आयशा की मदहोश चुदाई—>कई सालों के बाद जब समीर ने आयशा को देखा, तो उसके पैरों तले जमीन खिसक गई क्योंकि वह पुरानी स्कूल की दुबली-पतली लड़की अब एक बेहद हसीन और जवान औरत बन चुकी थी। आयशा के शरीर का हर हिस्सा अब एक नई कहानी कह रहा था और उसके यौवन की चमक समीर की आँखों में एक अजीब सी प्यास जगा रही थी। समीर को अपनी पुरानी दोस्त के घर इस तरह अचानक आना थोड़ा संकोच भरा लग रहा था, लेकिन आयशा की गर्मजोशी और उसकी आँखों में छिपी शरारत ने सारा संकोच पल भर में खत्म कर दिया। वह एक लाल रंग की साटन की नाइटी पहने हुए थी जो उसके शरीर के उभारों को बहुत ही बारीकी से दुनिया के सामने पेश कर रही थी।
आयशा का कद अब काफी आकर्षक था और उसके शरीर की बनावट किसी तराशी हुई मूर्ति की तरह लग रही थी, जिसे देखकर समीर का मन मचल उठा। उसके सीने पर उभरे हुए दो बड़े और रसीले तरबूज उस पतली साटन की चादर के नीचे अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे और जैसे-जैसे वह सांस लेती, वे तरबूज ऊपर-नीचे होते हुए समीर के दिल की धड़कन बढ़ा रहे थे। उन तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर के दाने जैसे उभार साफ दिखाई दे रहे थे जो शायद कमरे की ठंडी हवा या समीर की मौजूदगी की गर्माहट से सख्त हो गए थे। आयशा ने जब समीर को सोफे पर बैठने के लिए कहा, तो समीर की नजरें अनायास ही उसके चौड़े और मांसल पिछवाड़े पर जा टिकीं जो चलने के साथ एक लय में डोल रहे थे।
हवा में एक अजीब सी खुशबू और भारीपन था जो उन दोनों के बीच के पुराने जज्बात को फिर से जिंदा कर रहा था, और समीर को लग रहा था कि पुरानी दोस्ती अब एक नया मोड़ लेने वाली है। आयशा ने वाइन के दो गिलास भरे और समीर के करीब आकर बैठ गई, जिससे समीर को उसके बदन की सोंधी खुशबू और भी करीब से महसूस होने लगी। वे पुरानी यादों को ताजा कर रहे थे लेकिन दोनों की नजरें एक-दूसरे के होठों और शरीर के उन हिस्सों पर जमी थीं जिन्हें छूने के लिए दोनों ही बेताब थे। आयशा ने बातों-बातों में अपनी टांगें समीर की टांगों से छुआ दीं, जिससे एक बिजली सी समीर के पूरे शरीर में दौड़ गई और उसका मन बेचैन हो उठा।
समीर ने महसूस किया कि आयशा की आँखों में भी वही आग जल रही है जो उसे अंदर ही अंदर जला रही थी, और अब शब्दों की जगह खामोश इशारे लेने लगे थे। उसने धीरे से अपना हाथ आयशा के कंधे पर रखा और धीरे-धीरे नीचे की ओर ले जाते हुए उसके रेशमी कपड़ों को छुआ, जिससे आयशा की एक धीमी सी आह निकल गई। उस पल समीर को समझ आ गया कि अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं बचा है और उसे उस गहरी और अंधेरी खाई की गहराई को मापना ही होगा। आयशा की सांसें तेज हो गई थीं और उसके चेहरे पर एक हल्की सी लाली छा गई थी जो उसकी झिझक और बढ़ती हुई इच्छा का मिला-जुला रूप थी।
समीर ने अपना चेहरा आयशा के चेहरे के करीब लाया और उसके होठों के शहद को चखने लगा, जो बहुत ही मीठा और नशीला था, जिससे दोनों की सुध-बुध खोने लगी। यह उनके बीच का पहला स्पर्श था जो इतना गहरा और प्रभावशाली था कि कमरे का तापमान अचानक से कई गुना बढ़ गया हो ऐसा लगने लगा। समीर के हाथ अब आयशा के भारी तरबूजों पर पहुंच चुके थे, जिन्हें उसने अपने हाथों में भरकर धीरे-धीरे दबाना शुरू किया जिससे आयशा के मुंह से सिसकारी निकल पड़ी। उन तरबूजों की कोमलता और उन पर लगे मटर के दानों की सख्ती समीर के अंदर एक नया जोश भर रही थी और वह उन्हें और भी जोर से मसलने लगा।
