रात के सफर की एक मदहोश चु@@ई का एहसास —>
ट्रेन की उस कूपे में हवा जैसे ठहर गई थी। दिल्ली से मुंबई जाने वाली राजधानी एक्सप्रेस की गड़गड़ाहट के बीच मेरा दिल अपनी ही रफ्तार से धड़क रहा था। सामने वाली सीट पर बैठी उस अजनबी महिला की रेशमी साड़ी की सरसराहट मुझे बार-बार बेचैन कर रही थी। उसका नाम शायद माया था, जो उसने टिकट चेक कराते समय टीटीई को बताया था।
माया की गहरी आँखों में एक अजीब सी तड़प और गहराई थी, जो शब्दों के बिना ही बहुत कुछ कह रही थी। खिड़की के बाहर रात का घना अंधेरा था, पर कूपे की हल्की पीली रोशनी उसके चेहरे की चमक को और उभार रही थी। जब भी हमारी निगाहें मिलतीं, वह धीरे से अपनी पलकें झुका लेती, जैसे कोई गहरा राज मुझसे छुपा रही हो।
सफर आगे बढ़ता गया और कूपे में खामोशी और गहरी होती गई। अचानक ट्रेन ने एक तेज मोड़ लिया और माया का संतुलन बिगड़ गया। वह सीधे मेरी बाहों में आ गिरी। उसके शरीर की गर्माहट ने मेरे भीतर एक बिजली सी दौड़ा दी। उसकी सांसों की खुशबू, जिसमें मोगरे और पसीने का एक मिला-जुला नशा था, मेरे दिमाग पर छाने लगी थी।
मैंने उसे सँभालने के बहाने उसके रेशमी हाथों को छुआ। उसकी त्वचा मखमल जैसी नरम और गर्म थी। माया ने अपनी आँखें ऊपर उठाईं, जिनमें अब झिझक की जगह एक आमंत्रण था। उसने अपना हाथ नहीं हटाया, बल्कि मेरी उंगलियों को कसकर थाम लिया। उस पल मुझे एहसास हुआ कि यह रात सिर्फ सफर के लिए नहीं, बल्कि कुछ और ही होने वाली थी।
हम दोनों के बीच अब कोई दूरी नहीं बची थी। मैंने अपनी उंगलियां उसकी साड़ी के पल्लू पर फिराईं। पल्लू धीरे से खिसक कर नीचे गिर गया, जिससे उसके ब्लाउज में दबे दो रसीले तरबूज साफ नजर आने लगे। उन तरबूज का उभार इतना मदहोश करने वाला था कि मेरी धड़कनें बेकाबू हो गईं। वह शर्म से लाल हो गई पर उसने मना नहीं किया।
मेरे हाथ धीरे-धीरे उन तरबूज की ओर बढ़े। जैसे ही मैंने उन्हें छुआ, माया के मुँह से एक हल्की सी आह निकली। ब्लाउज के पतले कपड़े के ऊपर से ही उसके मटर जैसे सख्त हो रहे हिस्से मेरी हथेलियों को चुभने लगे। उन मटर को मैंने अपनी उंगलियों के बीच हल्के से दबाया, जिससे उसकी पूरी देह एक अज्ञात सिहरन से कांप उठी।
माया की सांसें अब तेज हो चुकी थीं। उसने अपना सिर पीछे की ओर झुका दिया, जिससे उसकी गर्दन की सुराहीदार बनावट और निखर आई। मैंने अपनी जुबान से उसकी गर्दन पर एक गीला निशान छोड़ा। वह उत्तेजना में मुझे अपनी ओर और जोर से खींचने लगी। उसके तरबूज अब मेरी छाती से बुरी तरह मसले जा रहे थे, जो हमें और करीब ला रहे थे।
धीरे-धीरे मेरा हाथ उसकी नाभि से होता हुआ नीचे की ओर सरकने लगा। वहाँ रेशमी साड़ी के नीचे एक घनी और मखमली खाई इंतज़ार कर रही थी। जैसे ही मेरी उंगलियों ने उस खाई की गहराई को टटोला, माया ने अपनी टांगें सिकोड़ लीं। वहाँ रेशमी बाल काफी घने और मुलायम थे, जो मेरी उंगलियों को सहला रहे थे। वह खाई अब पूरी तरह गीली हो चुकी थी।
मेरी पैंट के अंदर मेरा खीरा अब अपनी पूरी ताकत से बाहर आने को बेताब था। माया ने भी उस खीरे की कठोरता को अपनी जांघों पर महसूस किया। उसने कांपते हाथों से मेरी पैंट की जिप खोली और उस विशाल खीरे को बाहर निकाल लिया। उसकी आंखों में उस खीरे को देखकर एक चमक आ गई, जैसे उसे इसी का इंतज़ार था।
