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मदहोश दोपहर और मौसी की गहरी खाई की प्यास

नेहा मौसी की उम्र करीब पैंतीस साल रही होगी, लेकिन उनके बदन की सुडौलता किसी बीस साल की लड़की को भी मात देने के लिए काफी थी। जब भी वह घर में हल्की साड़ी पहनकर घूमतीं, तो उनके पीछे का भारी पिछवाड़ा हर कदम के साथ एक अलग ही ताल में थिरकता महसूस होता था। रोहन पिछले एक हफ्ते से उनके घर पर रुका हुआ था और उसकी नजरें अक्सर मौसी के उस उभार पर टिक जाती थीं जिसे ढकने की नाकाम कोशिश उनकी साड़ी किया करती थी। मौसी के बदन के तरबूज इतने बड़े और रसीले लगते थे कि रोहन का मन करता कि बस एक बार उन्हें अपने हाथों में भरकर देख ले कि उनमें कितनी मिठास छिपी है। उनकी साड़ी के ब्लाउज से अक्सर उनके मटर जैसे निप्पल अपनी मौजूदगी का अहसास कराते थे, जिसे देखकर रोहन के पायजामे के अंदर उसका खीरा अपनी जगह बनाने के लिए छटपटाने लगता था।

उस दोपहर घर में कोई नहीं था और मौसी सोफे पर लेटकर कोई किताब पढ़ रही थीं, उनकी साड़ी का पल्लू नीचे फर्श पर गिरा हुआ था। उनके दोनों विशाल तरबूज ब्लाउज की तंग कैद से बाहर निकलने को बेताब दिख रहे थे और उनकी गहरी खाई वाली नाभि साफ़ नजर आ रही थी। रोहन पास ही बैठा था और उसकी नजरें बार-बार मौसी के उन अंगों पर जाकर ठहर रही थीं जो किसी भी मर्द को पागल करने के लिए काफी थे। मौसी ने भी शायद रोहन की बेचैनी भांप ली थी क्योंकि उन्होंने अपनी टांगों को थोड़ा और फैला लिया जिससे उनके जांघों के ऊपर के बाल हल्की सी झलक दे गए। रोहन के खीरा ने अब पूरी तरह से अंगड़ाई ले ली थी और उसे अपने कपड़ों के ऊपर से ही महसूस किया जा सकता था, जो मौसी की नजरों से छिपा नहीं रहा।

महोली में एक अजीब सी गर्मी और खामोशी थी, जिसे सिर्फ उन दोनों की बढ़ती हुई सांसों की आवाज तोड़ रही थी। रोहन ने हिम्मत जुटाकर मौसी के पास जाकर उनके कंधे पर हाथ रखा, तो मौसी के बदन में एक बिजली सी दौड़ गई और उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं। रोहन का हाथ धीरे-धीरे नीचे की ओर सरकने लगा और जैसे ही उसने मौसी के एक भारी तरबूज को अपनी हथेलियों में भरा, मौसी के मुंह से एक दबी हुई आह निकल गई। उनके मटर अब और भी सख्त हो गए थे और रोहन उन्हें अपनी उंगलियों के बीच मसलने लगा जिससे मौसी का पूरा बदन कांप उठा। मौसी ने रोहन को अपनी ओर खींचा और उसके होंठों को अपने होंठों से ऐसे मिला लिया जैसे वो बरसों की प्यासी हों और रोहन का खीरा अब पूरी तरह से खड़ा होकर अपनी बारी का इंतजार करने लगा।

रोहन ने धीरे से मौसी की साड़ी और पेटीकोट को ऊपर उठाया जिससे उनकी मखमली खाई पूरी तरह से सामने आ गई जहाँ काले घने बाल उसे और भी रहस्यमयी बना रहे थे। मौसी की खाई से अब हल्का-हल्का रस रिसने लगा था जो इस बात का सबूत था कि वह भी उतनी ही उत्तेजित थीं जितना कि रोहन खुद था। रोहन ने अपनी जीभ से मौसी की खाई को चखना शुरू किया और जैसे ही उसने गहराई में अपनी जीभ डाली, मौसी ने उसके सिर को कसकर पकड़ लिया और जोर-जोर से कराहने लगीं। खाई को अच्छी तरह से गीला करने के बाद रोहन ने अपनी उंगली से उसमें खुदाई शुरू की जिससे मौसी का पिछवाड़ा हवा में उछलने लगा और वो बार-बार रोहन का नाम पुकारने लगीं।

अब रोहन की बर्दाश्त की हद खत्म हो रही थी, उसने अपना कड़क खीरा बाहर निकाला जो अपनी पूरी लंबाई और मोटाई के साथ मौसी की खाई के दरवाजे पर दस्तक दे रहा था। मौसी ने खुद अपने हाथों से रोहन के खीरा को पकड़ा और उसे अपनी खाई के छेद पर सेट किया और फिर एक झटके में रोहन ने खुदाई शुरू कर दी। जैसे ही खीरा पूरा अंदर गया, मौसी की आँखों से खुशी के आंसू निकल आए और उन्होंने रोहन को कसकर जकड़ लिया। कमरे में अब सिर्फ मांस से मांस टकराने की आवाजें और मौसी की सिसकारियां गूंज रही थीं, रोहन बड़े ही सलीके से सामने से खुदाई कर रहा था और हर धक्के के साथ उसका खीरा मौसी की खाई की गहराई को नाप रहा था।

कुछ देर बाद रोहन ने मौसी को पलट दिया और उनके भारी पिछवाड़े को ऊपर उठाकर पीछे से खुदाई शुरू की, जिसे देखकर ऐसा लग रहा था जैसे कोई हल खेत की गहराई तक जा रहा हो। मौसी घोड़ी बनी हुई थीं और उनके तरबूज नीचे लटककर झूल रहे थे, रोहन ने पीछे से धक्के मारते हुए उन तरबूजों को अपने हाथों में पकड़ लिया और उन्हें जोर-जोर से दबाने लगा। खुदाई की यह प्रक्रिया इतनी दमदार थी कि मौसी का पूरा शरीर पसीने से तर-बतर हो चुका था और उनकी आवाज अब चीखों में बदलने लगी थी। रोहन का खीरा अब अपने चरम पर था और मौसी की खाई की गर्मी उसे फटने पर मजबूर कर रही थी, दोनों का तालमेल अब पूरी तरह से चरम सीमा पर पहुँच चुका था।

अंत में जब मौसी ने अपने पैरों से रोहन की कमर को कस लिया, तो रोहन ने अपने खीरे का पूरा रस मौसी की खाई की गहराइयों में छोड़ दिया और मौसी का भी रस निकलना शुरू हो गया। दोनों एक-दूसरे के ऊपर निढाल होकर गिर पड़े और काफी देर तक सिर्फ एक-दूसरे की धड़कनों को महसूस करते रहे, कमरा शांत था लेकिन उस शांति में एक अजीब सा सुकून और तृप्ति थी। मौसी के चेहरे पर एक अलग ही चमक थी और रोहन को भी अपनी मौसी के बदन के हर कोने को खोदने के बाद जो शांति मिली थी, वो शब्दों में बयान करना मुश्किल था। इस गहरी खुदाई के बाद उनके बीच का रिश्ता अब सिर्फ मौसी-भांजे का नहीं रहा था, बल्कि उसमें एक गहरी कामुकता और शारीरिक जुड़ाव की नई इबारत लिखी जा चुकी थी।

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