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पुरानी सहेली की चु@@ई

शहर की उस तपती गर्मी में जब रात के ग्यारह बज रहे थे, मैं अपनी पुरानी सहेली नेहा के साथ घर की छत पर बैठा था। वह कई सालों बाद हमारे शहर आई थी और उसकी खूबसूरती अब पहले से कहीं ज्यादा निखर चुकी थी। चाँदनी रात में उसका सांवला बदन और गहरी गर्दन वाला ब्लाउज उसे किसी अप्सरा जैसा बना रहा था, जिससे मेरी आँखों की प्यास बढ़ती जा रही थी और मन मचल रहा था।

नेहा ने एक पतली रेशमी साड़ी पहन रखी थी जो हवा के झोंकों के साथ उसके शरीर से चिपक रही थी। उसने अपनी कमर को थोड़ा मरोड़ना शुरू किया और कहने लगी कि सफर की थकान की वजह से उसके बदन में बहुत दर्द हो रहा है। उसकी आवाज़ में एक अजीब सी ललक थी जिसे सुनकर मेरे शरीर के अंदर भी एक अजीब सी गर्मी शांत करने की तड़प जागने लगी थी जो रुक नहीं रही थी।

मैंने धीरे से उसके करीब जाकर अपना हाथ उसके कंधे पर रखा और पूछा कि क्या मैं उसे थोड़ी मसाज दे सकता हूँ। उसने शरमाते हुए अपनी आँखें झुका लीं और धीरे से ‘हाँ’ कह दिया। जैसे ही मेरा हाथ उसकी पीठ की रेशमी त्वचा पर पड़ा, मुझे महसूस हुआ कि उसका शरीर कितना कोमल है, जैसे ताजी जमी हुई मलाई हो। मेरा हाथ धीरे-धीरे उसकी रीढ़ की हड्डी के नीचे जाने लगा।

जैसे-जैसे मेरी मालिश तेज होती गई, नेहा के मुँह से दबी-दबी आहें निकलने लगीं। ब्लाउज की डोरी ढीली हो चुकी थी और उसके रसीले आम जैसे उभार अब मेरी नज़रों के सामने आधे खुले हुए थे। वह बार-बार अपनी देह को दबाना चाह रही थी ताकि उसे कुछ सुकून मिले। मैंने भी कोई मौका नहीं छोड़ा और उसके गोरे बदन की उस कोमलता को अपने हाथों में भरना शुरू कर दिया।

उसकी साड़ी अब पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो चुकी थी और उसके उभार किसी बड़े तरबूज की तरह सख्त और रसीले लग रहे थे। नेहा ने धीरे से मेरा हाथ पकड़ा और उसे अपने उभरे हुए सीने पर रख दिया। उसकी गर्मी अब सातवें आसमान पर थी। उसने अपनी गर्दन पीछे झुकाई और मेरी आँखों में देखते हुए कहा कि उसे अब और इंतज़ार नहीं हो रहा है, उसे कुछ चाहिए।

मैंने उसके ब्लाउज के हुक खोले तो उसके रसीले संतरे आज़ाद होकर बाहर आ गए। मैंने अपनी जीभ से उनके ऊपरी हिस्से को चूमना शुरू किया और उसे महसूस होने लगा कि जैसे कोई मक्खन की तरह उसके बदन को चाट रहा हो। नेहा की साँसें तेज हो गई थीं और वह अपने पैरों को आपस में रगड़ रही थी, जैसे उसकी खाई में कोई तूफान उठ रहा हो जिसे रोकना मुश्किल था।

जब मैंने उसकी साड़ी को कमर से नीचे खिसकाया, तो उसका भारी पिछवाड़ा चाँदनी रात में चमकने लगा। वह सच में किसी कामसुंदरी से कम नहीं लग रही थी। मैंने उसे अपनी बाहों में भरा और उसके पीछे के हिस्से को जोर-जोर से सहलाया। नेहा अब पूरी तरह से बेकाबू हो चुकी थी और वह अपनी उंगलियों से अपने बालों को झटक रही थी, जैसे वह किसी सवारी करना चाहती हो।

मैंने अपना पजामा उतारा तो मेरा नसो से भरा खीरा पूरी तरह से तनकर खड़ा हो चुका था। नेहा ने जब उसे देखा तो उसकी आँखें फटी की फटी रह गईं। उसने धीरे से अपने हाथ बढ़ाए और उस लंबे मोटे खीरे को अपनी मुट्ठी में कैद कर लिया। वह उसे सहलाने लगी और फिर धीरे-धीरे उसे किसी लॉलीपॉप की तरह खीरा चूसना शुरू कर दिया, जिससे मुझे स्वर्ग जैसा आनंद आने लगा।

नेहा की जीभ का जादू मेरे पूरे शरीर में करंट की तरह दौड़ रहा था। वह उसे पूरी शिद्दत के साथ अपने मुँह में लेकर ऊपर-नीचे कर रही थी। मैंने उसके बाल पकड़कर उसे थोड़ा और करीब खींचा। अब माहौल पूरी तरह से बन चुका था। मैंने उसे छत की मुंडेर के पास ले जाकर उसे घोड़ी बनाकर खोदना शुरू करने का फैसला किया ताकि पूरी दुनिया के सामने यह खेल खेला जा सके।

जैसे ही मैंने अपनी पहली कोशिश की और उसके पिछले हिस्से में अपना औजार सटाया, उसने दर्द और मजे की एक मिली-जुली चीख मारी। उसकी वह गहरी खाई बहुत तंग थी लेकिन जैसे-जैसे मैंने दबाव बढ़ाया, वह धीरे-धीरे रास्ता देने लगी। मैंने जोर-जोर से खुदाई शुरू कर दी और छत की शांति नेहा की आहों और मेरे थप्पड़ों की आवाज़ से गूँजने लगी, जो बहुत ही कामुक लग रहा था।

