था। वह अक्सर उन्हें चोरी-छिपे देखा करता था, और चाची भी शायद इस बात को जानती थीं, इसलिए वे अक्सर अपनी साड़ी का पल्लू जानबूझकर सरका दिया करती थीं जिससे उनके गोरे कंधे और उभरे हुए तरबूजों की गोलाई साफ दिखाई दे।
उस दिन घर में कोई नहीं था, चाचा शहर से बाहर किसी काम से गए थे। बाहर चिलचिलाती धूप थी और घर के अंदर सन्नाटा पसरा हुआ था। समीर हॉल में सोफे पर बैठा मोबाइल चला रहा था, तभी चाची किचन से बाहर आईं। उन्होंने एक बहुत ही पतली और पारभासी साड़ी पहनी हुई थी। पसीने की वजह से साड़ी उनके शरीर से चिपक गई थी, जिससे उनके शरीर का एक-एक अंग अपनी गवाही दे रहा था। समीर ने देखा कि चाची के तरबूजों के ऊपर के मटर साड़ी के कपड़े के ऊपर से ही उभरे हुए साफ नजर आ रहे थे, जैसे वे भी आज़ाद होने के लिए बेताब हों।
चाची समीर के पास आकर बैठ गईं और धीरे से बोलीं, समीर, बहुत गर्मी है न? आज तो कूलर भी ठीक से हवा नहीं दे रहा। समीर ने उनकी आंखों में देखा, वहां एक अजीब सी चमक थी। उसने हिम्मत जुटाकर कहा, हां चाची, गर्मी तो बहुत है, पर आप इस गर्मी में और भी ज्यादा सुंदर लग रही हैं। चाची ने शरमाते हुए अपना पल्लू ठीक करने का नाटक किया, जिससे उनके तरबूज थोड़े और उभर आए। उन्होंने समीर के हाथ पर अपना हाथ रखा और कहा, तुझे मैं सच में सुंदर लगती हूँ क्या? समीर ने उनके हाथ को कस कर पकड़ लिया और उनके करीब सरक गया।
अब दोनों के बीच की दूरी बहुत कम हो गई थी। समीर को चाची के शरीर से आने वाली एक मीठी सी महक महसूस हो रही थी। उसने धीरे से अपना हाथ चाची की कमर पर रखा। चाची की रेशमी त्वचा को छूते ही समीर के शरीर में बिजली सी दौड़ गई। चाची ने कोई विरोध नहीं किया, बल्कि वे और करीब आ गईं। समीर ने अब अपनी उंगलियों से चाची की कमर को सहलाना शुरू किया। उसने देखा कि चाची की सांसें तेज होने लगी थीं और उनके तरबूज ऊपर-नीचे हो रहे थे। समीर ने धीरे से अपना चेहरा चाची की गर्दन के पास ले जाकर सूंघा, जिससे चाची के मुंह से एक दबी हुई आह निकल गई।
समीर ने अब अपने होंठों को चाची की गर्दन पर टिका दिया और वहां धीरे-धीरे प्यार करने लगा। चाची ने अपनी आंखें बंद कर लीं और समीर के बालों में अपनी उंगलियां फंसा लीं। समीर का हाथ अब ऊपर की ओर बढ़ा और उसने पहली बार चाची के एक भारी तरबूज को अपनी हथेली में भर लिया। वह तरबूज इतना नरम और गर्म था कि समीर को लगा जैसे वह स्वर्ग छू रहा हो। चाची ने सिसकारी भरते हुए कहा, उह्ह समीर… ये क्या कर रहा है… कोई देख लेगा। लेकिन समीर जानता था कि घर में कोई नहीं है। उसने दूसरे हाथ से उनके भारी पिछवाड़े को सहलाना शुरू कर दिया।
समीर ने अब चाची की साड़ी का पल्लू पूरी तरह से हटा दिया और उनके ब्लाउज के हुक खोलने लगा। जैसे ही हुक खुले, चाची के विशाल और गोरे तरबूज आज़ाद होकर बाहर आ गिरे। समीर की आंखें फटी की फटी रह गई थीं। उन तरबूजों के बीचों-बीच गुलाबी रंग के मटर जैसे दाने पूरी तरह से तने हुए थे। समीर ने बिना देर किए अपना मुंह एक तरबूज पर रख दिया और उसे जोर-जोर से चूसने लगा। चाची के मुंह से सिसकारियां निकलने लगीं। वे समीर का सिर अपने तरबूजों पर जोर से दबाने लगीं। समीर ने अब चाची के दूसरे मटर को अपनी उंगलियों से सहलाना और चुटकी लेना शुरू किया, जिससे वे और भी ज्यादा उत्तेजित हो गईं।
