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बचपन की अधूरी मोहब्बत और सुनसान पार्क में पहली गरमा-गरम खुदाई

बचपन की अधूरी मोहब्बत और सुनसान पार्क में पहली गरमा-गरम खुदाई—>समीर और कविता दस साल बाद उसी पुराने पार्क के कोने वाले बेंच पर बैठे थे जहाँ कभी उन्होंने अपने स्कूल के दिन बिताये थे। शाम ढल रही थी और पार्क में सन्नाटा पसरने लगा था, सिर्फ झींगुरों की आवाजें आ रही थीं जो इस सन्नाटे को और भी गहरा बना रही थीं। समीर ने देखा कि कविता अब पहले से कहीं ज्यादा जवान, परिपक्व और आकर्षक लग रही थी, उसकी साड़ी के पल्लू से झांकते उसके बड़े-बड़े तरबूज समीर की धड़कनें बढ़ा रहे थे। कविता की आँखों में एक अजीब सी तड़प और नमी थी, जैसे वो बरसों से किसी सच्चे स्पर्श की भूखी हो और आज समीर के इतने करीब होने से उसकी वो दबी हुई आग फिर से सुलग उठी थी। दोनों के बीच की खामोशी में एक अजीब सी बेचैनी थी जो धीरे-धीरे एक गहरी शारीरिक हवस और भावनात्मक जुड़ाव का रूप ले रही थी, जिससे वातावरण भारी हो गया था।

कविता की शारीरिक बनावट किसी तराशी हुई मूरत से कम नहीं थी, साड़ी के तंग लिबास में उसका पिछवाड़ा इतना उभारदार और मांसल लग रहा था कि समीर की नज़रें बार-बार फिसलकर वहीं जा रही थीं। उसके ब्लाउज के भीतर कैद उसके भारी तरबूज हर गहरी सांस के साथ ऊपर-नीचे हो रहे थे, और समीर साफ़ देख सकता था कि शाम की हल्की ठंडक और बढ़ती उत्तेजना की वजह से उसके मटर जैसे निप्पल कपड़े के ऊपर से ही अपनी मौजूदगी दर्ज करा रहे थे। कविता ने जब अपनी भीगी आँखों से समीर की तरफ देखा, तो उसके चेहरे की लाली और होंठों की थरथराहट बता रही थी कि उसके भीतर भी वही तूफ़ान हिलोरे ले रहा है जो समीर को पागल कर रहा था। उसकी रेशमी त्वचा से उठने वाली धीमी खुशबू समीर के नथुनों में भर गई थी, जो उसे मदहोश करने के लिए काफी थी।

बातों-बातों में समीर ने धीरे से अपना हाथ कविता के हाथ पर रखा, तो जैसे एक बिजली का करंट दोनों के शरीर में दौड़ गया। कविता ने हाथ हटाया नहीं, बल्कि अपनी उंगलियां समीर की उंगलियों में फंसा दीं, जिससे ये साफ़ हो गया कि वो भी इस लम्हे को जीना चाहती है। समीर का हाथ धीरे से उसकी कमर की तरफ बढ़ा और साड़ी के उस हिस्से को छुआ जहाँ त्वचा नग्न थी, कविता के मुँह से एक हल्की सी आह निकली और उसने अपनी आँखें मूँद लीं। समीर ने महसूस किया कि कविता का शरीर गरम हो रहा था और उसके तरबूज उसकी बाहों के दबाव में दबने लगे थे, जो इस बात का संकेत था कि अब झिझक की दीवारें टूट चुकी हैं और दोनों एक दूसरे की गहराई में उतरने के लिए तैयार हैं।

समीर ने कविता को खींचकर पार्क के एक घने और अंधेरे कोने में ले गया जहाँ झाड़ियों की ओट में उन्हें कोई देख नहीं सकता था। वहाँ पहुँचते ही समीर ने कविता के होंठों को अपने होंठों में भर लिया और बड़ी शिद्दत से उनका स्वाद लेने लगा। कविता ने भी अपना पूरा शरीर समीर से चिपका दिया, जिससे समीर का सख्त होता हुआ खीरा सीधे कविता की जांघों से टकराने लगा। समीर के हाथ कविता के पिछवाड़े पर पहुँच गए और उसे जोर-जोर से भींचने लगे, जिससे कविता मदहोशी में सिसकियाँ भरने लगी। समीर ने धीरे से कविता की साड़ी के नीचे हाथ डाला और उसकी जांघों को सहलाते हुए ऊपर की ओर बढ़ा, जहाँ उसकी रेशमी खाई पहले से ही चिपचिपी और गीली हो चुकी थी, जो इस बात का प्रमाण थी कि वो कितनी ज्यादा उत्तेजित थी।