माया ने झुककर उस खीरे को अपने होठों के करीब लाया। अगले ही पल वह बड़े प्यार से खीरा चूसना शुरू कर चुकी थी। उसके मुँह की गर्माहट और जीभ की फिसलन ने मुझे स्वर्ग जैसा सुख दिया। वह जिस लय में खीरा चूसना जारी रखे हुए थी, उससे मेरा पूरा शरीर पसीने से तर-बतर हो गया। कूपे में सिर्फ उसके चूसने की आवाज गूंज रही थी।
अब मुझसे और सब्र नहीं हो रहा था। मैंने उसे सीट पर लेटा दिया और उसकी टांगों को फैलाकर उस गहरी खाई के सामने आ गया। मैंने धीरे से अपने खीरे का सिरा उस खाई के मुहाने पर टिकाया। माया ने कसकर चादर पकड़ ली। जैसे ही मैंने पहला धक्का लगाया, मेरा खीरा उस तंग खाई के अंदर समाने लगा। यह खुदाई का असली आनंद था।
हम सामने से खोदना जारी रखे हुए थे। हर धक्के के साथ माया के तरबूज ऊपर-नीचे उछल रहे थे और उनके ऊपर के मटर और भी लाल और सख्त हो गए थे। ट्रेन की गड़गड़ाहट हमारी खुदाई की लय के साथ मिल गई थी। वह बार-बार मेरे कानों में फुसफुसा रही थी कि मैं उसे और जोर से खोदूँ, उसे और गहराई तक महसूस करूँ।
माया की उत्तेजना अब चरम पर थी। उसने मुझे पलट दिया और खुद मेरे ऊपर आकर बैठ गई। अब वह खुद को मेरे खीरे पर ऊपर-नीचे कर रही थी। उसकी खाई से निकलता हुआ चिपचिपा तरल पदार्थ हमारे शरीर को और भी फिसलन भरा बना रहा था। इस खुदाई में एक ऐसी रूहानी तड़प थी, जो शब्दों में बयां करना नामुमकिन था।
कुछ देर बाद, मैंने उसे घुमाया और उसे घुटनों के बल बिठा दिया। अब मैं पिछवाड़े से खोदना शुरू करने वाला था। उसका पिछवाड़ा काफी सुडौल और बड़ा था। जैसे ही मैंने पीछे से अपना खीरा उसकी खाई में उतारा, वह दर्द और मजे के मिले-जुले अहसास से चीख पड़ी। मेरी उंगलियां उसके तरबूज को कसकर भींच रही थीं, जो अब पसीने से भीग चुके थे।
खुदाई की गति अब बहुत तेज हो चुकी थी। हम दोनों का शरीर पसीने से लथपथ था और हवा में एक खास किस्म की गंध फैल गई थी। माया का शरीर अब तेज झटके लेने लगा था। मुझे महसूस हुआ कि उसके अंदर से ढेर सारा रस निकलना शुरू हो गया है। उस रस की गर्माहट ने मेरे खीरे को और भी उत्तेजित कर दिया।
अगले ही पल, मेरा भी संयम टूट गया। मैंने एक आखिरी गहरा धक्का लगाया और मेरे खीरे से भी भारी मात्रा में रस निकलना शुरू हो गया, जो सीधे उसकी खाई की गहराइयों में जाकर समा गया। हम दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए हाफ रहे थे। वह रस निकलना हमें एक अजीब सी शांति और सुकून दे गया था, जो रूह तक पहुँच गया।
काफी देर तक हम बिना कुछ बोले एक-दूसरे की बाहों में पड़े रहे। ट्रेन अपनी मंजिल की ओर बढ़ रही थी, पर हमारे लिए समय जैसे थम गया था। माया ने अपना सिर मेरी छाती पर रख दिया और अपनी उंगलियों से मेरे सीने के बालों को सहलाने लगी। इस खुदाई ने दो अजनबियों को एक जन्मों पुराने रिश्ते में बांध दिया था।
सूरज की पहली किरणें जब खिड़की से अंदर आईं, तो हमारा सफर खत्म होने वाला था। माया ने धीरे से अपनी साड़ी ठीक की और अपने बिखरे हुए बालों को सँवारा। उसकी आँखों में अब एक संतोष था। स्टेशन आते ही उसने मेरा हाथ दबाया और बिना कुछ कहे भीड़ में खो गई, पर उस रात की चु@@ई की यादें हमेशा के लिए अमर हो गईं।