रीना साली की मदहोश चु@@ई—>
गर्मियों की उन लंबी और सुनहरी दोपहरियों में जब सूरज की किरणें खिड़की के पर्दों को भेदकर कमरे के फर्श पर नाचती थीं, तब मेरा मन अक्सर अशांत रहता था। अपनी पत्नी मीरा के साथ ससुराल आए हुए मुझे तीन दिन हो चुके थे, लेकिन मेरी निगाहें हर वक्त अपनी छोटी साली रीना पर टिकी रहती थीं। रीना की उम्र करीब चौबीस साल थी और उसका यौवन इस समय अपने पूरे शबाब पर था, जैसे किसी बागीचे में कोई फल पूरी तरह पककर रस से भर गया हो। उसका रंग गेहूंआ था और उसकी आँखों में एक अजीब सी शरारत और गहराई थी जो मुझे बार-बार अपनी ओर खींचती थी। मीरा और माँ जी बाजार गई हुई थीं और घर में मैं और रीना अकेले थे, सन्नाटा इतना गहरा था कि घड़ी की टिक-टिक भी दिल की धड़कन की तरह सुनाई दे रही थी।
रीना की कद-काठी किसी तराशी हुई मूरत जैसी थी, जिसे कुदरत ने बड़ी फुर्सत से बनाया था। जब वह चलती थी तो उसके दो भारी और गोल-मटोल तरबूज उसकी कुर्ती के नीचे इस तरह हिलते थे जैसे दो लहरें आपस में टकरा रही हों। उन तरबूजों के बीच का गहरा रास्ता मेरी कल्पनाओं को पंख लगा देता था और उन पर उभरे हुए छोटे-छोटे मटर के दाने साफ नजर आते थे जो उसकी उत्तेजना या शायद ठंड की वजह से सख्त हो गए थे। उसका पिछवाड़ा इतना मांसल और सुडौल था कि जब वह झुकती थी, तो कपड़े की तहें उसके उभारों को और भी स्पष्ट कर देती थीं। उसकी पतली कमर और भारी कूल्हों का वह संगम किसी भी मर्द के सब्र का इम्तिहान लेने के लिए काफी था और मैं भी उस परीक्षा में खुद को हारता हुआ महसूस कर रहा था।
रीना किचन में शरबत बना रही थी और मैं ड्राइंग रूम में सोफे पर बैठा उसे देख रहा था। उसके पसीने की हल्की सी गंध और मोगरे के इत्र की खुशबू मिलकर एक नशीला माहौल बना रही थी। हम दोनों के बीच एक अनकहा सा खिंचाव था, जो पिछले दो सालों से धीमे-धीमे बढ़ रहा था, लेकिन लोक-लाज और रिश्तों की मर्यादा ने हमें बाँध रखा था। रीना ने जब मुड़कर मुझे देखा तो उसकी नज़रों में एक ऐसी चमक थी जैसे वह जानती हो कि मेरे मन में क्या चल रहा है। वह मेरे पास आई और शरबत का गिलास बढ़ाते हुए उसकी उंगलियां जानबूझकर मेरी हथेली से टकराईं, जिससे मेरे पूरे शरीर में बिजली की एक लहर दौड़ गई और मेरा मन मचल उठा।
उस स्पर्श ने जैसे बरसों का बांध तोड़ दिया था और मेरे अंदर दबी हुई इच्छाएं उफान मारने लगी थीं। मैंने उसका हाथ पकड़ लिया और उसे अपनी ओर खींच लिया, जिससे वह लड़खड़ाकर सीधे मेरी गोद में आ गिरी। उसके नरम और भारी तरबूज मेरे सीने से दब गए और हम दोनों की साँसें एक-दूसरे के चेहरों पर टकराने लगीं। रीना ने पहले तो थोड़ी झिझक दिखाई और अपनी नज़रें नीची कर लीं, लेकिन उसकी तेज़ चलती धड़कनें बता रही थीं कि वह भी इसी पल का इंतज़ार कर रही थी। कमरे का तापमान अचानक बढ़ गया था और हम दोनों के शरीर से पसीना निकलने लगा था, जो हमारे बीच की गर्मी को और बढ़ा रहा था।
मैंने धीरे से अपना हाथ उसकी पीठ पर फेरा और उसकी साड़ी के पल्लू को खिसका दिया, जिससे उसके गोरे और चमकदार तरबूज मेरे सामने पूरी तरह आ गए। उन पर मौजूद मटर के दाने अब पूरी तरह से खड़े और लाल हो चुके थे, जिन्हें देखकर मेरी प्यास और बढ़ गई। मैंने झुककर उन मटरों को अपने होठों में ले लिया और हल्के से काटने लगा, जिससे रीना के मुंह से एक दबी हुई आह निकली। वह अपनी आँखें बंद करके अपना सिर पीछे की ओर झुका चुकी थी और उसके हाथ मेरे बालों में फंस गए थे, जैसे वह मुझे और करीब आने का इशारा कर रही हो।
