एक छोटे से गाँव में, जहाँ नदी की कल-कल और बारिश की बूँदें हमेशा साथ चलती हैं, वहाँ का प्रधान रघुनाथ सिंह बड़ा दबंग और व्यस्त आदमी था। उसकी पत्नी सुनीता, ३५ साल की, गोरी-चिट्टी, पतली कमर, भरे हुए स्तन और गोल गाँ@ड वाली – गाँव की सबसे आकर्षक औरत। वो साड़ी में घूमती, घूंघट डालकर, लेकिन आँखों में सालों का अकेलापन छिपा रहता। प्रधान जी मीटिंग्स, राजनीति, जमीन के चक्कर में दिन-रात बाहर रहते, घर पर कम आते। सुनीता अकेली दिन काटती, लेकिन गाँव की मर्यादा में बंधी रहती।
अमित, २४ साल का जवान लड़का, प्रधान जी का विश्वासपात्र। मजबूत कद-काठी, काले घने बाल, खेतों और घर के कामों में हाथ बंटाता। रोज़ सुबह प्रधान जी के घर जाता। सुनीता से नजरें मिलतीं। पहले तो सिर्फ़ आदर था, लेकिन धीरे-धीरे अमित की नजरें बदल गईं। सुनीता जब चाय बनाती या पानी देती, उसकी साड़ी की थिरकन, ब्लाउज का कसा हुआ घेरा, सब अमित को खींचता। वो सोचता, “भाभी कितनी खूबसूरत हैं, लेकिन प्रधान जी उन्हें कभी ठीक से देखते भी नहीं।” अमित का मन उलझने लगा – गलत है, प्रधान जी का विश्वास तोड़ना पाप है, लेकिन सुनीता की उदासी देखकर वो खुद को रोक नहीं पाता।
एक दिन भारी बारिश हो रही थी। प्रधान जी शहर गए थे, दो दिन के लिए किसी मीटिंग में। अमित को घर पर कुछ सामान – दवा और राशन – देने भेजा गया था। अमित छाता लेकर निकला, लेकिन रास्ते में तेज़ हवा और बारिश से वो भीग गया। घर पहुँचते-पहुँचते पूरी तरह तर-बतर। सुनीता ने दरवाजा खोला। वो खुद भी थोड़ी पहले बाहर गई थी – बारिश में कपड़े सुखाने के लिए टांगने वाली रस्सी टूट गई थी, कपड़े गिर गए थे, वो उन्हें उठाने बाहर निकली थी। बारिश इतनी तेज़ थी कि कुछ ही मिनटों में उसकी साड़ी भी पूरी भीग गई। साड़ी शरीर से चिपक गई, ब्लाउज पारदर्शी हो गया, ब्रा की लेस और स्तनों की आकृति साफ़ झलक रही थी। वो जल्दी-जल्दी अंदर आई, लेकिन कपड़े बदलने का मौका नहीं मिला।
“अमित… तू भी भीग गया? अंदर आ जा, भीगकर बीमार पड़ जाएगा,” सुनीता ने कहा, उसकी आवाज़ में चिंता थी। अमित अंदर आया, पानी टपक रहा था। सुनीता ने उसे तौलिया दिया, “ये ले, पोंछ ले। प्रधान जी का कुर्ता देती हूँ, बदल ले।” अमित ने तौलिया लिया, लेकिन नजरें सुनीता पर टिक गईं। उसकी गीली साड़ी से शरीर की हर लकीर साफ़ दिख रही थी – कमर की पतली पट्टी, स्तनों की उभार, निप्पल सख्त होकर ब्लाउज से चुभ रहे थे। अमित की साँसें तेज़ हो गईं। सुनीता ने महसूस किया, शर्मा कर घूंघट ठीक किया, लेकिन गीले कपड़ों में वो और भी मोहक लग रही थी।
