होटल का अनजाना सफर और रेशमी रात—>रात के सन्नाटे में होटल के गलियारे बिल्कुल शांत थे, लेकिन मेरे कमरे के भीतर धड़कनों का शोर बढ़ता जा रहा था। मीरा जी, जो मेरे बगल वाले कमरे में रुकी थीं और जिनसे मेरी मुलाकात केवल दो दिन पहले हुई थी, अचानक बर्फ मांगने के बहाने मेरे कमरे में आईं। उनकी उम्र करीब चौंतीस साल थी और उनकी आंखों में एक ऐसी प्यास झलक रही थी जो शब्दों से परे थी। वे एक काले रंग की रेशमी नाइटी में थीं, जिसके गहरे गले से उनके उभरे हुए गोरे और बेहद भारी तरबूज साफ झलक रहे थे, और उनकी गहरी खाई जैसी क्लीवेज मेरे मन को विचलित करने के लिए काफी थी।
जैसे ही वह सोफे पर बैठीं, उनके शरीर से आती चमेली की खुशबू ने पूरे कमरे के वातावरण को कामुक बना दिया। उनके तरबूज इतने बड़े और सख्त लग रहे थे कि रेशमी कपड़े के भीतर से वे बाहर आने को बेताब दिख रहे थे। उनके बैठने के अंदाज से उनके तरबूजों के ऊपर छोटे-छोटे मटर जैसे उभार साफ दिखाई दे रहे थे, जो शायद कमरे की ठंडक या उनकी आंतरिक उत्तेजना की गवाही दे रहे थे। उनका पिछवाड़ा सोफे की गद्दी पर इस तरह फैला हुआ था कि उसकी गोलाई और उभार देखकर किसी भी पुरुष की सांसें थम सकती थीं, वह पूरी तरह से एक कामुक और परिपक्व प्रतिमा की तरह लग रही थीं।
हमने व्हिस्की के छोटे-छोटे घूंट भरे और बातों का सिलसिला धीरे-धीरे गहराने लगा। मेरा खीरा मेरी पतलून के भीतर अब करवटें लेने लगा था और उसकी बढ़ती हुई लंबाई और मोटाई को छिपाना नामुमकिन होता जा रहा था। मीरा जी ने शायद यह नोटिस कर लिया था क्योंकि उनकी मदहोश नजरें बार-बार मेरी पतलून के उस उभार पर टिक जाती थीं। हम दोनों के बीच एक अनकहा आकर्षण जन्म ले चुका था, लेकिन समाज और नैतिकता की झिझक अभी भी आड़े आ रही थी। हालांकि, उनकी चढ़ती हुई सांसें और चेहरे पर आती लालिमा साफ बता रही थी कि उनके भीतर भी एक ज्वालामुखी फटने के लिए तैयार खड़ा है।
आखिरकार मैंने अपनी झिझक को दरकिनार करते हुए साहस जुटाया और अपना हाथ उनके कोमल और रेशमी कंधे पर रख दिया। वे एक पल के लिए कांप उठीं, लेकिन उन्होंने मेरा हाथ हटाया नहीं, बल्कि अपनी आंखें मूंद लीं। मैंने धीरे से अपना हाथ नीचे की ओर सरकाया और उनके उन भारी तरबूज को अपनी हथेलियों में भर लिया। वे इतने मुलायम, भरे हुए और गर्म थे कि मुझे महसूस हुआ जैसे मैं साक्षात स्वर्ग को छू रहा हूँ। उन्होंने एक गहरी आह भरी और अपना सिर पीछे की ओर झुका दिया, जिससे उनकी सुराहीदार गर्दन का आकर्षण और भी बढ़ गया। मैंने अपनी उंगलियों से उनके मटर को सहलाना शुरू किया तो वे सिसक उठीं।
अब सब्र का हर बांध टूट चुका था और हम दोनों एक-दूसरे की बाहों में थे। मैंने उनकी नाइटी के पट्टे सरका दिए और उनके विशाल तरबूजों को अपनी जीभ से सहलाना शुरू किया। जब मेरी जीभ उनके उन कड़े मटरों पर लगी, तो मीरा जी ने बेतहाशा कराहते हुए मेरे बालों को अपनी मुट्ठियों में भींच लिया। मैंने अपना हाथ नीचे की ओर बढ़ाया और उनके रेशमी कपड़ों के भीतर उनकी खाई को तलाशने लगा। वहाँ पहले से ही रस की नदियां बह रही थीं और उनकी खाई के चारों ओर मौजूद छोटे-छोटे बाल मेरे हाथों में मखमल की तरह चुभ रहे थे। उनकी उत्तेजना अब अपने चरम पर पहुंच चुकी थी और वे बस मेरा साथ चाहती थीं।
मैंने अपनी पतलून उतार फेंकी और मेरा छह इंच का फन फैलाए हुए गर्म खीरा पूरी तरह से आजाद होकर उनकी आंखों के सामने आ गया। मीरा जी ने बड़ी हसरत भरी निगाहों से मेरे खीरे को देखा और फिर उसे अपने कोमल हाथों में थाम लिया। उन्होंने झुककर बड़े प्यार से मेरे खीरे को अपने मुंह में भर लिया और खीरा चूसना शुरू किया। उनके मुंह की गर्माहट और उनकी जीभ की लचक ने मुझे पागलपन की हद तक पहुंचा दिया। वे बड़े सलीके से खीरा चूस रही थीं, जैसे कोई कीमती फल चख रही हों। कुछ ही पलों में मेरा पूरा शरीर कंपन करने लगा और मुझे लगा कि बस अब और बर्दाश्त नहीं होगा।
अब समय था उस असली खुदाई का जिसके लिए हम दोनों तड़प रहे थे। मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया और उनके पैरों को फैलाकर अपनी जगह बनाई। मैंने अपना फन फैलाया हुआ खीरा उनकी रसभरी खाई के मुहाने पर रखा और धीरे से एक गहरा धक्का दिया। मीरा जी के मुंह से एक तीखी लेकिन सुखद चीख निकली और उन्होंने मुझे अपनी बाहों में कस लिया। जैसे-जैसे मैं उन्हें सामने से खोदने लगा, कमरे में हमारे शरीरों के टकराने की आवाजें गूंजने लगीं। फिर मैंने उन्हें घुमाकर उनके पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। उनके पिछवाड़े का मांस मेरे हर धक्के के साथ थरथरा रहा था और वे अपनी कमर को पीछे धकेल कर मेरे खीरे को और गहराई तक बुला रही थीं।
खुदाई की गति अब बहुत तेज और दमदार हो चुकी थी। हम दोनों पसीने से लथपथ थे और केवल हमारी भारी सांसों की आवाजें ही सुनाई दे रही थीं। जैसे ही मैंने आखिरी कुछ शक्तिशाली धक्के लगाए, मेरा सारा रस निकलना शुरू हो गया और उनकी खाई की गहराइयों में जाकर समा गया। मीरा जी भी कांपते हुए शांत हो गईं, उनका भी रस पूरी तरह से निकल चुका था। खुदाई के बाद हम दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए उसी हालत में बिस्तर पर पड़े रहे। उनकी थकी हुई आंखों में एक अजीब सा सुकून और तृप्ति थी। उस रात के बाद हमारा रिश्ता सिर्फ अजनबियों का नहीं रहा, बल्कि उन यादों का हिस्सा बन गया जो रूह तक को भिगो देती हैं।