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बचपन की यादें और पुरानी क्रश के साथ बगीचे वाली मदहोश खु@@ई


बचपन की यादें और पुरानी क्रश के साथ बगीचे वाली मदहोश खु@@ई—>

बचपन की उस सहेली श्रेया का चेहरा आज भी मेरे ज़हन में उतना ही ताज़ा था, जितना दस साल पहले हुआ करता था। लेकिन आज जब वह उस पुराने फार्महाउस के सुनसान बगीचे में मेरे सामने खड़ी थी, तो उसकी देह की बनावट ने मेरे होश उड़ा दिए थे। उसकी रेशमी कुर्ती उसके शरीर के उभारों को कुछ इस तरह से लपेटे हुए थी कि मेरी नज़रें उसके भारी-भरकम तरबूजों से हट ही नहीं पा रही थीं। वे तरबूज उसकी कुर्ती के भीतर जैसे आज़ाद होने के लिए छटपटा रहे थे और हर सांस के साथ ऊपर-नीचे होकर मेरी धड़कनें बढ़ा रहे थे। श्रेया की चाल में एक गजब की मदहोशी थी, जब वह घास पर चलती थी तो उसका भारी और गोल पिछवाड़ा एक लय में हिलता था, जो किसी भी मर्द के मन में तूफान पैदा करने के लिए काफी था।

हम दोनों बगीचे के एक एकांत कोने में बनी बेंच पर बैठ गए, जहाँ पेड़ों की घनी छाया हमें दुनिया की नज़रों से छिपा रही थी। पुरानी यादों का सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन बातों-बातों में हमारी आँखों में एक अलग ही चमक और जिस्मों में एक अनजानी तपिश महसूस होने लगी थी। श्रेया का गोरा रंग शाम की ढलती रोशनी में और भी निखर उठा था, और उसकी गहरी भूरी आँखें सीधे मेरे दिल के पार उतर रही थीं। मैंने गौर किया कि जब वह हंसती थी, तो उसके तरबूज हल्का सा कांपते थे, जिससे मेरी प्यास और भी बढ़ जाती थी। वह अब वह छोटी बच्ची नहीं रही थी, बल्कि एक मुकम्मल औरत बन चुकी थी, जिसका अंग-अंग आकर्षण से भरा हुआ था।

बातों का सिलसिला कब खामोशी में बदल गया, पता ही नहीं चला और हम दोनों एक-दूसरे के बेहद करीब आ गए। मैंने धीरे से अपना हाथ उसकी रेशमी कमर पर रखा, तो उसने मना नहीं किया, बल्कि अपनी आँखें मूंद लीं। मेरी उंगलियां उसकी पतली कमर को महसूस कर रही थीं और धीरे-धीरे ऊपर की ओर सरकने लगीं, जहाँ उसके भारी तरबूजों का उभार शुरू होता था। जैसे ही मेरा हाथ उसके एक तरबूज पर पहुँचा, उसने एक गहरी आह भरी और अपना सिर मेरे कंधे पर टिका दिया। उसके जिस्म की खुशबू और उसकी गरम सांसें मुझे पागल कर रही थीं, और मेरा मन कर रहा था कि बस यहीं इस हसीन मंज़र को थाम लूँ।

श्रेया की सांसें अब तेज़ होने लगी थीं और उसका शरीर हल्का सा कांप रहा था। मैंने अपने दूसरे हाथ से उसके चेहरे को ऊपर उठाया और उसके लबों की नरमी को चखने लगा। हमारे होंठ जब एक-दूसरे से मिले, तो जैसे बिजली का एक झटका सा लगा और सारी झिझक हवा में उड़ गई। मैं उसके तरबूजों को अपनी हथेलियों में भरकर हल्के से दबाने लगा, जिससे वे और भी कड़े महसूस होने लगे। कुर्ती के कपड़े के ऊपर से ही मुझे उसके मटर जैसा सख्त अहसास होने लगा था, जो इस बात का सबूत था कि वह भी उतनी ही उत्तेजित है जितना कि मैं।

मदहोशी इस कदर हावी हो गई कि मैंने उसे घास के नरम बिछौने पर लेटा दिया। शाम का धुंधलका और पेड़ों की ओट हमें पूरी तरह से सुरक्षित महसूस करा रही थी। मैंने धीरे से उसकी कुर्ती के बटन खोले, तो दूध जैसे सफेद और भारी तरबूज मेरे सामने नमूदार हो गए। उनकी गोलाई और उन पर मौजूद गहरे गुलाबी मटर को देखकर मेरा रोम-रोम खिल उठा। मैंने अपनी ज़बान से उन मटरों को सहलाना शुरू किया, तो श्रेया के मुंह से एक दबी हुई कराह निकल गई और उसने मेरे बालों को मजबूती से पकड़ लिया। वह अपनी कमर को ऊपर की ओर झटका दे रही थी, जैसे वह और भी गहरा स्पर्श चाहती हो।

