गर्मियों की वह शांत दोपहर आज भी मुझे याद है जब घर के सभी बड़े एक रिश्तेदार की शादी में गए हुए थे और घर पर सिर्फ मैं और मेरी युवा शारदा बुआ अकेले थे। बुआ की उम्र लगभग पैंतीस साल थी लेकिन उनके शरीर की बनावट किसी बीस साल की नवयौवना को मात देती थी। उनके शरीर का हर अंग जैसे किसी कुशल मूर्तिकार ने फुर्सत में तराशा हो। उनके रेशमी बालों की खुशबू पूरे कमरे में फैली हुई थी और उनकी साड़ी के भीतर छिपे उनके विशाल तरबूज हर सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे जो किसी को भी मदहोश करने के लिए काफी थे। उनके तरबूजों के ऊपर उभरे नन्हे मटर साड़ी के महीन कपड़े से भी अपनी मौजूदगी का अहसास करा रहे थे जिसे देखकर मेरे मन में अजीब सी हलचल होने लगी थी।
शारदा बुआ सोफे पर लेटी हुई एक मैगजीन पढ़ रही थीं और उनकी साड़ी उनके मांसल पिछवाड़े से थोड़ी सरक गई थी जिससे उनके गोरे बदन की चमक साफ दिखाई दे रही थी। उनके पिछवाड़े का घेरा इतना भरा हुआ और सुडौल था कि उसे देखते ही मेरे मन में उसे सहलाने की तीव्र इच्छा जाग उठी। बुआ ने जब मुझे अपनी ओर टकटकी लगाकर देखते हुए पाया तो उनके चेहरे पर एक हल्की सी मुस्कान आ गई जो कि शर्म और आमंत्रण का एक अनूठा संगम थी। उस पल हमारे बीच शब्दों की जरूरत खत्म हो गई थी और केवल हमारी धड़कनें एक-दूसरे से बातें कर रही थीं। माहौल में एक अजीब सी गर्माहट और कामुकता घुल चुकी थी जो धीरे-धीरे हम दोनों को अपनी आगोश में ले रही थी।
मैं धीरे से उनके करीब गया और उनके पैरों के पास बैठ गया और उनके मखमली पैरों को सहलाने लगा जिससे बुआ के शरीर में एक सिहरन दौड़ गई। बुआ ने अपनी आँखें बंद कर लीं और एक गहरी आह भरी जो कमरे के सन्नाटे को चीरती हुई मेरे कानों तक पहुँची। मेरा हाथ धीरे-धीरे ऊपर की ओर बढ़ने लगा और जब मैंने उनकी रेशमी जांघों को छुआ तो उन्होंने अपना पैर सिकोड़ लिया लेकिन फिर खुद ही ढीला छोड़ दिया। बुआ की सांसें अब तेज चलने लगी थीं और उनके तरबूजों की हरकत और भी बढ़ गई थी जिससे मुझे अहसास हुआ कि उनके मन में भी वही आग जल रही है जो मेरे भीतर धधक रही थी।
बिना किसी देरी के मैंने उनके ब्लाउज के हुक खोलने शुरू किए और जैसे ही उनके दोनों विशाल और गोरे तरबूज आज़ाद हुए मेरी आँखें फटी की फटी रह गईं। उन पर लगे मटर अब पूरी तरह से सख्त हो चुके थे और उनके आसपास उगे छोटे-छोटे बाल उनकी सुंदरता को और भी प्राकृतिक बना रहे थे। मैंने झुककर उन मटरों को अपने होठों में ले लिया और उन्हें धीरे-धीरे चूसने लगा जिससे बुआ के मुँह से सिसकारियां निकलने लगीं। वह अपने हाथों से मेरे बालों को सहला रही थीं और मुझे अपने शरीर के और करीब खींच रही थीं। उनके शरीर की खुशबू और उस पल की गहराई ने मुझे पूरी तरह से वश में कर लिया था और अब पीछे हटने का कोई रास्ता नहीं बचा था।
