अतृप्त चाहत और बुआ का समर्पण—>गर्मी की वो दोपहर आज भी मेरे ज़हन में वैसी ही ताज़ा है जैसे कल की बात हो। मैं अपने शहर से दूर बुआ के घर छुट्टियों में गया हुआ था। बुआ, जिनका नाम अंजलि था, उनकी उम्र लगभग 36 साल रही होगी, लेकिन उनके शरीर की बनावट और ढलान किसी भी जवान लड़की को मात दे सकती थी। फूफा जी काम के सिलसिले में अक्सर शहर से बाहर रहते थे, इसलिए घर में हम दोनों ही अकेले थे। उस दिन छत का पंखा बस नाम के लिए चल रहा था और उमस इतनी ज़्यादा थी कि शरीर से पसीना रुकने का नाम नहीं ले रहा था। अंजलि बुआ ने एक बेहद पतली सूती साड़ी पहनी हुई थी, जो उनके उभारों पर पसीने की वजह से चिपक सी गई थी। जब भी वो चलती थीं, उनके शरीर की हरकतें मेरे अंदर एक अजीब सी हलचल पैदा कर रही थीं।
बुआ के शरीर का ढांचा वाकई बहुत ही आकर्षक था। उनके दोनों तरबूज इतने बड़े और सुडौल थे कि ब्लाउज के बटन जैसे टूटने को बेताब लग रहे थे। जब वो झुककर काम करतीं, तो उन तरबूजों की गहरी लकीर साफ़ दिखाई देती थी जिसे देखकर मेरा गला सूखने लगता था। उनका पिछवाड़ा भी काफ़ी भारी और गोल था, जो चलते समय किसी मदमस्त हाथी की चाल की तरह हिलता था। मैं बस उन्हें निहारता रहता और मन ही मन अपनी कल्पनाओं के घोड़े दौड़ाता। हमारा रिश्ता वैसे तो बहुत ही सम्मानजनक था, लेकिन पिछले कुछ दिनों से हमारी आँखों में एक-दूसरे के लिए जो चमक थी, वो कुछ और ही कहानी बयां कर रही थी। उनके चेहरे की लाली और मेरी नज़रों की बेताबी ने हमारे बीच एक अनकहा खिंचाव पैदा कर दिया था।
उस दोपहर जब मैं अपने कमरे में लेटा हुआ था, बुआ अचानक ठंडे पानी का गिलास लेकर अंदर आईं। वो मेरे पास बेड पर बैठ गईं और धीरे से मेरे माथे पर हाथ रखा। उनका स्पर्श रेशम जैसा कोमल था, लेकिन उसमें एक ऐसी जलन थी जिसने मेरे पूरे शरीर को कंपकपा दिया। उन्होंने धीमी आवाज़ में पूछा, ‘रोहन, क्या तुम्हें बहुत गर्मी लग रही है?’ उनकी आवाज़ में एक अजीब सी मादकता थी। मैंने उनकी आँखों में देखा, जहाँ झिझक और गहरी इच्छा के बीच एक द्वंद्व चल रहा था। मेरा हाथ अनायास ही उनकी कमर की ओर बढ़ गया, जहाँ से उनकी त्वचा साफ़ दिखाई दे रही थी। पहला स्पर्श होते ही वो सिहर उठीं, लेकिन उन्होंने मेरा हाथ हटाया नहीं, बल्कि अपनी आँखें मूँद लीं।
धीरे-धीरे हमारी झिझक की दीवारें ढहने लगीं। मैंने अपनी उंगलियों को उनके पेट पर घुमाना शुरू किया, जिससे उनकी साँसों की गति तेज़ हो गई। अंजलि बुआ ने गहरी आह भरी और अपना सिर मेरे कंधे पर रख दिया। मैंने हिम्मत जुटाकर उनके ब्लाउज के हुक खोलने शुरू किए। जैसे ही आखिरी हुक खुला, उनके विशाल और दुधिया तरबूज आज़ाद होकर मेरे सामने आ गए। उनके बीच के मटर जैसे दाने उत्तेजना से पूरी तरह सख्त हो चुके थे। मैंने अपने हाथ से उन तरबूजों को सहलाना शुरू किया और अपनी ज़बान से उन मटरों को चखने लगा। बुआ की सिसकियाँ कमरे में गूँजने लगीं और वो मेरा सिर अपने सीने से और ज़ोर से भींचने लगीं।