आयशा ने समीर की टी-शर्ट उतार दी और उसके मजबूत सीने को अपने हाथों से सहलाने लगी, जबकि समीर उसके बदन के कपड़ों को एक-एक करके अलग करने में जुट गया। जब आयशा पूरी तरह से कुदरती हालत में सामने आई, तो समीर की नजरें उसकी नाभि के नीचे घने काले बालों के बीच छिपी उस रहस्यमयी खाई पर जाकर टिक गईं। वह खाई गुलाबी और गीली लग रही थी, जैसे किसी प्यासे मुसाफिर का इंतजार कर रही हो और उसके आसपास के बाल उसकी सुंदरता को और भी बढ़ा रहे थे। समीर ने अपना हाथ नीचे ले जाकर उस खाई के द्वार को छुआ, तो आयशा ने अपनी कमर ऊपर की ओर उठा दी और उसकी आँखों में एक अजीब सी तड़प दिखाई दी।
समीर ने अपनी उंगली से खाई को खोदना शुरू किया, जिससे आयशा के बदन में एक सिहरन दौड़ गई और वह समीर के बालों को अपनी उंगलियों में जकड़ने लगी। उंगली की उस खुदाई से आयशा का रस निकलने लगा था जिसने उस जगह को और भी चिकना और फिसलन भरा बना दिया था, जिससे समीर का काम आसान हो गया। आयशा अब और बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी, उसने समीर के पजामे को नीचे खींचा और वहां से निकले हुए विशाल और सख्त खीरे को देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। वह खीरा पूरी तरह से तैयार था और अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ आयशा के सामने अपनी ताकत का प्रदर्शन कर रहा था।
आयशा ने उस खीरे को अपने कोमल हाथों में पकड़ा और उसे सहलाते हुए अपने चेहरे के करीब लाई, उसकी खुशबू और उसकी गर्माहट आयशा को पागल कर रही थी। उसने बिना देर किए उस खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे धीरे-धीरे चूसना शुरू किया, जिससे समीर के मुंह से एक लंबी और संतोषजनक आह निकली। खीरा मुंह में लेने की उस प्रक्रिया ने समीर के अंदर एक तूफान खड़ा कर दिया था और वह आयशा के सिर को पकड़कर उसे और गहराई तक ले जाने लगा। आयशा पूरी शिद्दत के साथ उस खीरे का स्वाद ले रही थी और उसे अपने गले तक उतारने की कोशिश कर रही थी जिससे समीर का धैर्य अब जवाब देने लगा था।
समीर ने आयशा को बिस्तर पर लिटाया और खुद उसके ऊपर आकर सामने से खोदने की मुद्रा में तैयार हो गया, जबकि आयशा ने अपनी टांगें पूरी तरह से फैला दी थीं। उसने उस सख्त खीरे की नोक को आयशा की गीली और गरम खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से उसे अंदर की ओर धकेला, जिससे आयशा के चेहरे पर दर्द और सुख का मिला-जुला भाव आया। जैसे-जैसे वह खीरा उस तंग खाई के अंदर समाता गया, आयशा की सांसें रुकने लगीं और उसने समीर की पीठ को अपने नाखूनों से खरोंचना शुरू कर दिया। पूरी तरह से अंदर समा जाने के बाद समीर ने कुछ पल के लिए खुद को रोका ताकि आयशा उस खिंचाव को बर्दाश्त कर सके और फिर शुरू हुई असली खुदाई।
समीर अब पूरी ताकत और लय के साथ उस खाई को खोद रहा था, जिससे कमरे में मांस के टकराने की आवाजें गूंजने लगीं और दोनों के शरीर पसीने से तर-बतर हो गए। हर धक्के के साथ आयशा के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और समीर उन्हें अपने हाथों में भींचते हुए इस खुदाई का आनंद ले रहा था। आयशा अब जोर-जोर से कराह रही थी और उसके मुंह से ‘ओह समीर, और जोर से खोदो’ जैसे शब्द निकल रहे थे जो समीर के जोश को और भी बढ़ा रहे थे। वह गहराई तक जाकर उस खाई के हर कोने को अपने खीरे से महसूस कर रहा था और आयशा का शरीर हर धक्के पर धनुष की तरह मुड़ जाता था।
