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देवर और भाभी की रसीली चु@@ई की दास्ताँ

गाँव की तपती दुपहरी में खेतों की हरियाली चारों तरफ फैली हुई थी। सूरज अपनी पूरी तपिश बिखेर रहा था और हवा में एक अजीब सी गर्मी थी। मैं अपने ताऊजी के लड़के की पत्नी, सुनीता भाभी के साथ मक्के के ऊंचे-ऊंचे पौधों के बीच खड़ा था। भाभी ने अपनी लाल साड़ी को कमर में खोंसा हुआ था, जिससे उनके तरबूज जैसे उभार और भी ज्यादा आकर्षक लग रहे थे।

उनकी गोरी पीठ पर पसीने की बूंदें चमक रही थीं, जो धीरे-धीरे नीचे उतरकर उनकी खाई की ओर जा रही थीं। भाभी ने मुड़कर मेरी तरफ देखा और शरारती मुस्कान बिखेरी। उनके चेहरे की लाली देखकर मुझे अहसास हुआ कि आज खेतों में केवल काम नहीं होगा, बल्कि कुछ और ही खुदाई होने वाली है। मैंने उनके करीब जाकर उनकी पतली कमर को धीरे से मरोड़ना शुरू किया।

भाभी की आँखों में एक अजीब सी प्यास थी। उन्होंने मेरे हाथ को पकड़कर अपनी छाती के रसीले संतरे पर रख दिया। मेरा हाथ उनके शरीर की गर्मी महसूस कर रहा था। मैंने धीरे से उनके बाल हटाए और उनकी गर्दन पर अपनी सांसें छोड़नी शुरू कीं। वह धीरे से सिसक उठीं और बोलीं, “देवर जी, आज इस खेत की जुताई करना बहुत जरूरी है, फसल बहुत प्यासी है।”

उनकी बातों में छिपे मतलब को मैं बखूबी समझ रहा था। मैंने अपने पायजामे के अंदर मचलते हुए नसो से भरा खीरा महसूस किया, जो बाहर निकलने को बेताब था। मैंने उनकी साड़ी का पल्लू सरका दिया, जिससे उनके बदन की पूरी मलाई मेरे सामने आ गई। भाभी ने झुककर नीचे पड़ी टोकरी उठाई, जिससे उनका पिछवाड़ा पूरी तरह से मेरे सामने तन गया और मेरी उत्तेजना और बढ़ गई।

मैने बिना देर किए उन्हें पीछे से पकड़ा और उनके नितंबों को जोर से दबाना शुरू किया। वह पीछे मुड़कर मुझे चूमने लगीं। उनकी जीभ मेरे मुंह में रसीले रस की तरह घूम रही थी। मैंने अपना हाथ नीचे ले जाकर उनकी खाई में उंगली डाली, जो पहले से ही गीली हो चुकी थी। भाभी ने अपनी आँखें बंद कर लीं और मेरी उंगली से खोदना उन्हें बहुत पसंद आ रहा था।

खेतों के बीच एक सूखी जगह देखकर मैंने वहां एक चादर बिछाई। भाभी वहां लेट गईं और उन्होंने अपनी टांगें फैला दीं। उनके पैरों के बीच का नजारा किसी जन्नत से कम नहीं था। मैंने नीचे झुककर उनकी खाई चाटना शुरू किया। वह जोर-जोर से आहें भरने लगीं। उनके बदन की खुशबू और उस जगह का मक्खन जैसा एहसास मुझे पागल बना रहा था, मानो मैं किसी गहरे समंदर में डूब रहा हूँ।

जब भाभी की उत्तेजना चरम पर पहुंच गई, तो उन्होंने मेरा पायजामा नीचे खींच दिया। मेरा लंबा मोटा खीरा झटके से बाहर निकला। भाभी ने उसे अपने हाथ में लिया और उसकी मसाज करने लगीं। उन्होंने उसे अपने मुंह में लिया और खीरा चूसना शुरू किया। उनका ऐसा करना मेरे शरीर में बिजली की तरह दौड़ गया। मुझे लगा कि जल्द ही मेरी पिचकारी छूट जाएगी, लेकिन मैंने खुद को संभाला।

भाभी अब और इंतजार नहीं कर सकती थीं। उन्होंने मुझे अपने ऊपर आने का इशारा किया। मैंने उन्हें घोड़ी बनाकर खोदना शुरू करने के बजाय पहले उन्हें सीधा लेटाया और अपनी मूसल को उनकी खाई के मुहाने पर रखा। जैसे ही मैंने अंदर धकेला, उनके मुँह से एक चीख निकली, लेकिन वह दर्द की नहीं, बल्कि परम सुख की थी। मैं धीरे-धीरे अंदर-बाहर करते हुए जुताई करना जारी रखा।

गर्मी और मेहनत की वजह से हमारा शरीर पसीने से तर-बतर था। भाभी की सांसें तेज चल रही थीं और वह मेरे नाम को पुकार रही थीं। मैंने उनकी रफ्तार बढ़ाई और जोर-जोर से उनके पिछवाड़े से खोदना शुरू किया। हर धक्के के साथ उनके रसीले आम ऊपर-नीचे उछल रहे थे। मैंने झुककर उन्हें अपने मुँह में भर लिया और उनका आनंद लेने लगा, जिससे उनकी उत्तेजना सातवें आसमान पर पहुंच गई।