उत्तेजना जब चरम पर पहुँच गई, तो समीर ने चाची को उठाया और बेडरूम की तरफ ले गया। वहां उसने चाची के सारे कपड़े उतार दिए। अब चाची पूरी तरह से नग्न उसके सामने लेटी थीं। उनका शरीर किसी अप्सरा जैसा लग रहा था। समीर ने देखा कि उनकी जांघों के बीच की खाई के पास थोड़े बहुत बाल थे और वहां से रसीला पानी बहकर उनकी खाई को गीला कर रहा था। समीर ने अपने कपड़े भी उतार फेंके और उसका सात इंच का कड़ा खीरा गर्व से खड़ा हो गया। चाची ने जब उस विशाल खीरे को देखा, तो उनकी आंखें फैल गईं। उन्होंने अपने हाथ बढ़ाकर उस खीरे को पकड़ लिया और उसे सहलाने लगीं।
चाची ने अब उस खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे चाटने लगीं। समीर को ऐसा सुख मिल रहा था जो उसने पहले कभी महसूस नहीं किया था। चाची अपने मुंह से उस खीरे की पूरी लंबाई को अंदर ले रही थीं और उसके मटर जैसे हिस्से को अपनी जीभ से सहला रही थीं। कुछ देर बाद समीर ने चाची को बिस्तर पर लिटाया और खुद उनकी जांघों के बीच बैठ गया। उसने अपनी उंगली से चाची की गीली खाई को सहलाया और फिर एक उंगली अंदर डाल दी। चाची ने कमर ऊपर उठा दी और जोर-जोर से कराहने लगीं। उनकी खाई पूरी तरह से शहद जैसे रस से लथपथ थी।
समीर ने अब अपनी जीभ को उनकी खाई के पास ले जाकर उसे चाटना शुरू किया। खाई चाटने के दौरान जब समीर की जीभ उनके मटर जैसे छोटे दाने पर लगती, तो चाची पूरी तरह से कांप जाती थीं। वे समीर के चेहरे को अपनी जांघों के बीच और जोर से भींचने लगीं। समीर ने काफी देर तक उनकी खाई का रस पिया, जिससे चाची का शरीर पूरी तरह से ढीला पड़ गया। अब समीर ने अपने कड़े खीरे को उनकी खाई के मुहाने पर टिकाया। उसने धीरे से दबाव डाला, तो खीरा चाची की तंग खाई के अंदर सरकने लगा। चाची ने दर्द और आनंद के मिले-जुले भाव में समीर के कंधों को अपने नाखूनों से जकड़ लिया।
समीर ने अब सामने से खोदना शुरू किया। हर धक्के के साथ उसका पूरा खीरा चाची की गहराई तक जा रहा था। कमरे में केवल उनके शरीरों के टकराने की आवाज़ और चाची की आहें गूंज रही थीं। समीर ने चाची के पैरों को अपने कंधों पर रख लिया जिससे खुदाई और भी गहरी होने लगी। चाची बार-बार बोल रही थीं, आह समीर… और जोर से… आज मुझे पूरी तरह से खोद डाल… बहुत सालों से प्यासी हूँ। समीर की गति बढ़ती जा रही थी। पसीने से दोनों के शरीर लथपथ थे, लेकिन किसी को परवाह नहीं थी। समीर ने अब चाची को उल्टा किया और उन्हें घोड़ी बना दिया, जिससे उनका भारी पिछवाड़ा ऊपर की ओर उठ गया।
समीर ने अब पीछे से अपना खीरा उनकी खाई में डाला और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। यह पोजीशन चाची को बहुत पसंद आ रही थी। हर धक्के पर उनके तरबूज बुरी तरह से झूल रहे थे। समीर ने पीछे से उनके तरबूजों को पकड़ लिया और अपनी खुदाई जारी रखी। चाची अब जोर-जोर से चिल्लाने लगी थीं, समीर मैं निकलने वाली हूँ… मेरा रस छूट रहा है! समीर ने भी अपनी रफ्तार बढ़ा दी और कुछ ही पलों बाद चाची के शरीर में एक ज़ोरदार कंपन हुआ और उनकी खाई से ढेर सारा रस निकलने लगा। उसी समय समीर का खीरा भी पूरी तरह से फट पड़ा और उसने अपना सारा गर्म रस चाची की गहराई में छोड़ दिया।
दोनों काफी देर तक उसी अवस्था में लेटे रहे, उनकी सांसें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। समीर ने चाची को अपनी बाहों में भर लिया और उनके माथे को चूमा। चाची के चेहरे पर एक असीम संतुष्टि का भाव था। उन्होंने समीर के कान में धीरे से कहा, तूने आज मुझे वो सुख दिया है जो मुझे कभी नहीं मिला। समीर ने उनके तरबूजों को हल्के से दबाया और मुस्कुरा दिया। उस दोपहर के बाद उन दोनों के बीच एक ऐसा रिश्ता बन गया था जो शब्दों से परे था। वे अब हर उस मौके का इंतज़ार करते थे जब वे अकेले हों और फिर से उस रसीली खुदाई का आनंद ले सकें। चाची अब समीर के लिए सिर्फ एक रिश्तेदार नहीं, बल्कि उसकी सबसे गहरी इच्छाओं की साथी बन गई थीं।