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खेत की गहरी चु@@ई

गाँव की उस तपती दुपहरी में जब परिंदे भी अपने घोंसलों में दुबक जाते हैं, हमारे घर के पिछवाड़े वाले बगीचे में एक अलग ही हलचल मची थी। मेरी भाभी सुनीता, जिसका यौवन किसी उपजाऊ धरती की तरह लहलहा रहा था, पसीने से तर-बतर होकर अपने छोटे से बगीचे में काम कर रही थी। उनका बदन क्या था, साक्षात कुदरत का करिश्मा, जिसे देखकर किसी भी किसान का मन जुताई करने को मचल जाए।

भाभी ने साड़ी का पल्लू कमर में खोंस रखा था, जिससे उनके शरीर के रसीले आम और पीछे का भारी पिछवाड़ा साफ़ झलक रहा था। मैं दूर खड़ा उन्हें देख रहा था कि कैसे वो मिट्टी में मेहनत कर रही थीं। उनके चेहरे पर पसीने की बूंदें ऐसे चमक रही थीं जैसे ताजी मलाई पर ओस गिरी हो। धूप की तपिश ने उनके गोरे रंग को और भी निखार दिया था, जिससे कामुकता छलक रही थी।

जब मैं उनके करीब पहुँचा, तो उनकी साँसों की गति तेज थी। पसीने की खुशबू और मिट्टी की सौंधी महक मिलकर एक नशीला माहौल बना रही थी। उन्होंने मेरी तरफ देखा और मुस्कराई, उनकी आँखों में एक अजीब सी प्यास थी, जैसे सूखी धरती बारिश की पहली बूंद का इन्तजार कर रही हो। भाभी ने कहा, “माधव, आज खुदाई बहुत गहरी करनी होगी, मिट्टी बहुत सख्त हो गई है।”

मैंने उनकी आँखों में देखते हुए उनके कंधे पर हाथ रखा। उनका शरीर आग की तरह तप रहा था। मैंने धीरे से उनके रेशमी बाल पीछे किए और उनकी गर्दन पर अपना हाथ फेरा। “भाभी, इस बगीचे को सींचने के लिए जितनी मेहनत लगेगी, मैं करने को तैयार हूँ,” मैंने धीमे स्वर में कहा। हमारी साँसें आपस में टकरा रही थीं और हवा में भारीपन बढ़ता जा रहा था।

भाभी ने धीरे से झुककर कुछ पौधे हटाए, जिससे उनके रसीले संतरे मेरी आँखों के ठीक सामने आ गए। पसीने से भीगी ब्लाउज उनके बदन से ऐसे चिपकी थी जैसे मक्खन पर परत जमी हो। मैंने अपने हाथों से उनके उन रसीले आमों को दबाना शुरू किया। वो नरम और गर्म थे, ठीक वैसे ही जैसे चूल्हे से उतरी ताजी रोटी होती है। उन्होंने एक आह भरी और अपनी आँखें मूँद लीं।

मेहनत का असली मजा तो तब शुरू हुआ जब मैंने उन्हें ज़मीन पर बिछाया। उनके शरीर की बनावट किसी गहरी खाई की तरह थी, जिसे भरने की ज़िम्मेदारी अब मेरी थी। मैंने उनकी खाई की तरफ हाथ बढ़ाया और उसे धीरे-धीरे सहलाना शुरू किया। वो जगह पूरी तरह गीली हो चुकी थी, पसीने और उत्तेजना के रस से लबालब। भाभी ने अपनी टांगें फैला दीं, जैसे जुताई के लिए खेत तैयार हो।

मैंने सबसे पहले उनकी खाई चाटना शुरू किया। उसका स्वाद किसी ताजे शहद जैसा था, जिसमें थोड़ी सी नमकीन मिट्टी का मेल हो। भाभी अपने हाथ मेरे बालों में फंसाकर मुझे अपने और करीब खींच रही थीं। “माधव, बहुत गर्मी है, इसे शांत करो,” वो सिसकते हुए बोल रही थीं। उनकी आवाज़ में वो तड़प थी जो केवल एक प्यासी ज़मीन ही महसूस कर सकती है।