भाभी ने मुझे पलट दिया और खुद मेरे ऊपर आकर सवारी करना शुरू किया। उनकी कमर का मरोड़ना और उनके शरीर का तालमेल अद्भुत था। वह पूरी ताकत से मेरे खीरे को अपनी गहराइयों में उतार रही थीं। मक्के के पौधों की सरसराहट और भाभी की आहें पूरे खेत में गूँज रही थीं। ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति भी हमारी इस खुदाई का हिस्सा बन रही हो और आनंद ले रही हो।

कुछ देर बाद भाभी थक कर मेरे बगल में लेट गईं। लेकिन मेरी गर्मी शांत करना अभी बाकी था। मैंने उन्हें दोबारा पकड़ा और इस बार उन्हें घोड़ी बनाकर खोदना शुरू किया। यह पोजीशन भाभी को बहुत पसंद थी। उनके पिछवाड़े पर मेरे हाथों के निशान छप रहे थे। मैं पागलों की तरह उनकी गहराई माप रहा था, और वह झूम-झूम कर मेरा साथ दे रही थीं।

अचानक भाभी ने जोर से मुझे भींचा और उनके शरीर में कंपन होने लगा। उनकी खाई से मलाई जैसा रस निकलने लगा था। मुझे भी लगा कि अब मेरा बांध टूटने वाला है। मैंने आखिरी कुछ तेज धक्के लगाए और अपनी गरम पिचकारी उनकी गहराई में छोड़ दी। हम दोनों एक-दूसरे से लिपटे हुए जमीन पर पड़े थे, हमारी धड़कनें धीरे-धीरे सामान्य हो रही थीं और चारों तरफ शांति थी।

सूरज अब ढलने की ओर था और शाम की ठंडी हवा चलने लगी थी। भाभी ने अपनी साड़ी ठीक की और मेरे चेहरे को चूमते हुए कहा, “आज तुमने बहुत अच्छी जुताई की है।” हमने मुस्कुराते हुए एक-दूसरे को देखा। वह दोपहर हमारे लिए हमेशा के लिए यादगार बन गई थी। हमने चुपचाप अपने कपड़े दुरुस्त किए और घर की ओर चल दिए, अपने इस राज को दिलों में छुपाए।

गाँव के रास्ते पर चलते हुए भाभी की चाल में एक अलग ही आत्मविश्वास था। उनके चेहरे पर आई वह संतुष्टि देख कर मेरा मन फिर से मसाज करने को कर रहा था। लेकिन हमें सावधानी बरतनी थी। घर पहुँचकर हमने सबको ऐसे दिखाया जैसे हम वाकई खेतों में मेहनत करके आए हों। लेकिन असल में जो मलाई और मक्खन का खेल हमने खेला था, वह सिर्फ हम जानते थे।

रात के खाने पर जब भाभी ने मुझे सब्जी परोसी, तो उनकी उंगलियां मेरे हाथ से छुईं। उस स्पर्श में फिर वही गर्मी शांत करना वाली आग थी। मैंने उनकी आँखों में देखा और समझ गया कि यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है। आने वाले दिनों में और भी कई खुदाई और सवारी होनी बाकी थी। भाभी का वह पिछवाड़ा और उनके तरबूज मेरे सपनों में बस गए थे।

अगले कुछ दिनों तक हम जब भी अकेले होते, भाभी मुझे अपने कमरे में बुला लेतीं। कभी वह बेलन का बहाना करतीं तो कभी रसोई में मालिश कराने का। हर बार हम उसी जूनून के साथ एक-दूसरे में खो जाते। गाँव की वह गर्मी अब हमारे लिए सजा नहीं, बल्कि एक वरदान बन गई थी, जिसने हमें एक-दूसरे के और करीब ला दिया था।

भाभी अक्सर कहती थीं कि उनके पति शहर में रहते हैं, इसलिए उनकी खाई हमेशा प्यासी रहती थी। लेकिन जब से मैंने उस खेत में उनकी जुताई की थी, वह बहुत खुश रहने लगी थीं। हमारी यह प्रेम कहानी उन खेतों की मिट्टी में कहीं दब गई थी, लेकिन इसकी महक हमारे जिस्मों में हमेशा ताज़ा रहती थी। हर दोपहर अब एक नई उम्मीद लेकर आती थी।

एक दिन फिर से मौका मिला जब घर के सभी लोग शहर गए हुए थे। भाभी ने दरवाज़ा बंद किया और मुझे अपनी खाई में उंगली डालने का इशारा किया। उस दिन हमने घर के हर कोने में अपनी खुदाई के निशान छोड़े। कभी सोफे पर तो कभी रसोई के स्लैब पर, भाभी का हर अंदाज़ निराला था। उनका वह नसो से भरा खीरा चूसने का तरीका आज भी मुझे पागल कर देता है।

इस तरह हमारी यह गुप्त दास्ताँ चलती रही। गाँव की गलियों में कोई नहीं जानता था कि बंद कमरों और ऊंचे खेतों के पीछे क्या खेल चल रहा है। भाभी की वह मलाई जैसी त्वचा और मेरा वह जुनून हर दिन बढ़ता ही गया। हमने प्यार के उस बाग में इतने फूल खिलाए कि वह कभी मुरझाए ही नहीं। हमारी प्यास और गहरी होती गई।

आज भी जब मैं उन खेतों से गुजरता हूँ, तो मुझे वही महक और भाभी की आहें सुनाई देती हैं। वह रसीले तरबूज और वह खाई आज भी मेरा इंतज़ार करती हैं। यह कहानी सिर्फ जिस्मों की नहीं, बल्कि उन दबी हुई इच्छाओं की है जिन्हें खेतों की हरियाली और दोपहर की धूप ने नया जीवन दिया था। भाभी और मेरी वह चु@@ई की दास्ताँ अमर हो गई।

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