अब संयम की सारी सीमाएं टूट चुकी थीं और हम दोनों वासना के उस समुद्र में डूबने के लिए तैयार थे जहाँ सिर्फ जिस्मों की पुकार सुनाई देती थी। मैंने रीना को उठाकर पलंग पर लिटा दिया और उसके कपड़े एक-एक करके उतारने लगा, जैसे किसी अनमोल उपहार की पैकिंग खोली जा रही हो। जब वह पूरी तरह निर्वस्त्र हुई, तो उसका शरीर चांदनी की तरह चमक रहा था और उसके जांघों के बीच की वह गहरी और नम खाई मेरे सामने थी, जिसके चारों ओर काले और रेशमी बाल एक घने जंगल की तरह उगे हुए थे। उस खाई से आती हुई एक सोंधी सी खुशबू ने मेरे दिमाग को पूरी तरह से सुन्न कर दिया था।
मेरा अपना खीरा अब अपनी सीमाओं को पार कर रहा था और वह पूरी तरह से सख्त और तना हुआ था, जैसे वह उस खाई में समाने के लिए व्याकुल हो। मैंने रीना की दोनों टांगों को फैलाया और उस खाई के पास गया, जो अब अपनी नमी से चमक रही थी। मैंने अपनी उंगली से उस खाई की गहराई को नापना शुरू किया, जिससे रीना तड़पने लगी और उसका पिछवाड़ा बिस्तर से ऊपर उठने लगा। मेरी उंगली उस खाई के अंदर और बाहर हो रही थी, जिससे एक चिकनाहट भरा शोर पैदा हो रहा था जो उस कमरे के सन्नाटे को और भी कामुक बना रहा था।
रीना अब और सब्र नहीं कर पा रही थी, उसने मेरा खीरा अपने हाथों में पकड़ लिया और उसे प्यार से सहलाने लगी। उसके हाथों की कोमलता ने मेरे खीरे में और भी जान फूंक दी थी और वह पहले से भी ज्यादा बड़ा और कठोर हो गया था। रीना ने अपना सिर नीचे झुकाया और मेरे खीरे को अपने मुंह के गर्म और नम घेरे में ले लिया। वह उसे इतनी गहराई से चूस रही थी कि मुझे स्वर्ग का अनुभव हो रहा था। उसका जीभ का वह स्पर्श और मुंह की वह गर्माहट मेरे अंदर के ज्वालामुखी को फटने पर मजबूर कर रही थी, लेकिन मैंने खुद को काबू में रखा क्योंकि असली खेल तो अभी शुरू होना था।
मैंने रीना को सीधे लेटने का इशारा किया और उसके ऊपर आ गया, यह सामने से खुदाई करने का सबसे बेहतरीन तरीका था। मैंने अपने खीरे की नोक को उसकी रेशमी बालों वाली खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से एक दबाव बनाया। रीना ने दर्द और सुख के मिले-जुले अहसास में अपनी आँखें जोर से मींच लीं और मेरे कंधों को अपने नाखूनों से जकड़ लिया। जैसे ही मेरा आधा खीरा उस तंग खाई के अंदर गया, मुझे ऐसा लगा जैसे मैं किसी गरम मखमल के अंदर समा रहा हूँ। रीना की वह तंग गुफा मेरे खीरे को चारों तरफ से कस रही थी, जिससे सुख की एक असहनीय लहर मेरे रोम-रोम में दौड़ गई।
मैंने धीरे-धीरे अपनी कमर को हिलाना शुरू किया और अपनी खुदाई की गति बढ़ानी शुरू की। हर धक्के के साथ मेरा पूरा खीरा उस खाई की गहराइयों को छू रहा था और रीना के मुंह से ‘उफ़.. आह.. धीरे..’ जैसे शब्द निकल रहे थे जो बाद में चीखों में बदलने लगे। हमारे शरीर पसीने से तरबतर हो चुके थे और टकराने की आवाज़ कमरे में गूँज रही थी। रीना के भारी तरबूज हर धक्के के साथ ऊपर-नीचे उछल रहे थे और मैं कभी उन्हें अपने हाथों से मसलता तो कभी अपने मुंह में भर लेता। खुदाई अब अपने चरम पर पहुँच रही थी और हम दोनों ही होश खो चुके थे।