जैसे ही समीर की उंगलियां कविता की खाई के बालों के बीच पहुंचीं, कविता का पूरा शरीर कांप उठा और उसने समीर के कंधे को अपने दांतों से काट लिया। समीर ने देखा कि उसकी खाई पूरी तरह से गीली और गरम थी, उसने धीरे से अपनी उंगली से खोदना शुरू किया तो कविता की कराहें और भी तेज हो गई। समीर ने अपनी उंगली को अंदर-बाहर करना शुरू किया और साथ ही कविता के ब्लाउज के बटन खोलकर उसके विशाल तरबूज को आज़ाद कर दिया। चाँदनी की हल्की रोशनी में वो सफेद तरबूज चमक रहे थे और उनके ऊपर काले मटर जैसे निप्पल पूरी तरह से तन चुके थे। समीर ने झुककर एक मटर को अपने मुँह में लिया और उसे चूसने लगा, जिससे कविता का हाथ समीर के खीरे की तरफ बढ़ा और उसने उसे कपड़े के ऊपर से ही मजबूती से पकड़ लिया।

कविता ने समीर की पैंट की ज़िप खोली और उसके लम्बे और कठोर खीरे को बाहर निकाला, जो अब अपनी पूरी लम्बाई और मोटाई के साथ खड़ा था। कविता ने उसे अपने कोमल हाथों में लिया और उसे सहलाने लगी, फिर धीरे से उसने समीर के खीरे को अपने मुँह में ले लिया और उसे चूसना शुरू किया। समीर की आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा और वो सुख के सागर में गोते लगाने लगा, जब कविता का गर्म मुँह उसके खीरे की नसों को महसूस कर रहा था। थोड़ी देर तक खीरा चूसने के बाद समीर ने कविता को मोड़ा और उसे पिछवाड़े से खोदने की स्थिति में ला दिया। कविता ने अपनी साड़ी ऊपर चढ़ाई और अपनी खाई को समीर के सामने पेश कर दिया, जो अब पूरी तरह से रस से भरी हुई और स्वागत के लिए बेताब थी।

समीर ने अपने कठोर खीरे की नोक को कविता की गीली खाई पर रगड़ा और फिर एक ही झटके में उसे अंदर उतार दिया। कविता के मुँह से एक लंबी और दर्द भरी लेकिन सुखद चीख निकली, “ओह समीर… बहुत बड़ा है तुम्हारा खीरा!” समीर ने बिना रुके खुदाई शुरू कर दी, उसके धक्के इतने जबरदस्त थे कि कविता के तरबूज जोर-जोर से हिल रहे थे। पार्क का वो कोना दोनों के शरीरों के टकराने की आवाज़ और कविता की मदहोश कर देने वाली आहों से गूंज उठा। समीर अब पूरी रफ़्तार से पिछवाड़े से खोद रहा था, और हर धक्के के साथ उसका खीरा कविता की खाई की गहराइयों को छू रहा था, जिससे उसे बेपनाह आनंद मिल रहा था।

कुछ देर बाद समीर ने कविता को सीधा लिटाया और सामने से खोदना शुरू किया। कविता ने अपनी टांगें समीर की कमर के चारों ओर कस लीं ताकि वो और भी गहराई तक पहुँच सके। समीर के पसीने की बूंदें कविता के तरबूजों पर गिर रही थीं, और दोनों की सांसें एक दूसरे में घुल-मिल गई थीं। समीर ने महसूस किया कि कविता की खाई अब बहुत ज्यादा टाइट हो रही है और वो भी चरम पर पहुँचने वाली है। उसने अपनी रफ़्तार और बढ़ा दी, और कुछ ही पलों में कविता का शरीर अकड़ गया और उसकी खाई से ढेर सारा गरम रस निकलना शुरू हो गया। कविता के तुरंत बाद समीर का भी धैर्य टूट गया और उसके खीरे ने सारा गरम रस कविता की गहराई में छोड़ दिया। दोनों एक दूसरे के ऊपर ढेर हो गए, उनकी धड़कनें बहुत तेज़ थीं और शरीर पसीने से तर-बतर थे, लेकिन मन में एक ऐसी शांति थी जो शायद उन्हें बरसों बाद मिली थी।

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