गर्मी की उन लंबी और सुनसान दोपहरों में जब सारा शहर जैसे किसी गहरी नींद में सोया होता था, मैं अपनी बुआ रेखा के घर छुट्टियां बिताने गया हुआ था। रेखा बुआ की उम्र करीब अडतीस साल रही होगी, लेकिन उनकी काया ऐसी थी जिसे देख कर कोई भी मंत्रमुग्ध हो जाए। उनका शरीर किसी ढलती हुई शाम की तरह नहीं बल्कि दोपहर की तपती धूप की तरह उत्तेजक था। उनके शरीर का हर घुमाव एक नई कहानी कहता था। वह जब चलती थीं तो उनके रेशमी साड़ी के नीचे दबे उनके दो बड़े और रसीले तरबूज हल्की सी लय में ऊपर-नीचे होते थे, जो मेरे जैसे जवान लड़के के मन में हलचल पैदा करने के लिए काफी थे। उनके चेहरे पर एक ऐसी मासूमियत थी जिसके पीछे गहरा अकेलापन और दबी हुई इच्छाएं साफ झलकती थीं।
रेखा बुआ के शरीर की बनावट वाकई में काबिले तारीफ थी, उनके कमर की गोलाई और फिर नीचे की ओर बढ़ता उनका भारी पिछवाड़ा किसी को भी अपना दीवाना बना सकता था। जब वह रसोई में काम करती थीं और झुककर कोई सामान उठाती थीं, तो उनकी साड़ी के पल्लू से झांकते उनके गोल तरबूज और उन पर उभरे हुए छोटे-छोटे मटर के दाने जैसे निप्पल मेरी नसों में खून की गति बढ़ा देते थे। उनकी त्वचा मखमली और गेहुंए रंग की थी जो पसीने की बूंदों से भीग कर और भी ज्यादा चमकने लगती थी। उस दिन घर में कोई नहीं था और बाहर लू चल रही थी, खिड़कियों के पर्दे गिरे हुए थे जिससे कमरे में एक धुंधली और मादक रोशनी फैली हुई थी।
हमारे बीच एक अजीब सा खिंचाव शुरू हो चुका था जो शब्दों से परे था। मैं अक्सर उन्हें छुप-छुप कर देखा करता था और शायद उन्हें इस बात का एहसास था। उस दोपहर जब मैं हॉल में बैठा था, वह मेरे पास आकर बैठ गईं और पंखे की हवा का आनंद लेने लगीं। उनके शरीर से सौंधी सी खुशबू आ रही थी जो मेरे दिमाग पर नशा चढ़ा रही थी। धीरे-धीरे बातों का सिलसिला शुरू हुआ, लेकिन उनकी आँखों में एक अलग ही चमक थी। उन्होंने अपना हाथ मेरी जांघ पर रखा, जिससे मेरे शरीर में एक बिजली सी कौंध गई। वह स्पर्श बहुत ही कोमल था लेकिन उसमें जो संदेश था वह बहुत ही गहरा और उत्तेजक था।
मेरे मन में एक द्वंद्व चल रहा था, एक तरफ रिश्तों की मर्यादा थी और दूसरी तरफ वह प्रबल आकर्षण जो मुझे उनकी ओर खींच रहा था। लेकिन जब उन्होंने मेरी आँखों में अपनी गहरी आँखें डालीं, तो मेरी सारी झिझक जैसे भाप बनकर उड़ गई। उनके होंठ कांप रहे थे और उनकी सांसें तेज चलने लगी थीं। उन्होंने धीरे से अपना हाथ ऊपर की ओर सरकाया, जिससे मेरा खीरा अपनी जगह पर तनाव महसूस करने लगा। उनकी उंगलियों का स्पर्श इतना जादुई था कि मैं खुद को रोक नहीं पाया और मैंने उनका हाथ पकड़ लिया। वह मुस्कुराईं, एक ऐसी मुस्कुराहट जिसमें शर्म भी थी और बरसों की प्यास भी।
पहला वास्तविक स्पर्श तब हुआ जब मैंने धीरे से अपना हाथ उनकी पीठ पर रखा और उन्हें अपनी ओर खींचा। उनकी सांसों की गर्माहट मेरे चेहरे पर महसूस हो रही थी। उन्होंने अपनी आँखें बंद कर लीं और मैंने धीरे से उनके गले पर अपने होंठ रख दिए। उनकी एक दबी हुई आह निकली जिसने माहौल को और भी कामुक बना दिया। धीरे-धीरे मेरा हाथ उनके पल्लू को हटाकर उनके रसीले तरबूजों तक पहुंच गया। वह इतने मुलायम और गर्म थे कि उन्हें छूते ही मेरा रोम-रोम पुलकित हो उठा। मैंने अपने अंगूठे से उनके उन छोटे मटर जैसे सिरों को सहलाया, जिससे उनकी कराह और भी तेज हो गई और वह मेरे और करीब आ गईं।