राघव, तुम क्या कर रहे हो? यह गलत है, बुआ ने कांपती आवाज में कहा लेकिन उनके हाथों की पकड़ मेरे कंधों पर और भी मजबूत हो गई थी। मैंने उनके कानों के पास फुसफुसाते हुए कहा कि बुआ, आज इस तड़प को शांत हो जाने दीजिए क्योंकि यह मौका फिर कभी नहीं मिलेगा। बुआ ने मेरी आँखों में देखा और फिर मुझे अपने सीने से लगा लिया जो इस बात की हरी झंडी थी कि अब हम इस खुदाई के खेल में आगे बढ़ सकते हैं। मैंने धीरे से उनकी साड़ी और पेटीकोट को उनके पैरों से नीचे सरका दिया जिससे उनकी गहरी और रसीली खाई मेरे सामने पूरी तरह से उजागर हो गई। उनकी खाई के पास उगे सुनहरे बाल पसीने से भीग कर चिपक गए थे और वहाँ से एक नशीली गंध आ रही थी।
मैंने अपनी उंगली से उनकी खाई को टटोलना शुरू किया जो पहले से ही रस से पूरी तरह भीगी हुई थी और बुआ अपनी कमर ऊपर उठाकर मेरा साथ देने लगीं। फिर मैंने अपना कड़क और गरम खीरा बाहर निकाला जिसे देखकर बुआ की आँखें हैरत से फैल गईं। उन्होंने अपने कोमल हाथों से मेरे खीरे को पकड़ा और उसे सहलाने लगीं जिससे मुझे स्वर्ग जैसा सुख महसूस होने लगा। बुआ ने अपना मुँह खोला और मेरे खीरे को अपने मुँह में लेकर उसे चूसना शुरू किया। वह इतने सलीके से खीरा चूस रही थीं कि मुझे लगने लगा मेरा रस अभी निकल जाएगा। कुछ देर बाद मैंने उन्हें बिस्तर पर लिटाया और उनके पिछवाड़े के नीचे तकिया रखकर उनकी खाई को और भी ऊपर उठा दिया।
अब असली खुदाई का समय था। मैंने अपने खीरे की नोक को उनकी रसीली खाई के द्वार पर रखा और एक झटके में आधा खीरा अंदर धकेल दिया। बुआ के मुँह से एक चीख निकली, “आह्ह राघव, मर गई… बहुत बड़ा है तुम्हारा खीरा!” पर अगले ही पल उन्हें मजा आने लगा। मैं धीरे-धीरे सामने से खोदना शुरू किया और हर धक्के के साथ मेरा खीरा उनकी खाई की गहराइयों को छू रहा था। कमरे में मांस से मांस टकराने की चप-चप की आवाज़ गूँजने लगी। बुआ अपने पैर मेरे कंधों पर रखकर जोर-जोर से चिल्लाने लगीं, “और तेज राघव, अपनी बुआ को आज पूरी तरह खोद डालो, इस खाई की प्यास बुझा दो!” खुदाई की गति अब चरम पर थी और हम दोनों ही पसीने से लथपथ हो चुके थे।
जैसे-जैसे खुदाई तेज हुई बुआ के शरीर में झटके लगने शुरू हुए और उनकी खाई ने मेरे खीरे को कसकर जकड़ लिया। बुआ का रस बड़े वेग के साथ छूटा जिसने मेरे खीरे को पूरी तरह भिगो दिया और ठीक उसी समय मैंने भी अपने खीरे का सारा गरम रस उनकी खाई की गहराई में उड़ेल दिया। हम दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए काफी देर तक वैसे ही पड़े रहे और हमारी सांसें धीरे-धीरे सामान्य होने लगीं। बुआ के चेहरे पर एक असीम संतुष्टि और शांति के भाव थे। उस दोपहर के बाद हमारा रिश्ता सिर्फ बुआ-भतीजे का नहीं रहा बल्कि एक ऐसी गुप्त साझेदारी बन गया जिसे सिर्फ हम दोनों ही जानते थे और वह यादें आज भी मेरे मन में ताजगी भर देती हैं।