नेहा बार-बार अपनी कमर को पीछे की ओर धकेल रही थी ताकि मेरा पूरा मूसल उसके अंदर तक समा सके। वह चिल्ला रही थी कि “और जोर से खोदो, आज मेरी पूरी जुताई करना है।” उसकी इस उत्तेजना ने मुझे और भी ज्यादा पागल कर दिया था। मैं उसके पिछवाड़े से खोदना जारी रखते हुए उसके दोनों हाथों को कसकर पकड़ लिया और अपनी रफ्तार को दोगुना कर दिया।

कुछ देर बाद उसने करवट बदली और अब वह नीचे लेट गई। मैंने अपनी उंगली से खोदना शुरू किया ताकि उसकी गीली दीवारों को थोड़ा और आराम मिल सके। मेरी खाई में उंगली जाते ही वह धनुष की तरह मुड़ गई। उसके शरीर का हर हिस्सा अब मलाई की तरह चिकना और गीला हो चुका था। वह बार-बार अपनी जांघों को मेरे कमर के चारों तरफ लपेट रही थी।

अब मैंने उसे फिर से अपनी गोद में लिया और उसे सवारी करना सिखाने लगा। वह ऊपर-नीचे होकर मेरे औजार पर बैठ रही थी जैसे कोई अनुभवी घुड़सवार हो। उसके रसीले आम हवा में उछल रहे थे और मैं उन्हें अपने हाथों से जोर-जोर से मसल रहा था। नेहा के चेहरे पर एक अलग ही सुकून था, जैसे बरसों की प्यास आज जाकर बुझने वाली हो।

छत पर पड़ी चादर अब पसीने और प्यार की बूंदों से भीग चुकी थी। मैंने उसे फिर से घुमाया और उसकी खाई चाटना शुरू किया। नेहा की कामवासना अब चरम पर थी, वह अपनी एड़ियां रगड़ रही थी और मेरा सिर अपने पास खींच रही थी। जैसे ही मेरी जीभ ने उसके केंद्र को छुआ, वह बुरी तरह से कांपने लगी और उसके अंदर से मीठा रस निकलना शुरू हो गया।

उस रस के निकलने के बाद वह और भी ज्यादा उत्तेजित हो गई। उसने मुझे नीचे लिटाया और खुद मेरे ऊपर आकर बैठ गई। वह पागलों की तरह खोदना चाहती थी। मैंने भी उसका साथ दिया और अपने कूल्हों को ऊपर की ओर झटका देना शुरू किया। हमारा यह मिलन किसी युद्ध से कम नहीं लग रहा था जहाँ दोनों ही एक-दूसरे को पूरी तरह से जीतना चाहते थे।

नेहा ने अपने दोनों हाथों से अपने सीने को दबाया और मेरे चेहरे के करीब आकर बोली, “आज तुम्हारी इस पिचकारी को मेरे अंदर ही खाली करना।” उसकी इस बात ने मेरे अंदर के जानवर को पूरी तरह से जगा दिया। मैंने उसे फिर से नीचे दबाया और अपना पूरा ज़ोर लगाकर खुदाई करने लगा। हर झटके के साथ नेहा की आवाज़ और भी बुलंद होती जा रही थी।

अब हमारे शरीर पूरी तरह से थक चुके थे लेकिन प्यास अभी भी बाकी थी। मैंने उसे बाहों में भरकर उसे चूमना शुरू किया और उसकी पीठ को फिर से मरोड़ना शुरू किया। वह मेरी पकड़ में पूरी तरह से ढीली पड़ चुकी थी लेकिन उसकी आँखों की चमक बता रही थी कि उसे वह मिल गया है जिसकी उसे तलाश थी। हमने फिर से वही प्रक्रिया दोहराई और बार-बार आनंद लिया।

रात के तीसरे पहर तक हम छत पर इसी तरह प्यार के खेल में डूबे रहे। कभी वह मेरी सवारी करना चाहती थी तो कभी मैं उसे घोड़ी बनाकर खोदना चाहता था। चाँद भी बादलों के पीछे छुप गया था जैसे वह हमारे इस निजी पल को और भी गहरा बनाना चाहता हो। नेहा का बदन अब किसी मक्खन की तरह चमक रहा था और वह पूरी तरह से संतुष्ट थी।

अंत में जब मेरी बर्दाश्त की सीमा खत्म हुई, तो मैंने अपने नसो से भरा खीरा उसके अंदर गहराई तक डाल दिया और अपनी पूरी ताकत लगा दी। नेहा ने मुझे कसकर पकड़ लिया और जैसे ही मेरी पिचकारी चली, उसका पूरा शरीर झटके लेने लगा। हम दोनों एक-दूसरे में सिमटे हुए वहीं छत पर लेट गए, जहाँ ठंडी हवा अब हमारी गर्मी शांत करने का काम कर रही थी।

अगली सुबह जब सूरज की पहली किरण हमारे ऊपर पड़ी, नेहा के चेहरे पर एक अनोखी मुस्कान थी। उसने अपनी साड़ी सही की और मेरे कान में धीरे से कहा कि यह उसकी जिंदगी की सबसे हसीन रात थी। हमने एक-दूसरे को विदा किया लेकिन वह रात और उसकी देह की खुशबू मेरे जेहन में हमेशा के लिए बस गई थी। पुरानी सहेली के साथ वह खुदाई का खेल यादगार बन गया।

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