जैसे-जैसे समय बीतता गया, हमारी उत्तेजना चरम पर पहुंचने लगी। हमने एक-दूसरे के कपड़े धीरे-धीरे उतारने शुरू किए। जब वह पूरी तरह से नग्न हुईं, तो उनकी खूबसूरती देख कर मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। उनके शरीर के निचले हिस्से में मौजूद घने बाल उनकी खाई की रखवाली कर रहे थे। मैंने धीरे से अपने हाथ को नीचे ले जाकर उनकी खाई को सहलाया, जो अब पूरी तरह से गीली और रसदार हो चुकी थी। वहां से निकलने वाली प्राकृतिक नमी ने मेरी उंगलियों को फिसलने पर मजबूर कर दिया। वह अपनी कमर ऊपर की ओर उठा रही थीं, जैसे वह और भी ज्यादा गहराई तक उस सुख को महसूस करना चाहती हों।
मैंने अपने खीरे को बाहर निकाला जो अब पूरी तरह से सख्त और खड़ा हो चुका था। उसकी लंबाई और मोटाई देख कर बुआ की आँखों में एक अजीब सी चमक और डर का मिला-जुला भाव था। उन्होंने धीरे से अपना हाथ बढ़ाकर उसे सहलाया और फिर उसे अपने कोमल मुंह में ले लिया। उनके मुंह की गर्माहट और जीभ का स्पर्श मेरे खीरे को जैसे पागल कर रहा था। वह उसे बड़े चाव से चूस रही थीं, जैसे कोई रसीला फल खा रही हों। कुछ देर तक यह सिलसिला चलता रहा और फिर मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया और उनके दोनों पैरों को फैलाकर उनकी गहरी खाई के दर्शन किए जो अब पूरी तरह से खुदाई के लिए तैयार थी।
मैने धीरे से अपने खीरे का सिरा उनकी खाई के द्वार पर रखा और एक गहरा धक्का दिया। बुआ के मुंह से एक जोर की चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं बल्कि एक अनकहे सुख की थी। उनकी खाई इतनी तंग थी कि मेरा खीरा बड़ी मुश्किल से अंदर जा पा रहा था। जैसे-जैसे मैं अंदर-बाहर हो रहा था, वहां से एक लसलसी आवाज आने लगी जो कमरे के सन्नाटे को चीर रही थी। वह अपने दोनों हाथों से मुझे अपनी ओर खींच रही थीं और उनके तरबूज मेरी छाती से रगड़ खा रहे थे। हर धक्के के साथ वह ‘ओह… आ… और तेज’ के शब्द बुदबुदा रही थीं, जिससे मेरा जोश दोगुना हो गया था।
खुदाई की यह प्रक्रिया अब पूरी रफ्तार पकड़ चुकी थी। मैंने उन्हें घुमाया और पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। उनका वह भारी पिछवाड़ा हर धक्के के साथ हिल रहा था, जो देखने में बेहद उत्तेजक लग रहा था। मैं अपनी पूरी ताकत से उनके अंदर जा रहा था और वह हर वार को सहते हुए और भी ज्यादा गहराई की मांग कर रही थीं। हमारे शरीरों से पसीना बह रहा था जो एक-दूसरे में मिल रहा था। वह बार-बार अपनी गर्दन पीछे मोड़कर मुझे चूमने की कोशिश करतीं। कमरे की हवा उनकी कराहों और थपथपाहट की आवाजों से भर गई थी। वह एक ऐसा नशा था जिसमें हम दोनों पूरी तरह से डूब चुके थे।
काफी देर तक इस गहन खुदाई के बाद, मुझे महसूस हुआ कि मेरा अंत करीब है। बुआ की हालत भी अब चरम पर थी, उनकी खाई की दीवारें मेरे खीरे को कस कर जकड़ रही थीं। उन्होंने जोर-जोर से कांपना शुरू कर दिया और अपनी उंगलियों से चादर को कस कर पकड़ लिया। मैंने आखिरी के कुछ बहुत ही तेज और गहरे धक्के लगाए और तभी हम दोनों का रस एक साथ छूट गया। मेरा सारा गर्म लावा उनकी खाई की गहराइयों में समा गया। वह पूरी तरह से निढाल होकर बिस्तर पर गिर पड़ीं और मैं भी उनके ऊपर ढह गया। हम दोनों की सांसें इतनी तेज थीं कि जैसे किसी ने लंबी दौड़ लगाई हो।
खुदाई के बाद की वह शांति बहुत ही सुकून भरी थी। हम दोनों पसीने से लथपथ एक-दूसरे की बाहों में लिपटे हुए थे। बुआ के चेहरे पर एक अजीब सा संतोष था, जैसे बरसों की कोई प्यास आज बुझ गई हो। उनके बिखरे हुए बाल और लाल पड़े गाल उनकी तृप्ति की कहानी कह रहे थे। वह बार-बार मेरे माथे को चूम रही थीं और धीरे से मुस्कुरा रही थीं। हमारे बीच अब कोई शर्म नहीं थी, बस एक गहरा भावनात्मक जुड़ाव और उस शारीरिक सुख की यादें थीं जो अभी-अभी हमने साझा की थीं। उस दोपहर के बाद हमारा रिश्ता हमेशा के लिए बदल गया था, एक ऐसा राज जो सिर्फ हम दोनों के बीच था।