अमित ने कुर्ता बदलकर आया। दोनों बैठक में बैठे। बारिश की आवाज़ बाहर गूंज रही थी। बातें शुरू हुईं – मौसम की, गाँव की। धीरे-धीरे गहरी हो गईं। “भाभी, आप आजकल उदास क्यों लगती हैं?” अमित ने पूछा। सुनीता की आँखें नम हो गईं, “क्या बताऊँ अमित… सब कुछ है, लेकिन वो साथ नहीं जो चाहिए। प्रधान जी हमेशा बाहर। मैं अकेली…” अमित का दिल दुखा। वो करीब आया, सुनीता का हाथ पकड़ा। सुनीता ने छुड़ाने की कोशिश की, “नहीं अमित… ये गलत है… मैं प्रधान जी की पत्नी हूँ…” लेकिन उसकी उँगलियाँ अमित के हाथ में ही रह गईं। नैतिक द्वंद्व था – समाज की नजरें, इज्जत, लेकिन अकेलापन और वो छिपी हुई चाहत उसे कमजोर कर रही थी।
अमित ने हिम्मत की, सुनीता को अपनी बाहों में खींच लिया। सुनीता ने विरोध किया, “रुक जाओ… कोई देख लेगा…” लेकिन बारिश सब छिपा रही थी। अमित ने उसके गाल पर हाथ फेरा, फिर होंठ उसके होंठों पर रख दिए। पहला चु@@न धीमा, लेकिन गहरा। सुनीता की आँखें बंद हो गईं, वो पिघल गई। चु@@न लंबा होता गया, जीभें मिलीं। अमित के हाथ सुनीता की कमर पर सरके, गीली साड़ी को कसकर पकड़ा। सुनीता कराह उठी। अमित ने उसे उठाकर बेडरूम में ले गया। वहाँ अंधेरा था, सिर्फ खिड़की से बारिश की रोशनी।
अमित ने सुनीता की गीली साड़ी उतारनी शुरू की – पल्लू सरका, फिर पूरी साड़ी खींचकर उतार दी। सुनीता अब सिर्फ ब्लाउज और पेटीकोट में थी। गीले कपड़े से उसकी त्वचा चमक रही थी। अमित ने ब्लाउज के हुक खोले। सुनीता के स्त@@ बाहर आए – गोरे, भरे हुए, निप्पल सख्त और ठंड से काँपते हुए। अमित ने उन्हें पकड़ा, दबाया। सुनीता की सिसकारी निकली, “आह्ह… अमित… धीरे…” अमित ने एक निप्पल मुँह में लिया, चूसा। सुनीता की पीठ ऊपर उठी। “हाँ… चूसो… मेरे चु@@चे… सालों बाद कोई छू रहा है…”
अमित ने सुनीता को बिस्तर पर लिटाया। पेटीकोट ऊपर किया, पैं@@ी सरकाई। सुनीता की चू@@त गीली थी – बारिश से नहीं, चाहत से। अमित ने उंगली डाली, अंदर-बाहर किया। सुनीता काँप उठी। अमित ने जीभ से चाटना शुरू किया। सुनीता चिल्लाई, “आह्ह… अमित… चाटो… मेरी चू@@त का रस पी लो…” उसका पहला org@@m आया, शरीर काँपकर लहराया।
अमित ने अपना कपड़ा उतारा। ल@@ड सख्त, मोटा। सुनीता ने पकड़ा, सहलाया। “इतना बड़ा… धीरे डालना…” अमित ने टांगें फैलाईं, ल@@ड चू@@त पर रगड़ा, धीरे से अंदर धकेला। सुनीता कराह उठी, “हाय… फाड़ रहा है… लेकिन अच्छा लग रहा है…” अमित ने धक्के शुरू किए – धीमे, गहरे। सुनीता नीचे से साथ दे रही थी। “जोर से… फाड़ दो… मैं तुम्हारी हूँ आज…” अमित ने स्पीड बढ़ाई, स्तन दबाए, ग@@ड पर थप्पड़ मारे। सुनीता का दूसरा org@@m आया। अमित ने जोर से धक्का मारा, सारा व@@ीर्य अंदर छोड़ दिया।
दोनों थककर लिपटे रहे। सुनीता की आँखों में आँसू, लेकिन मुस्कान। “अमित… ये राज़ रहेगा।” अमित ने कहा, “भाभी… मैं तुम्हें कभी अकेला नहीं छोड़ूँगा।” बारिश थम गई, लेकिन उनकी आग जलती रही। गुप्त मिलन शुरू हो गए – खेतों में, घर में, जब मौका मिले। सुनीता अब खुश लगती, लेकिन राज़ छिपाने का डर हमेशा साथ रहता। ये निषिद्ध प्यार की कहानी थी, जो गाँव की बारिश में छिपी रहती।