कुछ देर तक सामने से खोदने के बाद, समीर ने आयशा को घुमाया और उसे पिछवाड़े से खोदने की स्थिति में ला दिया, जिससे उसका मांसल पिछवाड़ा अब समीर के सामने था। उसने फिर से उस खीरे को खाई के अंदर उतारा और अब पीछे से जोर-जोर से झटके देने लगा, जिससे आयशा की चीखें और भी तेज हो गई थीं। इस स्थिति में खुदाई और भी गहरी महसूस हो रही थी और आयशा के पिछवाड़े का कंपन समीर को एक चरम सुख की ओर ले जा रहा था। समीर ने आयशा के बालों को पीछे से पकड़ा और उसे और भी तेजी से खोदना शुरू किया, मानो वह उस खाई की गहराई में कोई खजाना ढूंढ रहा हो।
आयशा का बदन अब जवाब देने लगा था और वह अपने चरम के बेहद करीब थी, उसकी खाई अब बहुत ज्यादा रस छोड़ रही थी जो समीर के खीरे को और भी फिसलन भरा बना रही थी। समीर ने अपनी गति और भी बढ़ा दी और अब वह बिना रुके लगातार प्रहार कर रहा था, जिससे आयशा का पूरा शरीर कांपने लगा था। ‘समीर, मेरा रस निकलने वाला है, मुझे और जोर से खोदो’ आयशा ने चिल्लाते हुए कहा और समीर ने भी अपना सब कुछ झोंक दिया। अचानक आयशा का शरीर अकड़ गया और उसकी खाई से रसों का सैलाब उमड़ पड़ा, जिससे समीर को भी महसूस हुआ कि अब उसका भी रस छूटने वाला है।
समीर ने अंतिम कुछ जोरदार धक्के लगाए और अपना सारा गर्म रस आयशा की उस गहरी खाई के अंदर उड़ेल दिया, जिससे दोनों को एक असीम शांति और सुख का अनुभव हुआ। वे दोनों पसीने में नहाए हुए एक-दूसरे के ऊपर गिर पड़े और उनकी भारी सांसें कमरे के सन्नाटे को तोड़ रही थीं, लेकिन उस सन्नाटे में एक गहरा संतोष छिपा था। आयशा ने समीर को कसकर पकड़ लिया था और उसकी आँखों में अब एक अलग ही चमक थी, जो उन दोनों के बीच के इस शारीरिक और भावनात्मक मिलन की गवाह थी। उस रात उन्होंने केवल शरीर ही नहीं बल्कि अपनी रूह को भी एक-दूसरे में समाहित कर दिया था, और वह पुरानी दोस्ती अब एक अटूट बंधन में बदल चुकी थी।
अगली सुबह जब सूरज की किरणें कमरे में आईं, तो समीर ने आयशा को अपने पास सोए हुए पाया, उसकी सादगी और उसकी थकावट भरी मुस्कान समीर के दिल को छू गई। उसने आयशा के माथे पर एक प्यार भरा चुंबन दिया और महसूस किया कि यह केवल एक रात की खुदाई नहीं थी बल्कि एक नई शुरुआत थी। आयशा ने अपनी आँखें खोलीं और समीर को देखकर मुस्कुराई, उसका चेहरा उस रस के निकलने के बाद और भी खिल उठा था। उन्होंने फिर से एक-दूसरे को गले लगाया और उस अहसास को महसूस किया जो उन्हें दुनिया की हर खुशी से बढ़कर लग रहा था, और वे जानते थे कि अब वे एक-दूसरे के बिना नहीं रह सकते।
इस मिलन ने उनकी पुरानी यादों को एक नया आयाम दिया था और अब वे केवल दोस्त नहीं बल्कि एक-दूसरे की जरूरतों और इच्छाओं के पूरक बन चुके थे। समीर ने आयशा के उन मटर जैसे निप्पलों को फिर से धीरे से छुआ, जिससे आयशा फिर से मुस्कुरा दी और समीर के करीब आ गई। उनकी यह कहानी अब सिर्फ यादों तक सीमित नहीं थी बल्कि हर गुजरते दिन के साथ और भी गहरी और रसभरी होने वाली थी। उस कमरे की दीवारों ने उस रात जो देखा था, वह उनके प्यार और वासना का एक अनूठा संगम था जिसने उनके जीवन को हमेशा के लिए बदल दिया था।