अब बारी थी मेरे औजार की। मैंने अपना नसों से भरा खीरा बाहर निकाला, जो लम्बाई और मोटाई में किसी बेलन या मूसल से कम नहीं था। उसे देखते ही भाभी की आँखें फटी की फटी रह गईं। उन्होंने अपने कांपते हाथों से उस लम्बे मोटे खीरे को पकड़ा और उसे धीरे-धीरे चूसना शुरू कर दिया। उनके मुँह की गर्मी ने मेरे अंदर के लावा को और भी धधका दिया।

खाई को अच्छी तरह से तैयार करने के बाद, मैंने उसमें उंगली से खुदाई शुरू की। भाभी की खाई इतनी तंग और रसीली थी कि उंगली अंदर जाते ही चारों तरफ से मलाई निकलने लगी। वो अपने पिछवाड़े को बार-बार ऊपर उठा रही थीं, जैसे चाहती हों कि मैं और गहराई तक खुदाई करूँ। “भाभी, आज इस खेत की ऐसी जुताई होगी कि फसल लहलहा उठेगी,” मैंने कहा।

मैंने उन्हें घोड़ी बनाकर खोदना शुरू करने का फैसला किया। उनका पिछवाड़ा ऊपर की ओर उठा हुआ था, जो किसी दो पहाड़ियों के बीच की घाटी जैसा लग रहा था। मैंने पीछे से अपना मूसल उनकी खाई के मुहाने पर टिकाया और एक जोरदार धक्के के साथ अंदर उतार दिया। भाभी के मुँह से एक चीख निकली, जो दर्द की कम और परम आनंद की ज्यादा थी। खुदाई की गति अब बढ़ चुकी थी।

हर धक्के के साथ हमारा पसीना आपस में मिल रहा था। बगीचे की मिट्टी हमारे शरीर पर चिपक रही थी, लेकिन हमें कोई परवाह नहीं थी। मैं पूरी ताकत से जुताई कर रहा था, और भाभी पीछे से अपने पिछवाड़े से मुझे सहयोग दे रही थीं। धप-धप की आवाज़ पूरे शांत बगीचे में गूँज रही थी। उनकी खाई से रस निकलकर मेरी जांघों तक बह रहा था, जिससे फिसलन और बढ़ गई थी।

थोड़ी देर बाद मैंने उन्हें सीधा लिटाया और उनके ऊपर सवारी करना शुरू किया। उनके रसीले संतरों को अपने हाथों से मरोड़ते हुए मैंने फिर से अपना खीरा अंदर डाला। अब खुदाई और भी गहरी हो रही थी। भाभी की टांगें मेरे कन्धों पर थीं और वो हर प्रहार पर मेरा साथ दे रही थीं। उनकी आँखों में अब वो प्यास बुझती हुई दिख रही थी, जो बरसों से दबी हुई थी।

मेहनत इतनी भीषण थी कि हम दोनों बुरी तरह हांफ रहे थे। हमारे शरीर की गर्मी से हवा भी गर्म हो गई थी। मैंने महसूस किया कि अब खुदाई का अंत करीब है। मेरी नसों में दबाव बढ़ रहा था और भाभी भी अपने चर्मोत्कर्ष पर पहुँच रही थीं। “माधव, सब कुछ निकाल दो… इस खेत को तृप्त कर दो,” भाभी ने चिल्लाते हुए कहा और मुझे अपने सीने से लगा लिया।

तभी एक जोरदार पिचकारी छूटी और मेरे शरीर का सारा रस उनकी खाई में समा गया। वो रस इतना गर्म और गाढ़ा था कि भाभी का पूरा शरीर थरथरा उठा। उन्होंने मुझे कसकर पकड़ लिया और हम दोनों काफी देर तक वैसे ही पड़े रहे। उस पसीने, मिट्टी और रस के मिलन ने हमारे बीच एक ऐसा भावनात्मक रिश्ता बना दिया था जिसे शब्दों में बयान करना मुश्किल था।

धूप अब ढल रही थी। हमने एक-दूसरे की मालिश की और अपनी थकावट दूर की। भाभी के चेहरे पर अब एक अलग ही सुकून था, जैसे किसी किसान को भरपूर फसल मिलने के बाद मिलता है। हमने मिलकर अपनी गर्मी शांत की थी और उस बगीचे की मिट्टी गवाह थी हमारी उस कड़ी मेहनत और गहरे प्यार की। वो दुपहरी हमारे जीवन की सबसे यादगार ‘खुदाई’ बन गई थी।

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