रीना ने अपनी टांगें मेरी कमर के चारों ओर लपेट लीं ताकि मैं और गहराई तक खुदाई कर सकूँ। मेरा खीरा अब उस खाई के आखिरी छोर को बार-बार टक्कर मार रहा था, जिससे रीना का पूरा शरीर कांपने लगा था। वह पागलों की तरह मेरा नाम पुकार रही थी और मेरा पिछवाड़ा अपनी ओर खींच रही थी। मैंने उसे दूसरी तरफ पलटा और उसे घुटनों के बल खड़ा कर दिया, ताकि पिछवाड़े से खुदाई की जा सके। यह पोजीशन रीना को और भी ज्यादा उत्तेजित कर रही थी और वह अपने कूल्हों को पीछे की ओर धकेल रही थी ताकि मेरा खीरा पूरा का पूरा उसके अंदर समा जाए।
खुदाई की इस प्रक्रिया में अब एक लय आ गई थी, एक ऐसी लय जो सिर्फ दो प्यासे शरीरों के मिलन से पैदा होती है। कमरे की हवा में अब एक अजीब सी गंध फैल गई थी, जो कामुकता और संतुष्टि का मिश्रण थी। रीना की खाई अब पूरी तरह से रस से गीली हो चुकी थी, जिससे हर अंदर-बाहर होने पर ‘छप-छप’ की आवाज़ आ रही थी। मेरा खीरा भी अब अपनी चरम सीमा पर था और मुझे महसूस हो रहा था कि अब अंदर से सैलाब फूटने वाला है। मैंने अपनी गति को और तेज़ कर दिया और अंतिम कुछ शक्तिशाली धक्के लगाए।
तभी रीना का शरीर जोर से धनुष की तरह मुड़ गया और उसकी खाई की मांसपेशियां मेरे खीरे को अंदर से भींचने लगीं। उसके अंदर से गर्म रस का फव्वारा छूटा और साथ ही मेरे खीरे ने भी अपना सारा गाढ़ा सफेद रस उसकी खाई की गहराई में उड़ेल दिया। वह लम्हा ऐसा था जैसे समय रुक गया हो, हम दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए बेजान से बिस्तर पर गिर पड़े। मेरी साँसें धौंकनी की तरह चल रही थीं और रीना की हालत ऐसी थी जैसे उसने कोई जंग जीत ली हो। उसके माथे पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं और उसके चेहरे पर एक अजीब सी शांति और संतुष्टि का भाव था।
काफी देर तक हम वैसे ही पड़े रहे, सिर्फ एक-दूसरे की धड़कनों को महसूस करते हुए। वह खुदाई सिर्फ जिस्मों का मिलन नहीं थी, बल्कि उन दबी हुई भावनाओं का इज़हार था जो हम बरसों से एक-दूसरे के लिए महसूस कर रहे थे। रीना ने धीरे से मेरी तरफ देखा और मुस्कुराई, उसकी आँखों में अब कोई शर्म नहीं थी, बल्कि एक अपनापन था। मैंने उसके माथे को चूमा और उसे अपनी बाहों में और कस लिया। वह दोपहर हमारे जीवन की सबसे यादगार दोपहर बन गई थी, जिसने हमारे रिश्ते को एक नया और गुप्त आयाम दे दिया था।
जैसे ही बाहर से मीरा की आवाज़ सुनाई दी, हम जल्दी से उठे और अपने बिखरे हुए कपड़ों को समेटने लगे। रीना ने जल्दी से अपनी साड़ी ठीक की और अपने चेहरे को पोंछा ताकि कोई शक न कर सके। लेकिन जब मीरा अंदर आई, तो उसे शायद उस कमरे की हवा में घुली हुई उस खुशबू का अंदाज़ा नहीं था जो अभी-अभी हुई उस भीषण खुदाई की गवाह थी। हम दोनों सामान्य होने का नाटक कर रहे थे, लेकिन हमारी निगाहें जब भी मिलतीं, तो वही पुरानी आग और उस दोपहर का राज याद आ जाता। वह अहसास अब भी मेरे खीरे और उसकी खाई के बीच एक अनकहा धागा बनकर जुड़ा हुआ था।
उस दिन के बाद से हमारे बीच एक मूक सहमति बन गई थी, अब जब भी हम अकेले होते, हमारी निगाहें फिर से वही खेल शुरू कर देतीं। रीना का वह खिला हुआ बदन, उसके वे रसीले तरबूज और वह रेशमी बालों वाली खाई अब मेरे सपनों का हिस्सा बन चुके थे। वह सुख, वह थकान और वह बाद की शांति – सब कुछ इतना वास्तविक और गहरा था कि उसे शब्दों में समेटना मुश्किल था। हमने मर्यादा की लकीर तो पार की थी, लेकिन उस लकीर के पार जो दुनिया हमें मिली थी, वह बेहद खूबसूरत और उत्तेजक थी, जहाँ सिर्फ हम थे और हमारी रूहानी खुदाई थी।