अब मेरी नज़रें उसके नीचे के हिस्से पर टिकी थीं। जैसे ही मैंने उसकी सलवार को नीचे सरकाया, उसकी गहरी और रसीली खाई मेरे सामने थी। वह खाई घने रेशमी बालों से ढकी हुई थी, जो उसकी कामुकता को और भी बढ़ा रहे थे। मैंने अपनी उंगली से उस खाई को टटोलना शुरू किया, तो पाया कि वह पहले से ही गीली और चिपचिपी हो चुकी थी। श्रेया की आहें अब तेज हो रही थीं और वह अपनी टांगें फैलाकर मुझे और करीब आने का निमंत्रण दे रही थी। मैंने उसकी खाई में अपनी उंगली डाली और धीरे-धीरे अंदर-बाहर करने लगा, जिससे वह बेतहाशा तड़पने लगी।

मेरा अपना खीरा अब पूरी तरह से अकड़ चुका था और अपनी आज़ादी के लिए बेताब था। जब मैंने उसे बाहर निकाला, तो श्रेया की आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने धीरे से हाथ बढ़ाकर मेरे खीरे को छुआ और उसकी लंबाई व मोटाई को महसूस किया। फिर उसने झुककर मेरे खीरे को अपने मुंह में ले लिया और उसे चूसने लगी। उसके मुंह की गर्मी और उसकी ज़बान का जादू मुझे जन्नत का अहसास करा रहा था। वह बड़ी कुशलता से खीरे को चूस रही थी, जिससे मुझे लगा कि मेरा रस अभी निकल जाएगा।

लेकिन असली खेल तो अभी शुरू होना था। मैंने उसे सीधा लेटाया और उसके दोनों पैरों को अपने कंधों पर रख लिया। मेरा खीरा उसकी खाई के मुहाने पर था, जो पूरी तरह से रस से भीगी हुई थी। जैसे ही मैंने ज़ोर का धक्का दिया और सामने से खोदा, श्रेया की एक तीखी चीख निकल गई, लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि चरम सुख की थी। मेरा खीरा उसकी तंग और गरम खाई की गहराई को नाप रहा था। हर धक्के के साथ उसके तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और हमारे शरीर पसीने से लथपथ होकर एक-दूसरे से चिपक रहे थे।

कुछ देर तक सामने से खोदने के बाद मैंने उसे पलटने के लिए कहा। अब वह अपने घुटनों और हाथों के बल खड़ी थी, और उसका भारी पिछवाड़ा ऊपर की ओर उठा हुआ था। यह नज़ारा इतना कामुक था कि मेरी उत्तेजना सातवें आसमान पर पहुँच गई। मैंने पीछे से अपना खीरा उसकी खाई में उतारा और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। हर धक्के के साथ उसकी आवाज़ गूंज रही थी और वह अपने दोनों हाथों से घास को कसकर पकड़े हुए थी। उसका पिछवाड़ा मेरे पेट से टकरा रहा था और थप-थप की आवाज़ पूरे माहौल को और भी उत्तेजक बना रही थी।

खुदाई की गति अब बहुत तेज़ हो चुकी थी। हम दोनों ही अपने चरम की ओर बढ़ रहे थे। श्रेया लगातार कह रही थी, “और तेज़… मुझे और गहराई तक खोदो!” उसकी ये बातें मुझे और भी जोश से भर रही थीं। अचानक मुझे महसूस हुआ कि मेरे अंदर का लावा फटने वाला है। ठीक उसी समय श्रेया ने भी एक लंबी कराह भरी और उसका पूरा शरीर कांपने लगा। उसकी खाई ने मेरे खीरे को कसकर जकड़ लिया और हम दोनों का रस एक साथ निकल पड़ा। हम दोनों वहीं घास पर एक-दूसरे की बाहों में गिर पड़े, बेदम और पूरी तरह से संतुष्ट।

उस गहरी खुदाई के बाद की वो खामोशी और भी सुकून देने वाली थी। हम दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए थे, और हमारी धड़कनें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। श्रेया के चेहरे पर एक अजीब सी संतुष्टि और चमक थी, जो बता रही थी कि यह सिर्फ शारीरिक सुख नहीं बल्कि बरसों की दबी हुई इच्छाओं का मिलन था। हमने अपने कपड़े ठीक किए और फिर से एक-दूसरे का हाथ थाम लिया। वह शाम हमारे लिए हमेशा के लिए यादगार बन गई थी, जिसने हमारी पुरानी दोस्ती में एक नया और गहरा रंग भर दिया था। हमने वादा किया कि यह मुलाकात आखिरी नहीं होगी, और उस सुनसान बगीचे की घास हमारे उस गुप्त और हसीन लम्हे की गवाह बनी रही।

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