अब हमारा संयम पूरी तरह जवाब दे चुका था। बुआ ने भी व्याकुलता में मेरे कपड़े उतार दिए और मेरा कड़क खीरा उनके हाथों की गिरफ्त में था। उन्होंने पहली बार इतने करीब से मेरे खीरे को देखा और उसे सहलाते हुए अपने होंठों के करीब ले आईं। फिर उन्होंने धीरे-धीरे मेरा खीरा चूसना शुरू किया। उनके मुँह की गर्माहट और उनकी जीभ का जादू मेरे पूरे शरीर में बिजली की तरह दौड़ रहा था। मैं उनके बालों को सहला रहा था और उनके चेहरे पर उभरते भावों को देख रहा था। कुछ ही देर में मेरा खीरा पूरी तरह से गीला और और भी ज़्यादा सख्त हो चुका था, अब हम दोनों ही खुदाई के लिए बेताब थे।
मैंने उन्हें बिस्तर पर सीधा लिटाया और उनके पैरों को फैलाकर उनकी गहरी खाई का दीदार किया। उनकी खाई गुलाबी और पूरी तरह से गीली हो चुकी थी। मैंने अपनी उंगली से खाई में हलचल शुरू की, तो बुआ की कमर ज़ोर-ज़ोर से ऊपर-नीचे होने लगी। वो बार-बार कह रही थीं, ‘रोहन, अब और इंतज़ार नहीं होता, मुझे खोद डालो।’ मैंने अपने खीरे की नोक को उनकी खाई के द्वार पर रखा और धीरे से एक धक्का दिया। उनकी तंग खाई ने मेरे खीरे को कसकर जकड़ लिया। बुआ के मुँह से एक चीख निकली जो दर्द और आनंद का मिश्रण थी। मैंने धीरे-धीरे अंदर-बाहर करना शुरू किया और गति बढ़ानी शुरू कर दी।
जैसे-जैसे खुदाई तेज़ होती गई, कमरे में थप्प-थप्प की आवाज़ें और हमारी भारी साँसें एक सुर में मिलने लगीं। मैंने उन्हें पिछवाड़े से खोदने के लिए पलटा दिया और उनके भारी पिछवाड़े को पकड़कर ज़ोर-ज़ोर से धक्के मारने लगा। अंजलि बुआ बिस्तर की चादर को अपने हाथों में भींच रही थीं और हर धक्के के साथ उनका शरीर हवा में उछल जाता था। ‘हाँ रोहन, और तेज़… सब निकाल दो मेरे अंदर,’ वो बेसुध होकर चिल्ला रही थीं। हम दोनों ही अब चरम सीमा के करीब थे। अंत में, मैंने एक ज़ोरदार धक्का मारा और मेरा सारा रस उनकी गहरी खाई के अंदर छूट गया। उसी समय बुआ का भी रस निकलना शुरू हुआ और वो बेजान होकर बिस्तर पर गिर पड़ीं।
काफी देर तक हम दोनों एक-दूसरे की बाँहों में लिपटे रहे, शरीर पसीने से तर-बतर था और साँसें अब धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं। अंजलि बुआ ने मेरे माथे को चूमा और धीमे से मुस्कुराईं। उस पल में कोई शर्म नहीं थी, बस एक गहरा संतोष था। उनकी हालत ऐसी थी जैसे किसी प्यासी धरती को पहली बार बारिश मिली हो। उस दिन के बाद से हमारे बीच का रिश्ता सिर्फ बुआ-भतीजे का नहीं रहा, बल्कि एक ऐसे राज़ का हिस्सा बन गया जिसने हमारे भावनात्मक जुड़ाव को और भी गहरा कर दिया था। हम दोनों जानते थे कि यह एक ऐसा सुख है जिसे हम बार-बार पाना चाहेंगे।